भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीभगवती-तत्त्व ५१५ पुरुषका स्पर्श करते ही प्रकृति प्रकृतित्वको छोड़कर पुरुषके साथ इस तरह मिल जाती है, जैसे नदी समुद्रमें मिल जाती है। अतस्त्वामाराध्यां हरिहरविरिञ्चादिभिरपि प्रणन्तुं स्तोतुं वा कथमकृतपुण्यः प्रभवति ॥ हरि, हर, विरंचि प्रभृतियोंसे परमपूज्य अम्बाको प्रणाम या उनका स्तवन किसी अकृतपुण्य प्राणीद्वारा नहीं हो सकता। भगवतीकी पूजा जैन-बौद्धोंमें भी होती रही है, विशेषतः ताराकी पूजाका रहस्य बुद्ध ही जानते थे। तारा ही द्वितीया रूपसे प्रसिद्ध हैं, सुतारा रूपसे वही जैनोंमें भी पूज्य हैं, अक्षोभ्य ही वहाँ अवलोकितेश्वररूपमें प्रसिद्ध हैं। क्षोभादिरहितो यस्मात् पीतं हालाहलं विषम्। अतएव महेशानि अक्षोभ्यः परिकीर्तितः॥ तेन सार्धं महामाया तारिणी रमते सदा। हलाहल विष पीनेपर भी जो क्षोभरहित रहे, वही शिव अक्षोभ्य हैं, उनके साथ रमण करनेवाली तारा है। मदीयाराधनाचारं बौद्धरूपी जनार्दनः। एक एव विजानाति नान्यः कश्चन तत्त्वतः॥ (ललितोपाख्यान) ताराकी ही उक्ति है कि बौद्धाचारसे ही उनका पूजन श्रेष्ठ है। तारिणी शक्तियोंसे विशिष्ट महाशक्ति तारा है। सीते वन्दामहे त्वार्वाची सुभगे भव यथा नः सुभगा ससि यथा न सुफला ससि। (तै० आ० ६।६।२) 'जनकस्य राज्ञः सद्मनि सीतोत्पन्ना सा सर्व- परानन्दमूर्तिर्गायन्ति मुनयोऽपि देवाश्च।' 'अनन्या राघवेणाहं भास्करेण यथा प्रभा।' 'ऐश्वर्यावचनः शक्तिः सा पराक्रम एव च। तत्स्वरूपा तयोर्दात्री सा शक्तिः परिकीर्तिता ॥' (३) षोडशी प्रशान्त हिरण्यगर्भ या सूर्य शिव है, उनकी शक्ति 'षोडशी' है। इनकी विग्रहमूर्ति पंचवक्त्र है। चारों दिशाओं एवं ऊर्ध्वदिशाके अभिमुख होनेसे उन्हें पंचवक्त्र कहते हैं। तत्पुरुष, सद्योजात, वामदेव, अघोर और ईशान यही इनके प्रसिद्ध नाम हैं। पूर्वा, पश्चिमा, उत्तरा, दक्षिणा, ऊर्ध्वदिक्के हरित, रक्त, धूम्र, नील, पीतरंगके मुख हैं। दस हाथोंमें अभय, टंक, शूल, वज्र, पाश, खड्ग, अंकुश, घण्टा, नाग और अग्नि लिये हैं। यह बोधरूप है— मुक्तापीतपयोदमौक्तिकजपावर्णैर्मुखैः पञ्चभि- स्त्र्यक्षैरञ्चितमीशमिन्दुमुकुटं पूर्णेन्दुकोटिप्रभम्। शूलं टङ्ककृपाणवज्रदहनान् नागेन्द्रपाशाङ्कुशान् पाशं भीतिहरं दधानममिता वाग्भ्यो ज्वलाङ्गं भजे ॥ इसमें षोडशकलाओंका पूर्णरूपसे विकास है, अतएव यह भी 'षोडशी' कहा जाता है। इस पंचवक्त्रकी शक्ति षोडशी है। इसका ध्यान इस प्रकार है— बालार्कमण्डलाभासां चतुर्बाहुं त्रिलोचनाम्। पाशाङ्कुशशरांश्चापं धारयन्तीं शिवां भजे ॥ (षोडशीतन्त्र) बालार्कमण्डलके समान आभावाली, सूर्य-सोम- अग्नि इन तीन नेत्रोंवाली, चतुर्भुज, पाश-अंकुश-चाप और शरको धारण किये हैं। (४) भुवनेश्वरी वृद्विगत विश्वका अधिष्ठाता त्र्यम्बक है, उसकी शक्ति 'भुवनेश्वरी' है। उसका स्वरूप बतलाते हुए शास्त्र कहते हैं— उद्यद्दिनद्युतिमिन्दुकिरीटां तुङ्गकुचां नयनत्रययुक्ताम्। स्मेरमुखीं वरदाङ्कुशपाशाभीतिकरां प्रभजे भुवनेशीम्॥ सोमात्मक अमृतसे विश्वका आप्यायन होता है, इसीलिये भगवतीने अपने किरीटमें चन्द्रमाको स्थान दे रखा है। त्रिभुवनका भरण-पोषण भगवती ही करती है। उसीका संकेत करमुद्रासे है। कृपादृष्टिकी सूचना उसके स्मेर (मृदुहास)-से है। शासनशक्तिका सूचक अंकुश-पाश आदिसे है। (५) छिन्नमस्ता विपरिणमान जगत्का अधिपति चेतन कबन्ध