भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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श्रीभगवती-तत्त्व

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एवं महती श्रीको प्राप्त करता है— 'माया वा एषा नारसिंही सर्वमिदं सृजति, सर्वमिदं रक्षति, सर्वमिदं संहरति। तस्मान्मायामेतां शक्तिं विद्यात्। य एतां मायां शक्तिं वेद, स मृत्युं जयति, स पाप्मानं तरति, सोऽमृतत्वं गच्छति, महतीं श्रियमश्नुते।' आप वैष्णवीशक्ति अनन्तवीर्या एवं विश्वकी बीजभूता माया हैं— 'त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया।' (श्रीदुर्गासप्तशती ११।५) इत्यादि वचनोंसे स्पष्ट मालूम पड़ता है कि मायारूपा ही भगवती है। उसीकी उपासनाका तत्र-तत्र स्थानोंमें विधान है। माया स्वयं जड़ है इत्यादि-इत्यादि। परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि यह सब पूर्वोक्त और निम्नलिखित प्रमाणोंसे विरुद्ध है— 'सर्वे वै देवा देवीमुपतस्थुः कासि त्वं महादेवीति॥ साब्रवीत्—अहं ब्रह्मस्वरूपिणी। मत्तः प्रकृतिपुरुषात्मकं जगत्।' (श्रीदेव्यथर्वशीर्ष १-२) अर्थात् देवताओंने देवीका उपस्थान करके उनसे प्रश्न किया कि 'आप कौन हैं?' देवीने कहा—'मैं ब्रह्म हूँ, मुझसे ही प्रकृति-पुरुषात्मक जगत् उत्पन्न होता है।' 'अथ ह्येषां ब्रह्मरन्ध्रे ब्रह्मरूपिणीमाजोति, भुवनाधीश्वरी तुर्यातीता' (भुवनेश्वर्युपनिषद्)। 'स्वात्मैव ललिता' (भावनोपनिषद्)। —इत्यादि वचनोंसे तुर्यातीत ब्रह्मात्मस्वरूपा ही भगवती हैं, यह स्पष्ट है। 'त्रिपुरातापनीय', 'सुन्दरीतापनीयादि' उपनिषदोंमें 'परोरजसे' इत्यादि गायत्रीके चतुर्थ चरणसे प्रतिपाद्य ब्रह्मके वाचकरूपसे 'ह्रीं' बीजको बतलाया है। 'काली' एवं 'तारोपनिषदों' में भी ब्रह्मरूपिणी भगवतीकी ही उपासना प्रतिपादित है। अतः संसारनाशाय साक्षिणीमात्मरूपिणीम्। आराधयेत् परां शक्तिं प्रपञ्चोल्लासवर्जीताम्॥ (सूतसंहिता) अर्थात् संसारनिवृत्तिके लिये प्रपंचस्फुरणशून्य, सर्वसाक्षिणी, आत्मरूपिणी, पराशक्तिकी ही आराधना करनी चाहिये। परा तु सच्चिदानन्दरूपिणी जगदम्बिका। सर्वाधिष्ठानरूपा स्याज्जगद्भ्रान्तिश्चिदात्मनि॥ (स्कन्दपुराण) अर्थात् सच्चिदानन्दरूपिणी परा जगदम्बिका ही विश्वकी अधिष्ठानभूता हैं, उन्हीं चिदात्मस्वरूपा भगवतीमें ही जगत्की भ्रान्ति होती है। सर्ववेदान्तवेद्येषु निश्चितं ब्रह्मवादिभिः॥ एकं सर्वगतं सूक्ष्मं कूटस्थमचलं ध्रुवम्। योगिनस्तत् प्रपश्यन्ति महादेव्याः परं पदम्॥ परात्परतरं तत्त्वं शाश्वतं शिवमच्युतम्। अनन्तप्रकृतौ लीनं देव्यास्तत् परमं पदम्॥ शुभं निरञ्जनं शुद्धं निर्गुणं द्वैतवर्जितम्॥ आत्मोपलब्धिविषयं देव्यास्तत् परमं पदम्। (कूर्मपुराण पू०वि० अ० १९।४८-४९, ५१-५२) —इत्यादि वचनोंसे निर्विकार, अनन्त, अच्युत, निरंजन, निर्गुण ब्रह्मको ही भगवतीका वास्तविक स्वरूप बतलाया गया है। देवीभागवतमें भी कहा है कि— निर्गुणा सगुणा चेति द्विधा प्रोक्ता मनीषिभिः। सगुणा रागिभिः सेव्या निर्गुणा तु विरागिभिः॥ अर्थात् निर्गुणा-सगुणा दो प्रकारकी भगवती हैं, रागिजनोंको सगुणा सेव्या हैं, विरागियोंको निर्गुणा सेव्या हैं। ब्रह्माण्डपुराणके 'ललितापाख्यान' में भी कहा है— 'चितिस्तत्पदलक्ष्यार्था चिदेकरसरूपिणी।' अर्थात् चिदेकरसरूपिणी चिति ही तत्पदकी लक्ष्यार्थस्वरूपा हैं। कहा जा सकता है कि 'फिर तो ब्रह्मस्वरूपता- बोधक वचनोंसे भगवतीके मायात्वबोधक वचनोंका विरोध अवश्य होगा।' परंतु ऐसा कहना उचित नहीं है; क्योंकि वेदान्तमें मायाको मिथ्या कहा गया है। मिथ्यापदार्थ