भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 526

५१६ भक्तिसुधा है, उसकी शक्ति 'छिन्नमस्ता' है। विश्वका उपचय- अपचय तो हर समय ही होता रहता है, परंतु जब ह्रासकी मात्रा कम और विकास या आगमकी मात्रा ज्यादा रहती है, तब भुवनेश्वरीका प्राकट्य होता है। जब निर्गम (ह्रास) अधिक और आगम कम हो जाता है, तब छिन्नमस्ताका प्राधान्य होता है। उसका ध्यान यह है- प्रत्यालीढपदां सदैव दधतीं छिन्नं शिरः कर्तिकां दिग्वस्त्रां स्वकबन्धरशोणितसुधाधारां पिबन्तीं मुदा। नागाबद्धशिरोमणिं त्रिनयनां हृद्युत्पलालङ्कृतां रत्यासक्तमनोभवोपरिदृढां ध्यायेज्जवासन्निभाम्॥ दक्षे चातिसिताविमुक्तचिकुरां कर्त्रीं तथा खर्परं हस्ताभ्यां दधतीं रजोगुणभुवा नाम्नाऽपि सावार्णिनीम्। देव्याश्छिन्नकबन्धरतः पतदसृग्धारां पिबन्तीं मुदा नागाबद्धशिरोमणिर्मनुविदा ध्येया सदा सा सुरैः॥ प्रत्यालीढपदा कबन्धविगलद्रक्तं पिबन्तीं मुदा सैषा या प्रलये समस्तभुवनं भोक्तुं क्षमा तामसी। (छिन्नमस्तातन्त्र) छिन्नमस्ता भगवती छिन्नशीर्ष और कर्तरी एवं खप्परको लिये हुए स्वयं दिगम्बर रहती हैं। कबन्ध- शोणितकी धाराको पीती रहती हैं, कटे हुए सिरमें नागाबद्ध मणि विराजमान है और नील नयन हैं, हृदयमें उत्पलकी माला है, रत्यासक्त मनोभावके ऊपर विराजमान रहती है। (६) त्रिपुरभैरवी क्षीयमान विश्वका अधिष्ठाता दक्षिणामूर्ति कालभैरव हैं, उसकी शक्ति 'भैरवी' है। उसका ध्यान यह है- उद्यद्भानुसहस्त्रकान्तिमरुणक्षौमां शिरोमालिकां रक्तालिप्तपयोधरां जपवटीं विद्यामभीतिं वरम्। हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्दश्रियं देवीं बद्धहिमांमशुरत्नमुकुटां वन्देऽरविन्दस्थिताम्॥ (भैरवीतन्त्र) उदित होते हुए सहस्रों सूर्योंके समान अरुण- कान्तिवाली, क्षौमाम्बरको धारण किये एवं मुण्डमाला पहने हैं। रक्तसे उनके पयोधर लिप्त हैं, तीन नेत्र एवं हिमांशुबद्ध मुकुटको धारण किये तथा हाथमें जपवटी, विद्या, वर एवं अभयमुद्राको धारण किये रहती हैं। (७) धूमावती विश्वकी अमांगल्यपूर्ण अवस्थाकी अधिष्ठात्रीशक्ति 'धूमावती' है। यह विधवा समझी जाती है, अतएव यहाँ पुरुषका वर्णन नहीं है। यहाँ पुरुष अव्यक्त है, चैतन्य, बोध आदि अत्यन्त तिरोहित होते हैं। इसका ध्यान यह है- विवर्णा चञ्चला दुष्टा दीर्घा च मलिनाम्बरा। विमुक्तकुन्तला वै सा विधवा विरलद्विजा॥ काकध्वजरथारूढा विलम्बितपयोधरा। शूर्पहस्तातिरिक्षाक्षा धूतहस्ता वरानना॥ प्रवृद्धघोणा तु भृशं कुटिला कुटिलेक्षणा। क्षुत्पिपासार्दिता नित्यं भयदा कलहास्पदा॥ विवर्णा, चंचला, दुष्टा एवं दीर्घ तथा मलिन अम्बरवाली, खुले केशोंवाली, विरल दन्तवाली, विधवारूपमें रहनेवाली, काकध्वजवाले रथपर आरूढ़, लम्बे पयोधरवाली, हाथमें शूर्प लिये हुए, अत्यन्त रूक्ष नेत्रवाली, कम्पित हस्त, लम्बी नासिका, कुटिल स्वभाव, कुटिल नेत्रयुक्त, क्षुधा-पिपासासे पीड़ित, सदा भयप्रद और कलहकी निवास Ground रूपिणी है। (८) बगला व्यष्टिमें शत्रुसंहिजीर्षा, समष्टिमें परमेश्वरकी संहारेच्छाकी अधिष्ठात्री शक्ति 'बगला' है। इसका ध्यान यह है- जिह्वाग्रमादाय करेण देवीं वामेन शत्रून् परिपीडयन्तीम्। गदाभिघातेन च दक्षिणेन पीताम्बराढ्यां द्विभुजां नमामि॥ अर्थात् शत्रुके हृदयपर आरूढ़, वामहस्तसे शत्रुजिह्वाको खींचकर दक्षिण हस्तसे गदाप्रहार करनेवाली, पीतवस्त्र धारण की हुई बगला है। मध्ये सुधाब्धिमणिमण्डपरत्नवेदी सिंहासनोपरिगतां परिपीतवर्णाम्। पीताम्बराभरणमाल्यविभूषिताङ्गीं देवीं नमामि धृतमुद्गरवैरिजिह्वाम्॥