भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 523

श्रीभगवती-तत्त्व [५१३]

कुछ लोग कहते हैं कि शिव, विष्णुके परस्पर ध्यानसे रूपमें परिवर्तन हो गया। स्थिर रखना तमका कार्य है, अतः पालकमें तमका परमापेक्ष है। अन्यत्र संहार होनेसे रुद्रमें तम, पालक होनेसे विष्णुको सत्त्वमय कहा गया है, कहीं निराकार और अव्यक्तको आकाशादिके समान श्याम रंगका व्यंजक माना जाता है, परंतु त्रिदेवियोंकी रूपव्यवस्था तो सर्वथा गुणोंके अनुसार है। त्रिदेवोंमें उत्पादक, पालक एवं संहारकको क्रमेण राजस, सात्त्विक, तामस कहा है। इन गुणोंके वश होनेसे जीव बद्ध होता है, उपर्युक्त त्रिदेव एवं त्रिदेवियाँ गुणोंके वश नहीं, अपितु गुणोंकी नियन्त्री हैं; अतः वे स्वतन्त्र हैं। इसके अतिरिक्त एक विशेषता और है, वह यह कि गुणोंका विमर्शवैचित्र्य होनेसे एक गुणके भीतर भी सब गुणोंका अस्तित्व होता है। जैसे तामसी प्रकृति जगत्का उपादान है, फिर भी उसके भीतर राजस और सात्त्विक अन्तःकरणादि होते हैं, तमोलेशानुविद्ध सत्त्वप्रधाना अविद्यामें भी तमोरज आदिके तारतम्यसे उत्कर्षापकर्ष होता है, वैसे ही विशुद्ध सत्त्वप्रधाना विद्या या मायामें भी सात्त्विक, राजस, तामस भेद होते हैं। उसी भेदसे ब्रह्मा, विष्णु आदि बनते हैं। यह ईश्वरकोटि है, इनकी उपाधि माया है, वह विशुद्ध सत्त्वप्रधाना होती है, फिर भी उत्पादकमें रज, पालकमें सत्त्व और संहारकमें तमका अंश रहता है। पूर्वोक्त रीतिसे भगवतीके महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती—ये तीन रूप प्रधान हैं। उपनिषदोंमें प्रकृतिको 'लोहित-शुक्ल-कृष्ण' कहा गया है; क्योंकि उसमें रजः, सत्त्व और तम यह तीन गुण होता है। किसी भी कार्यका सम्पादन करनेके लिये हलचल, प्रकाश और अवष्टम्भ अर्थात् रुकावट इन तीनोंकी अपेक्षा हुआ करती है। इनमेंसे एकके बिना कोई भी कार्य सम्पन्न नहीं होता, इसीलिये सृष्टिको त्रिगुणात्मिका कहा जाता है। प्रकाश सत्त्व है, हलचल रज और अवष्टम्भ तम है। रज रक्त है, सत्त्व शुक्ल है, तम कृष्ण है। केवल निर्विकार, कूटस्थ, चैतन्य कुछ कर नहीं सकता, गुणयोगसे ही कार्य हो सकता है, अतएव गुणोंका आश्रयण करनेसे ही त्रिदेवो एवं त्रिदेव भी तीन रंगके ही हैं। शंकर- सरस्वती ये दोनों भाई-बहन शुक्ल रूपके हैं। ब्रह्मा- लक्ष्मी दोनों भाई-बहन रक्त वर्णके हैं। विष्णु-गौरी ये दोनों भाई-बहन कृष्ण रंगके हैं। भाई-बहन ही प्रायः एक रंगके होते हैं, पति-पत्नीके एक रंग होनेका नियम नहीं होता। इसीलिये शिव-गौरी, विष्णु-लक्ष्मी, ब्रह्मा-सरस्वती ये दम्पती एक रंगके नहीं हैं। गौरीकी सरस्वती ननन्दा हैं, स्वयं उसकी भ्रातृजाया (भावज) हैं, सरस्वती लक्ष्मीकी भावज हैं, लक्ष्मी उसकी ननद हैं, लक्ष्मी गौरीकी ननद हैं। इसीलिये शिव, विष्णु, ब्रह्मामें भी श्यालक एवं भगिनीपतिका सम्बन्ध है। सृष्टिमें हलचल और ज्ञानशक्ति दोनोंकी अपेक्षा होती है। रजकी हलचल और सत्त्वकी ज्ञानशक्ति ही सृष्टि कर सकती है, इसीलिये ब्रह्माकी पत्नी सरस्वतीसे सृष्टि होती है। तमकी रुकावटसे और रजकी हलचलसे पालन होता है, अतएव विष्णुपत्नी लक्ष्मीसे पालन होता है। सत्त्वके प्रकाश एवं तमके अवष्टम्भसे संहार होता है, अतः शिवपत्नी गौरीसे संहार होता है। सर्वसत्त्वमयी भगवती साकार होकर अनेक नामोंवाली होती हैं, निराकाररूपसे तो कोई भी शब्दसे वाच्य नहीं है। ज्ञानानां चिन्मयातीता शून्यानां शून्यसाक्षिणी। यस्याः परतरं नास्ति सैषा दुर्गा प्रकीर्तिता॥ यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह। जो त्रिगुणा तामसी महाकाली हैं, वे ही हरिकी योगनिद्रा हैं, विष्णुको जगानेके लिये ब्रह्माने उनकी स्तुति की है। वे दश मुख, दश भुज, दश चरण और तीस विशाल नेत्रवाली हैं। यद्यपि शत्रुओंको उनका रूप बड़ा ही भयावना लगता है तथापि भक्तोंके लिये तो वे रूप, सौभाग्य और कान्तिकी एकमात्र प्रतिष्ठा हैं। खड्ग, बाण, गदा, शूल, चक्र, पाश, भुशुण्डि, परिघ, कार्मुक और सद्यःकृत्त सिर उनके हाथोंमें हैं। इनकी विधिपूर्वक पूजा करनेसे साधक चराचर विश्वको स्वाधीन कर लेता है।