भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८६ भक्तिसुधा श्रीभगवती-तत्त्व महाचिति भगवतीमें सम्पूर्ण विश्व भासित अनन्तकोटिब्रह्माण्डात्मक प्रपंचकी अधिष्ठानभूता सच्चिदानन्दरूपा भगवती ही सम्पूर्ण विश्वको सत्ता, स्फूर्ति तथा सरसता प्रदान करती हैं। विश्वप्रपंच उन्हींमें उत्पन्न होता है, स्थित होता है, अन्तमें उन्हींमें लीन हो जाता है। जैसे दर्पणमें आकाशमण्डल, मेघमण्डल, सूर्य-चन्द्रमण्डल, नक्षत्रमण्डल, भूधर, सागरादि प्रपंच प्रतीत होता है, किंतु दर्पणको स्पर्श करके देखा जाय, तो वास्तवमें कुछ भी नहीं उपलब्ध होता, वैसे ही सदानन्दस्वरूप महाचिति भगवतीमें सम्पूर्ण विश्व भासित होता है। जैसे दर्पणके बिना प्रतिबिम्बका भान नहीं होता, दर्पणके उपलम्भमें ही प्रतिबिम्बका उपलम्भ होता है, वैसे ही अखण्ड, नित्य, निर्विकार महाचितिमें ही, उसके अस्तित्वमें ही प्रमाता, प्रमाण, प्रमेयादि विश्व उपलब्ध होता है। भान न होनेपर भास्यके उपलम्भकी आशा ही नहीं की जा सकती। महाचिति ही भगवती, आत्मा, पुरुष, ब्रह्म आदि शब्दोंसे व्यवहृत सामान्य रूपसे तो यह बात सर्वमान्य है कि प्रमाणाधीन ही किसी भी प्रमेयकी सिद्धि होती है, अतः सम्पूर्ण प्रमेयमें प्रमाण कवलित ही उपलब्ध होता है। प्रमाता, प्रमाण एवं प्रमेय—ये अन्योन्यकी अपेक्षा रखते हैं। प्रमाणका विषय होनेसे ही कोई वस्तु प्रमेय हो सकती है। प्रमेयको विषय करनेवाली अन्तःकरणकी वृत्ति प्रमाण कहला सकती है। प्रमेय- विषयक प्रमाणका आश्रय अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य ही प्रमाता कहलाता है। प्रमाताश्रित प्रमेयाकार वृत्तिको ही प्रमाण कहा जाता है। परंतु इन सबकी उत्पत्ति, स्थिति, गतिका भासक नित्य बोध आत्मा है। वही साक्षी एवं वही ब्रह्म कहलाता है। यद्यपि वह स्त्री, पुमान् अथवा नपुंसक नहीं है तथापि चिति, भगवती आदि स्त्रीवाचक शब्दोंसे, आत्मा; पुरुष आदि पुंबोधक शब्दोंसे, ब्रह्म, ज्ञान आदि नपुंसक शब्दोंसे व्यवहृत होता है। वस्तुतः स्त्री, पुमान्, नपुंसक—इन सबसे पृथक् होनेपर भी तादृक्-तादृक् (उस-उस) शरीरसम्बन्धसे या वस्तुसम्बन्धसे वही अचिन्त्य, अव्यक्त, स्वप्रकाश सच्चिदानन्दस्वरूपा महाचिति भगवती ही आत्मा, पुरुष, ब्रह्म आदि शब्दोंसे ही व्यवहृत होती हैं। मायाशक्तिका आश्रयण करके वे ही त्रिपुरसुन्दरी, भुवनेश्वरी, विष्णु, शिव, कृष्ण, राम, गणपति, सूर्य आदि रूपमें भी प्रकट होती हैं। स्थूल, सूक्ष्म, कारण—त्रिशरीररूप त्रिपुरके भीतर रहनेवाली सर्वसाक्षिणी चिति ही त्रिपुरसुन्दरी है। उसी मायाविशिष्ट तत्त्वके जैसे राम-कृष्णादि अन्यान्य अवतार होते हैं, वैसे ही महालक्ष्मी, महासरस्वती, महागौरी आदि अवतार होते हैं। यद्यपि श्रीभगवती नित्य ही हैं तथापि देवताओंके कार्यके लिये वे समय-समयपर अनेक रूपोंमें प्रकट होती हैं। वे जगन्मूर्त्ति भगवती नित्य ही हैं, उन्हींसे चराचर प्रपंच व्याप्त है तथापि उनकी उत्पत्ति अनेक प्रकारसे होती है। देवताओंके कार्यके लिये जब वे प्रकट होती हैं, तब वे नित्य होनेपर भी 'उत्पन्न हुईं' कही जाती हैं— नित्यैव सा जगन्मूर्त्तिस्तया सर्वमिदं ततम्॥ तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम। देवानां कार्यसिद्धयर्थमाविर्भवति सा यदा॥ उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते। (श्रीदुर्गासप्तशती १।६४-६६) भगवती मायारूपा नहीं है कुछ लोगोंका कहना है कि 'शास्त्रोंमें मायारूपा भगवतीकी ही उपासना कही गयी है, माया वेदान्त- सिद्धान्तानुसार मिथ्याभूत है, मुक्तिमें उसकी अनुगति नहीं हो सकती, अतः भगवतीकी उपासना अश्रद्धेय है। 'नृसिंहतापनी' में ऐसा स्पष्ट उल्लेख है कि नारसिंही माया ही सब प्रपंचकी सृष्टि करती है, वही सबकी रक्षा करती है, वही सबका संहार करती है, उसी मायाशक्तिको जानना चाहिये। जो उसे जानता है, वह मृत्युको तरता है, पाप्माको तरता है, अमृतत्व