भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीभगवती-तत्त्व ५११

सम्प्रलीयते।' विष्णुपुराणके इन वचनोंसे अव्यक्तका भी ब्रह्ममें लय स्मृत है। अव्यक्तका माया ही अर्थ है, प्राणियोंके कर्म-फल-भोगका जब समय आता है, तब चिदात्मिका भगवतीमें सिसृक्षा (सृष्टिकी इच्छा) उत्पन्न होती है। मायाकी उसी अवस्थाको विचिकीर्षा आदि शब्दोंसे कहा जाता है। कर्मपरिपाकका विनश्यद अवस्थावाला प्रागभाव ही विचिकीर्षा है। यद्यपि गुणसाम्यदशामें कर्मपरिपाकादिके अनुकूल कोई भी व्यापार नहीं होते, अतः साम्यावस्था-भंगका क्या कारण है, यह जानना बहुत कठिन है तथापि जैसे निद्राके अव्यवहित प्राक्कालके प्रबोधानुकूल दृढ़ संकल्पकी महिमासे ही नियत समयपर निद्रा भंग होती है, वैसे ही प्रलयके अव्यवहित प्राक्कालिक ईश्वरीय संकल्पसे ही नियत समयपर जागता है। विभागको न प्राप्त हुआ यह बिन्दु ही 'अव्यक्त' कहलाता है। यह मायाकी ही अवस्था है, अतः यह मायापदवाच्य होता है। यद्यपि यह महदादिके समान तत्त्वान्तररूपसे उत्पन्न नहीं होता, अतएव माया ही है तथापि मायाकी एक विशिष्टाकारसे उत्पत्ति हुई है, अतः 'तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिविधं द्विजसत्तम' इत्यादि वचनोंसे उसकी उत्पत्ति भी कही गयी है। केवल ब्रह्ममें कारणता नहीं बन सकती, अतएव उसे भी सूक्ष्मावस्थाविशिष्ट मायासे युक्त ब्रह्ममें ही कारणता समझनी चाहिये। बीज और अंकुरके बीचकी उच्छूनावस्थाको ही और जिसमें बीज धरणि, अनिल और जलके सम्पर्कसे क्लिन्न होकर कुछ फूलता है, अव्यक्तावस्था समझनी चाहिये। गुणसाम्य बीजावस्था है, वही शुद्ध माया है। बीजका अंकुरित होना कार्यावस्था है। स्पष्ट ईक्षण और अहंकार आदि ही महत्तत्त्व, अहन्तत्त्व आदि हैं। व्यष्टि जगत्में समझ सकते हैं कि निद्रावस्था बीजावस्था है, निद्राका प्रबोधोन्मुख होना अव्यक्तावस्था है, विकल्प- विशेषविरहित प्रबोध महत्तत्त्वकी अवस्था है, अहंकारका उल्लेख होना ही अहंतत्त्वकी अवस्था है, तदनन्तर स्थूल कार्यादि सम्पत्ति होती है। अन्तर्मुख अव्यक्तकी 'तुरीय' संज्ञा है, बहिर्मुख अव्यक्तकी 'कारण देह' संज्ञा है। बहिर्मुख अव्यक्तसे सूक्ष्म-स्थूल देहकी उत्पत्ति होती है, इसीमें सम्पूर्ण विश्व आ जाता है। समष्टि-व्यष्टि स्थूल देह और ज्ञानेन्द्रिय तथा अन्तःकरणके अधिपति सरस्वती-सहित ब्रह्मा हैं। कर्मेन्द्रियसहित प्राणसंज्ञक क्रियाशक्त्यात्मक लिंगदेहके अधिपति लक्ष्मी-सहित विष्णु हैं। कारणदेहके अधिपति गौरीसहित रुद्र हैं। तुरीयदेहकी अभिमानिनी भुवनेश्वरी और महालक्ष्मी हैं। मूर्तिरहस्य प्रथम महालक्ष्मी भगवतीने सम्पूर्ण जगत्‌को अधिष्ठातासे रहित देखकर केवल तमोगुणरूप उपाधिका आश्रय लेकर बड़ा सुन्दर एक दूसरा रूप धारण किया। साम्यावस्थाभिमानिनी महालक्ष्मी हैं। किंचिच्चलितसदृश तमोगुणविशिष्ट अव्यक्तमें अभिमान करके उसीने महाकालीरूप धारण कर लिया। यद्यपि वह मूल देवीसे अभिन्न ही है तथापि रूपमें भेद है। कज्जलके समान नीलवर्णवाली, सुन्दर दंष्ट्रासे युक्त मनोहर आननवाली, विशाल लोचनवाली, सूक्ष्म कटिवाली वह देवी खड्ग, पात्र, शिरः, खेटको धारण किये कबन्ध, हार और मुण्डकी माला अथवा शवके शिरोंकी माला पहने थी। उस महाकालीने महालक्ष्मीसे कहा कि—'मेरे लिये नाम और कर्म बतलाओ।' महालक्ष्मीने ब्रह्मादिमोहिका होनेसे 'महामाया', उन सबका संख्यान और संहार करनेसे 'महाकाली' और सर्वविध भक्षणकी इच्छावाली होनेसे 'क्षुधा', सर्वविध पानकी इच्छावाली होनेसे 'तृषा', योगकी अधिष्ठात्री होनेसे 'योगनिद्रा', भक्तकृत भक्तिकी इच्छावाली होनेसे 'तृष्णा', महापराक्रमवती होनेसे 'एकवीरा' इत्यादि नाम और नामानुरूप ही कर्म बतलाये हैं। अनन्तर महालक्ष्मीने अतिशुद्ध सत्त्वके द्वारा चन्द्रप्रभाके समान अतिसुन्दर एक और रूप धारण किया। अक्षमाला, अंकुश, वीणा, पुस्तक धारण किये हुए वह बड़ी सुन्दरी देवी प्रकट हुई। उसके लिये भी महाविद्या, महावाणी, भारती, वाक्, सरस्वती, आर्या,