भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२० भक्तिसुधा जाता है। अतः इन दृष्टान्तोंसे भी वृत्तिका नाश नहीं कहा जा सकता। इसलिये वृत्तिरूप विद्यासे संश्लिष्ट होकर ही अनन्तप्रकाशस्वरूप शिव सदा विराजमान रहता है। इसी तरह यह भी विचार उठता है कि अविद्यानिवृत्ति क्या है? कोई वस्तु कहींसे निवृत्त होते हुए भी कहीं-न-कहीं रहती ही है। यदि ध्वंसरूप निवृत्ति मानी जाय, तो भी अपने कारणमें उसकी स्थिति माननी पड़ेगी; क्योंकि घटादिका ध्वंस होनेपर भी अपने कारण कपाल, चूर्ण आदि कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी रूपमें उनकी स्थिति माननी ही पड़ती है। यही स्थिति लयरूपा निवृत्तिकी भी है। यदि निवृत्तिको सर्वथा निःस्वरूप कहें, तो उसके लिये प्रयत्न नहीं हो सकता। सही कहें, तब तो उसी रूपसे शक्तिकी स्थिति रह सकती है। अनिर्वचनीय कहें, तो उसको भी ज्ञाननिवर्त्यता कहनी पड़ेगी, अतएव कुछ आचार्योंने पंचम-प्रकारा अविद्या निवृत्ति मानी है तथा उस रूपसे भी