भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 524

५१४ भक्तिसुधा जो देवी सर्वदेवशरीरोंसे उत्पन्न हुईं, वे महालक्ष्मी हैं। यद्यपि वे सहस्त्रभुज या अनन्त भुजावाली हैं तथापि साधक अष्टादशभुजारूपसे उनको पूजते हैं। उनका मुख शिव-समुद्भूत तेजसे बना है, अतः श्वेत है। भुजा विष्णुके अंशसे हुई है, अतः नील है। स्तनमण्डल सौम्यांशसे बने हैं, अतः सुश्वेत हैं। कटि इन्द्रांशसे हुई है, अतः रक्त है। चरण ब्रह्मांशजन्य होनेसे रक्त तथा जंघा और ऊरु वरुणांशजन्य हैं, अतः नील हैं। सुचित्रजघना, चित्रमाल्या और अम्बरको धारण किये हैं। दाहिने-वाम भागके नीचेके क्रमसे उसके निम्नलिखित आयुध हैं—अक्षमाला, कमल, बाण, असि, कुलिश, गदा, चक्र, त्रिशूल, परशु, शंख, घण्टा, पाश, शक्ति, दण्ड, चर्म, चाप, पानपात्र और कमण्डलु। इन महालक्ष्मीके पूजनसे सर्वलोकाधिपत्य मिलता है। सरस्वती आठ भुजाकी हैं। बाण, मुसल, शूल, चक्र, शंख, घण्टा, लांगल और कार्मुक उनके आयुध हैं। इनकी उपासनासे सर्वज्ञता मिलती है। दशमहाविद्या ( १ ) महाकाली पूर्वोक्त भगवतीके ही दस भेद और होते हैं। इसमें प्रथम महाकाली हैं। महाकाली प्रलयकालसे सम्बद्ध रहती हैं, अतएव वे कृष्णवर्णकी हैं। 'शक्तिविहीन विश्व शवरूप है'—यह दर्शानेके लिये वे शवपर आरूढ़ हैं। शत्रुसंहारकी शक्ति भयावह होती है, इसलिये कालीकी मूर्ति भी भयावह है। शत्रुसंहारके बाद योद्धाका अट्टहास भीषणताके लिये होता है, इसीलिये महाकाली हँसती रहती हैं। निर्बलके आक्रमणको विफलकर उसकी दुर्बलतापर हँसा जाता है, इसी तरह निर्बल विश्वके घमण्डको चूरकर भगवती हँसती हैं। पूर्ण वस्तुको चतुरस्र कहा जाता है, इसीलिये पूर्णतत्त्व चार भुजासे प्रकट हुआ करता है। इसीसे माँ कालीकी चार भुजाएँ हैं। वे स्वयं निर्भय हैं, उनका आश्रयण करनेवाले निर्भय होते हैं, इसीलिये भगवती ने अभय मुद्रा धारण की है। सांसारिक सुख क्षणभंगुर है, परमसुख भगवती ही हैं, जीवित विश्वका एवं मृत विश्वका भी आधार वे ही हैं। मृतप्राणियोंका भी एकमात्र सहारा है, यही द्योतन करनेके लिये देवीने मुण्डमाला पहनी है। विश्व ही ब्रह्मरूपा भगवतीका आवरण है, प्रलयमें सबके लीन होनेपर भगवती नग्न ही रहती हैं। सारे विश्वके श्मशानके तरनेपर उन तमोमयीका विकास होता है, इसीलिये वे श्मशान- वासिनी हैं— शवारूढां महाभीमां घोरदंष्ट्रां हसन्मुखीम्। चतुर्भुजां खड्गमुण्डवराभयकरां शिवाम्॥ मुण्डमालाधरां देवीं ललज्जिह्वां दिगम्बराम्। एवं सञ्चिन्तयेत् कालीं श्मशानालयवासिनीम् ॥ ( शाक्तप्रमोद-कालीतन्त्र) ( २ ) तारा हिरण्यगर्भावस्थामें कुछ प्रकाश होता है, प्रलयरूपी कालरात्रिमें ताराओंके समान सूक्ष्म जगत्के ज्ञान एवं तत्साधनोंका प्राकट्य होता है, उसी हिरण्यगर्भकी शक्ति 'तारा' है। सूर्य कोटि भी हिरण्यगर्भ कहा जाता है, सूर्य रुद्र भी कहे जाते हैं। उनका शान्त और घोर दो प्रकारका रूप होता है। हिरण्यगर्भ पहले क्षुधासे उग्र था, जब उसे अन्न मिलने लगा, तब शान्त हुआ। उसी उग्र हिरण्यगर्भकी शक्ति उग्रतारा है। प्रत्यालीढपदापिर्ताङ्घ्रिशवहृद्घोराट्टहासापरा खड्गेन्दीवरकर्त्रिखर्परभुजा हुङ्कारबीजोद्भवा। खर्वानीलविशालपिङ्गलजटाजूटैकनागैर्युता जाड्यं न्यस्य कपालकर्तृजगतां हन्त्युग्रतारा स्वयंम्॥ (शाक्तप्रमोद-तारातन्त्र) क्षुधातुर हिरण्यगर्भ भी संहारक होता है, अतः उसकी शक्ति तारा भी संहारिणी है। उसने चारों हाथोंमें जहरीले सर्प लिये हैं। सर्प भी संहारका सूचक है। वह भी शवपर प्रतिष्ठित है। मुण्ड और खप्परसे यह सूचित होता है कि वह भयानक होकर खप्परद्वारा विश्वका रसपान करती है। उसकी जहरीली रश्मियोंकी भयानकता दिखलानेके लिये जटाजूट नागका वर्णन है। प्रकृतिः पुरुषं स्पृष्ट्वा प्रकृतित्वं समुज्झति। तदन्तस्त्वेकतां गत्वा नदीरूपमिवार्णवे॥