भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 542

५३२ भक्तिसुधा है। घृतकी आहुतिसे जैसे अग्निकी वृद्धि होती है, वैसे ही भोगसे कामकी वृद्धि ही होती है'— न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ (श्रीमद्भा० ९।१९।१४) 'पृथिवीभरमें जो भी व्रीहि, यव, हिरण्य, पशु एवं स्त्रियाँ हैं, वे सब मिलकर भी एक व्यक्तिको भी तृप्त करनेमें समर्थ नहीं हैं'— यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः। सर्वं नैकस्य पर्याप्तमिति मत्वा शमं व्रजेत् ॥ 'संसारकी सभी संचित राशियाँ क्षीण हो जाती हैं, सभी समुन्नतियोंका अन्तमें पतन होता है, सभी संयोगोंका अन्तमें वियोग होता है, सभी जीवनोंका मरणमें ही पर्यवसान है'— सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः। संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं हि जीवितम् ॥ (महा०, शान्ति० ३३०।२०) 'कल्याणमयि माँ! सभी विचार आपकी कृपाके बिना निर्वीर्य रहते हैं। आपकी कृपासे ही सद्विचारकी निष्ठा होती है। सम्पूर्ण प्राणी आदिमें अव्यक्त हैं और अन्तमें भी अव्यक्त ही हो जाते हैं, मध्य-मध्यमें ही व्यक्त रहते हैं। संसारमें सहस्रों माता-पिता, सहस्रों पुत्र एवं सहस्रों स्त्रियाँ हुईं, परंतु किसीका सम्बन्ध किसीसे स्थिर न रहा। जन्म-जमान्तरोंमें कितने ही पुत्र तथा अभीष्ट सुन्दरियोंसे सम्बन्ध होता है, परंतु कौन कहाँ, कौन कहाँ? किसी भी सम्बन्धकी स्थिरता नहीं है। जैसे महोदधिमें इधर-उधरसे अनेकधा काष्ठ इकट्ठे होते हैं, किसी लहरके वेगसे पुनः पृथक्-पृथक् बह जाते हैं, वैसे ही कार्यपरतन्त्र प्राणी संयुक्त-वियुक्त होते ही रहते हैं। काल-कर्मके परतन्त्र हो प्राणी जन्म लेता, मरता और भटकता है, तदनुसार ही सुख-दुःख भी भोगता है। यौवन, सौन्दर्य, द्रव्यसंचय, जीवन एवं आरोग्य तथा प्रियसंवास सब अनित्य हैं। इनमें पण्डितोंको मोहित नहीं होना चाहिये'— अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं द्रव्यसंचयः। आरोग्यं प्रियसंवासो गृध्येत् तत्र न पण्डितः ॥ (महा०, शान्ति० ३३०।१४) 'सामूहिक दुःखके लिये एकको भी चिन्तित होनेकी आवश्यकता नहीं है। हाँ, बन सके तो अनुद्विग्न रहते हुए शक्तिभर उसके प्रतीकारकी चेष्टा करनी चाहिये'— न जानपदिकं दुःखमेकः शोचितुमर्हति। अशोचन् प्रतिकुर्वीत यदि पश्येदुपक्रमम् ॥ (महा०, शान्ति० ३३०।१५) 'दुःखका चिन्तन न करना ही उसका महौषध है। चिन्तन करनेसे दुःख मिटता नहीं, परंतु बढ़ता ही है'— भैषज्यमेतद् दुःखस्य यदेतन्नानुचिन्तयेत्। चिन्त्यमानं हि न व्येति भूयश्चापि प्रवर्धते ॥ (महा०, शान्ति० ३३०।१२) 'अनिष्ट-सम्प्रयोग तथा इष्टविप्रयोगसे ही अल्पबुद्धि प्राणी मानस दुःखोंसे दग्ध रहते हैं। प्रज्ञासे मानस दुःखों और औषधोंसे शारीरिक दुःखोंका हनन करना उचित है। यही विज्ञानकी महिमा है कि प्राणी बालतुल्य न हो'— प्रज्ञया मानसं दुःखं हन्याच्छारीरमौषधैः। एतद् विज्ञानसामर्थं न बालैः समतामियात् ॥ (महा०, शान्ति० ३३०।१३) 'पूर्वकृत कर्म सब सुखों-दुःखोंके मूल कारण हैं। इस तरह अपना आत्मा ही अपना बन्धु और आत्मा ही अपना रिपु है। शुभ कर्मसे सुख, अशुभसे दुःख होता है। बिना किये कुछ भी नहीं होता। ज्ञानविरुद्ध, विनाशकारण, मूलघाति कर्मोंमें समझदार लोगोंको रत नहीं होना चाहिये। विचार करनेपर यह सम्पूर्ण संसार ही अशाश्वत है, कदलीस्तम्भके समान ही निःसार है। श्मशानमें एक दिन सभीको समान रूपसे समाप्त हो जाना पड़ता है; चाहे धनवान्, रूपवान्, बुद्धिमान् हो, चाहे निर्धन, निर्बुद्धि हो। विभिन्न गृहोंके समान ही शरीर भी आत्माका एक