भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअपने आत्माको ब्रह्म और ब्रह्मको आत्मा समझ लेता है, अपनेको ब्रह्ममें होम देता है। फिर 'अहं ब्रह्म' की भावनासे निस्तरंग, अद्वैत, अपारनिरतिशय सच्चिदानन्द, ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। जो इस मार्गसे सम्यक् अभ्यास करता है, वह अवश्य ही नारायण हो जाता है। 'त्रिपाद्विभूतिमहानारायणो- पनिषद्' में इस विषयपर बड़ा ही सुन्दर विवेचन है, यहाँ तो उसका सारांशमात्र ही दिया गया है। लोक-लोकान्तरों एवं भगवद्विग्रह विलासादिका निरूपण इसमें साम्प्रदायिक वैष्णवों एवं शैवोंसे भी सुन्दर है। विशेषता यह है कि यहाँ अद्वैतसिद्धान्तके पोषणमें पूर्ण ध्यान रखा गया है। शुद्धसत्त्वमयी शक्तिसंसृष्ट, चिदानन्दप्रधान तत्त्वमें अनन्तानन्तवैकुण्ठादिका सभी तारतम्य मान्य है। शक्त्यतीत तत्त्व सर्वथा निराकार, निर्विकार, निर्विशेष ही है। शक्तिकी अनिर्वचनीयताके कारण वस्तुतः शक्तिसंसृष्ट भी सर्वदा, सर्वथा सर्वातीत ही है, अतः वह सर्वदा, सर्वथा, सर्वदेश, काल एवं वस्तुओंसे अतीत है। इसीलिये उससे व्यतिरिक्त कहीं कुछ भी नहीं है, सब कुछ वही है। इस दृष्टिको लेकर पुराणोंमें भगवल्लोकों एवं स्वरूपोंका वर्णन है। श्रीभागवतमें श्रीकृष्ण-प्रदर्शित विभूतियोंमें ब्रह्माको अपरिगणित विष्णु परिलक्षित हुए थे और उन सभीको मूर्तिमान् चतुर्विंशति तत्त्वोंसे उपासित बतलाया है और सभीको सत्यज्ञानानन्तानन्दैकरस बतलाया है— सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तयः । अस्पृष्टभूरिमाहात्म्या अपि ह्युपनिषददृशाम् ॥ (श्रीमद्भा० १०।१३।५४) अर्थात् वे सभी स्वरूप सत्यज्ञानानन्तानन्द- मात्रैकरसमूर्ति ही हैं। जैसे शैत्यके कारण निर्मल जल ही बर्फ बनता है, वैसे ही विशुद्ध सत्त्वके कारण निर्मल, निर्विकार, एकरस ब्रह्म ही उन मूर्तियोंके रूपमें व्यक्त है। पुनश्च, वे ऐसे महामहिम वैभवशाली स्वरूप थे, जिनके बहुत-से माहात्म्योंको और तो क्या, उपनिषददर्शी भी नहीं स्पर्श कर सकते। ठीक ही है, भगवान्के अनन्त माहात्म्यको सामस्त्येन कोई भी नहीं जान सकता। अनन्त होनेसे भगवान् भी उनका अन्त नहीं पा सकते। इन्हीं सिद्धान्तोंके अनुसार श्रीप्रबोधानन्द सरस्वतीने वृन्दावन-शतकमें श्रीवृन्दावनधामको चिदानन्दमय कहा है। यहाँकि प्रत्येक वृक्षों, लताओं, दूर्वाओं एवं तृणोंकी भी अपार महिमा कही गयी है, सब वस्तुओंको केवल परमानन्द सुधासमुद्रका विलास कहा है। इतना ही नहीं 'जहाँ प्रवेशमात्रसे सब जन्तु सच्चिदानन्दघनताको प्राप्त हो जाते हैं,' उन्होंने ऐसा भी कहा है—"यत्र प्रविष्टः सकलोऽपि जन्तुः आनन्दसच्चिद्घनतामुपैति" (वृन्दावन-शतक)। इतनेसे ही कुछ साम्प्रदायिक कहने लगते हैं कि उन्होंने अद्वैत-सिद्धान्तको छोड़कर मतान्तरका ग्रहण कर लिया है। परंतु जो अद्वैत-सिद्धान्तसे परिचित हैं, वे जानते हैं कि इस तरहका वर्णन अद्वैतवादको छोड़कर अन्यत्र कहीं बन ही नहीं सकता। 'ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले' (मुण्डक० ३।२।६)। —इस श्रुतिमें 'ब्रह्मलोकेषु' इस बहुवचनसे यहाँ मालूम पड़ता है कि सविशेष ब्रह्मलोक एक ही नहीं, किंतु बहुत हैं। दूसरे यह भी मालूम पड़ता है कि सर्वमूर्धन्य, सर्वोत्कृष्ट लोक ही शैवोंको परम शिवलोकके रूपमें, वैष्णवोंको परम वैकुण्ठके रूपमें, कृष्ण-भक्तोंको गोलोकधामके रूपमें, राम-भक्तोंको साकेतधामके रूपमें, परमशाक्तोंको मणिद्वीपके रूपमें भासमान होता है। सगुण, सविशेष ब्रह्मके उपासकोंको उनके इष्टदेवके रूपमें भासमान होता है। वही निर्गुण विष्णुतत्त्व ज्ञानवालोंको निर्विशेष ब्रह्मके रूपमें प्रत्यक्ष होता है।