भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१८ भक्तिसुधा पुरुषरूपिणी 'देव्यथर्वशीर्ष' में देवीने स्वयं अपनेको ब्रह्मरूपिणी कहा है और यह भी कहा है कि प्रकृतिपुरुषात्मक जगत् मुझसे आविर्भूत होता है— अहं ब्रह्मस्वरूपिणी। मत्तः प्रकृतिपुरुषात्मकं जगत्। शून्यं चाशून्यं च॥ एतावता जो कहते हैं कि प्रकृतिरूपिणी ही देवी है, उनका यह कहना ठीक नहीं। अपनी सर्वात्मताको दिखलाते हुए अपनेको ही आनन्द-अनानन्द, विज्ञान- अविज्ञान, ब्रह्म-अब्रह्म—सब कुछ बतलाया है। अजामें कहा है कि मैं ही सब जगत् हूँ—'अहमखिलं जगत्।' वेद-अवेद, विद्या-अविद्या, अजा-अनजा सब कुछ भगवती ही हैं। कालरात्रिं ब्रह्मस्तुतां वैष्णवीं स्कन्दमातरम्। सरस्वतीमदितिं दक्षदुहितरं नमामः पावनां शिवाम्॥ —इस मन्त्रसे भगवतीके प्रसिद्ध अनेक रूपोंका वर्णन करके उसे ही 'एषात्मशक्तिः। एषा विश्वमोहिनी' इत्यादि वचनोंसे आत्मशक्तिरूप भी कहा है। यहाँ आत्मशक्तिका आत्मरूपाशक्ति भी अर्थ किया जाता है। तभी 'य एवं वेद स शोकं तरति' इस वचनसे इसके वेदनमें शोकोपलक्षित संसारका तरण कहा गया है। आगे चलकर कहा है—'यस्याः स्वरूपं ब्रह्मादयो न जानन्ति तस्मादुच्यते अज्ञेया। यस्या अन्तो न लभ्यते तस्मादुच्यते अनन्ता।*** एकैव सर्वत्र वर्तते तस्मादुच्यते एका।' अनन्ता, एका, अनेका सब कुछ है। आचार्य भगवान् शंकरने भी भगवतीके सगुण- निर्गुण दोनों ही रूपोंको बड़े सुन्दर शब्दोंमें कहा है— 'हे देवि! आपके निमेष-उन्मेषसे जगत्की उत्पत्ति और प्रलय होता है। सन्त लोग कहते हैं कि आपके निमेषेसे जगत्का प्रलय हो जाता है, इसीलिये मालूम पड़ता है कि आप जगद्रक्षणके लिये ही निर्निमेष नयनोंसे भक्तोंको देखती हैं— निमेषोन्मेषाभ्यां प्रलयमुदयं याति जगती तवेत्याहुः सन्तो धरणिधरराजन्यतनये। त्वदुन्मेषाज्जातं जगदिदमशेषं प्रलयतः परित्रातुं शङ्के परिहृतनिमेषास्तव दृशः॥ (सौन्दर्यलहरी ५५) शक्तिकी दृष्टिसे भी देखा जाय, तो शक्ति बिना सारा प्रपंच शवमात्र ठहरता है। अशक्त व्यक्ति, अशक्त समाज, अशक्त जाति, अशक्त देश भारभूत ही होता है, अतः शक्तिकी पूजा सर्वत्र स्वाभाविक है। संसारमें प्रत्येक पदार्थमें तत्तत्कार्य-सम्पादनकी शक्ति है, तभी उसका मूल्य है। अनन्तानन्तकार्योत्पादनानुकूल शक्तिसे सम्पन्न ही परमेश्वर होता है। न्यूनशक्तिसम्पन्न ईश्वर होता है। जितना-जितना शक्तिराहित्य होता है, उतना ही जीवत्व आता है। अधिकाधिक शक्तिसाहित्यमें ईश्वरत्व आता है। निर्गुण, निराकार, निर्विकार, कूटस्थ परब्रह्म अनन्त शक्तियोंकी केन्द्रभूता महाशक्तिसे संवलित होनेपर ही विश्वकी सृष्टि, पालन, संहार आदिमें समर्थ होते हैं। यदि शक्तिसंवलन न हो, तो शिव भी सृष्ट्यादिमें असमर्थ, अशक्त, शवमात्र रह जाता है, अतएव ईश्वरका ईश्वरत्व ही शक्तिमूलक है। जिसके सम्बन्धसे ही कूटस्थ चेतन ईश्वर बनता है, उसके महत्त्वको कौन कहे? शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि। (सौन्दर्यलहरी २) आचार्य तो कहते हैं कि संसारमें बहुत लोग अनेक गुणोंसे युक्त सपर्णा (पत्तोंवाली) कल्पलताका बड़े आदरसे सेवन करते हैं, परंतु मेरी तो ऐसी बुद्धि होती है कि (बिना पत्तोंवाली बेल) एक अपर्णा पार्वतीका ही सेवन करना चाहिये; क्योंकि उसके संसर्गसे पुराना स्थाणु ठूँठ (पुराणपुरुषोत्तम कूटस्थ महादेव) भी कैवल्यरूप परमफल प्रदान करता है। सारांश यह कि सपर्णा कल्पलताके सेवनसे भी अपर्णा (पार्वती)-का सेवन बहुत अधिक चमत्कारपूर्ण है। कल्पलता बहुत फल प्रदान कर सकती है, परंतु वह मोक्ष देनेमें समर्थ नहीं। किंतु अपर्णाका स्वयं तो कहना ही क्या, उसके संसर्गसे पुराना ठूँठ (पुराणपुरुष