भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१० भक्तिसुधा जाता है, सब मेरी ही तत्र-तत्र, तेन-तेन रूपेण सम्पत्ति है। खाना, देखना, प्राणन करना, श्वासो- च्छ्वासादि व्यापार करना सब मेरी ही शक्तिसे सम्भव है। जो मुझ अन्तर्यामिणीको नहीं जानते, वे उपक्षीण हो जाते हैं। हे विश्रुत ! श्रद्धायुक्त होकर सुनो, यह ब्रह्मवस्तु तुम्हें बतला रही हूँ— मया सो अन्नमत्ति यो विपश्यति यः प्राणिति य ईं शृणोत्युक्तम्। अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रद्धिवं ते वदामि॥ मैं ही देव-मनुष्यसेवित ब्रह्मका उपदेश करती हूँ। मैं ही जिसको चाहती हूँ, उग्र—अधिक बनाती हूँ। ब्रह्मा (स्रष्टा), ऋषि (ज्ञानवान्) तथा शोभनप्रज्ञ बनाती हूँ। त्रिपुर-विजयके समय हिंसक, ब्रह्मद्विट् असुरके लिये रुद्रके धनुषको मैं ही विस्तृत करती हूँ, स्तोता जनोंके सुखार्थ मैं ही शत्रुओंसे संग्राम करती हूँ, मैं ही परमात्माके सर्वोपरि स्वरूपमें आकाशको बनाती हूँ। जैसे तन्तुमें पट होता है, वैसे ही आकाशादि कार्यजगत् परमात्मासे ही उत्पन्न होता है। समुद्र ('समुद्रवन्ति प्राणिनोऽस्मादिति समुद्रः परमात्मा')-रूप परमात्मामें जो व्याप्त बुद्धिवृत्तिरूप अप् (जल) है, उनके भीतर, बाहर, मध्यमें फैला हुआ जो अनन्त चैतन्य है, वही मुझ भगवतीका विश्वकारणभूत रूप है। अतएव मैं समस्त प्राणियोंमें व्याप्त होकर स्थित हूँ। कारणभूत मायामय निज देहसे द्युलोकादिको स्पर्शकर मैं स्थित हूँ। अथवा भूलोकके ऊपर पितर अर्थात् आकाशकी मैं रचना करती हूँ। समुद्रमें जलके भीतर मेरे कारणभूत अम्मय ऋषि हैं, उन्हीं महर्षिकी पुत्री होकर मैं देवीसूक्तका दर्शन करती हूँ। अथवा समुद्र अर्थात् अन्तरिक्षमें अपने अर्थात् अम्मय देवशरीरोंमें मेरा कारणभूत ब्रह्म चैतन्य रहता है, अतः मैं कारणभूत होकर सर्वत्र व्याप्त हूँ। मैं ही सम्पूर्ण भूतों और सभी कार्योंका आरम्भ करती हूँ। जैसे वात अन्य प्रेरणाके ही स्वयं कार्य करता है, वैसे ही परशक्तिरूपा मैं स्वेच्छासे ही सब काम करती हूँ। आकाश और पृथिवीसे पर मैं हूँ। असंग, उदासीन ब्रह्मचैतन्यरूपा मैं हूँ। भगवतीकी विविध विभूतियाँ सर्वप्रपंच एवं अवतारोंकी मूलभूता प्रथमा महालक्ष्मी हैं। तीनों गुणोंकी साम्यावस्थारूपा त्रिगुणा वे ही भगवती परमेश्वरी हैं। वे लक्ष्य-अलक्ष्य दो रूपवाली हैं। मायारूप लक्ष्य है, ब्रह्मरूप अलक्ष्य है। मायाशबल ब्रह्मरूपा भगवती ही त्रिगुणा परमेश्वरी हैं। जैसे घटादि कार्यमें कारणभूत मृत्तिका व्याप्त है, वैसे ही सम्पूर्ण विश्वमें वे व्याप्त हैं। हर एक पदार्थमें अस्ति, भाति, प्रिय यह तीन ब्रह्मके और नाम, रूप यह दो मायाके रूप हैं। उपर्युक्त सूक्ष्मरूपके अतिरिक्त उपासकोंके अनुग्रहार्थ भगवतीके अवतारस्वरूप स्थूलरूप भी प्रकट होते हैं। वे दक्षिण भागके नीचेके हाथमें पानपात्र, ऊपरके हाथमें गदा, वामभागके ऊपरके हाथमें खेटक, नीचेके हाथमें श्रीफल तथा नाग, लिंग एवं योनिको सिरमें धारण किये हुए, तप्त कांचनके समान दिव्य वर्णवाली हैं, तप्त ज्ञानशक्ति खेटक है, तुर्यावृत्ति (समाधि) पानपात्र है, लिंग पुरुषतत्त्व है, योनि प्रकृतितत्त्व है, नाग काल है। मातुलिंग (फल) ग्रहणसे भगवती यह सूचित करती हैं कि मैं ही सर्वकर्मफलदात्री हूँ। गदाधारणसे क्रियास्वरूप विक्षेपशक्ति और खेटधारणसे ज्ञान-शक्तिका अधिष्ठातृत्व ही बोधित किया गया है। नाग, लिंग, योनिधारणसे यह सूचित किया गया है कि प्रकृति, पुरुष और काल तीनोंका अधिष्ठान परब्रह्मरूपा मैं ही हूँ। 'ह्रीं' बीजका अभिप्राय भी यही है। ये ही भुवनेश्वरी हैं। सूक्तरूप भुवनेश्वरी और महालक्ष्मी दोनों एक ही हैं तथापि पाश, अंकुश, अभय, वरादि आयुधधारणसे भेद है। भगवती और सृष्टि प्राणियोंके परिपक्व कर्मोंका भोगद्वारा क्षय हो जानेपर प्रलय होता है। उस समय सब प्रपंच मायाके ही उदरमें लीन रहता है। माया भी स्वप्रतिष्ठ निर्गुण ब्रह्ममें लीन रहती है—'अव्यक्तं पुरुषे ब्रह्मन् निर्गुणे