भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतलवार एवं अन्धकारको ही चर्म (ढाल)-के रूपमें, कालको शार्ङ्गधनुषके रूपमें, कर्मोंको ही निषंगके रूपमें भगवान्ने धारण किया है। इन्द्रियाँ ही भगवान्के तूणीरमें रहनेवाले बाण हैं, क्रियाशक्तियुक्त मन ही रथ है, शब्दादि पंचतन्मात्रा इस रथका अभिव्यक्त रूप है। जैसे रथारूढ़ होकर व्यक्ति तूणीरसे बाण निकालकर धनुषपर रखकर सन्धान करता है, वैसे ही क्रियाशक्तियुक्त मनपर आरूढ़ होकर प्रत्यक्चैतन्याभिन्न भगवान् ही कालरूप धनुषपर इन्द्रियोंको प्रतिष्ठित करके उनका सन्धान करते हैं। वर, अभय आदिकी मुद्राओंके रूपमें भगवान् अर्थ-क्रिया (प्रयोजनसम्पत्ति)-को धारण करते हैं। देव-पूजा स्थल सूर्यमण्डल है, दीक्षा ही पूजा-योग्यता-सम्पत्ति है, भगवान्की परिचर्या ही अपने सम्पूर्ण दुरितोंके क्षयका कारण है। भग शब्दार्थ-ऐश्वर्य-षाड्गुण्य ही भगवान्के श्रीहस्तमें विराजमान लीलाकमल है। इस दृष्टिसे प्रथम वर्णित कमल आसनभूत कमल है। धर्म और यश ही भगवान्के ऊपर डुलनेवाले चमर और व्यजन हैं, अकुतोभय वैकुण्ठधाम ही छत्र है, वेदत्रयीरूप गरुड़ ही यज्ञस्वरूप भगवान्के वाहन हैं, ऋग्यजुःसाम- इन्हीं तीनों वेदोंसे ही यज्ञकी सम्पत्ति होती है, अतः वेदात्मा ही गरुड़ हैं, यज्ञस्वरूप विष्णु ही उनपर विराजमान होकर चलते हैं। चिद्रूपा भागवती शक्ति ही भगवत्प्रिया लक्ष्मी हैं, भगवदुपासना-विधायक पांचरात्रादि आगम ही पार्षदाधिप विष्वक्सेन हैं। अणिमा, महिमा आदि अष्ट विभूतियाँ ही भगवान्के नन्द, सुनन्दादि पार्षद हैं। वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्धरूपसे विराट्, हिरण्यगर्भ, अव्याकृत, ब्रह्म, विश्व, तैजस, प्राज्ञ, तुरीयादि रूपमें भी उन्हीं चतुर्व्यूह, चिन्मूर्ति भगवान्का स्वरूप वर्णित है। ये भगवान् वेदोंके भी कारण हैं। स्वयंदृक् एवं स्वमहिमपूर्ण हैं। परमार्थतः सर्वविध-भेदविवर्जित होनेपर भी भगवान् अपनी शक्तिभूता मायासे ही विश्वका उत्पादन, पालन एवं संहरण करते हैं, अतएव ब्रह्मरूप विष्णु इन आख्याओंसे, अनाच्छन्नज्ञान होते हुए भी विभिन्न रूपोंमें प्रतीत होते हैं। फिर भी वे वस्तुतः भिन्न नहीं हैं; क्योंकि तत्त्वदर्शी विद्वानोंको आत्मरूपसे ही भगवान्का उपलम्भ होता है। भगवद्धाम श्रीभगवान् तुर्य एवं तुर्यातीतरूपसे निर्गुण, निष्क्रिय, निर्मल, निरवद्य, निरंजन, निराकार, निराश्रय, निरतिशयाद्वैत-परमानन्दस्वरूप हैं। सन्देह हो सकता है कि शुद्धाद्वैत परमानन्दपरब्रह्ममें वैकुण्ठ, प्रासाद, प्राकार, विमानादि अनन्त वस्तुभेद कैसे हुए? यदि ये सब हैं, तो निर्विशेषाद्वैत कैसे ? इसका समाधान यह है कि जैसे शुद्ध सुवर्णमें कटक, मुकुट, अंगदादि अनेक भेद होते हैं, जैसे समुद्र-जलमें स्थूल-सूक्ष्म तरंग हैं, जैसे समुद्र-जलमें सूक्ष्म तरंग, फेन, बुद्बुदादि भेद होते हैं, जैसे भूमिमें पर्वत, वृक्ष, तृण, गुल्म, लतादि अनन्त वस्तु-भेद होते हैं, वैसे ही अद्वैत परमानन्द ब्रह्ममें वैकुण्ठादि भेद उपपन्न हो जाते हैं। सब कुछ भगवान्का स्वरूप ही है, भगवद्व्यतिरिक्त अणुभर भी कुछ नहीं है— मत्स्वरूपमेव सर्वमद्व्यतिरिक्तमणुमात्रं न विद्यते। 'परममोक्ष सर्वत्र एक ही है, फिर अनन्तवैकुण्ठ, अनन्त आनन्द-समुद्रादि कैसे संगत होंगे?' इस शंकाका समाधान यह है कि अविद्या पादमें ही जब अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड हैं, तब एक-एक ब्रह्माण्डमें वैकुण्ठ तथा विविध विभूतियोंमें क्या आपत्ति है ? फिर तीनों पादोंके वैकुण्ठोंके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है ? निरतिशयानन्दाविर्भाव मोक्ष है, यह त्रिपाद ब्रह्ममें सर्वदा प्रकट रहता है। वह पादत्रय ही परम वैकुण्ठ एवं परम कैवल्य है, इसलिये अविद्या, विद्या, आनन्द और तुर्य—इन चारों पादोंमें अनन्त वैकुण्ठ, अनन्त आनन्द-समुद्रादि ठीक ही है। इस तरह उपासक परम वैकुण्ठमें पहुँचकर भगवान्का ध्यान करके निरतिशयाद्वैत-परमानन्दस्वरूप होकर, सावधानीसे अद्वैत योगमें स्थित होकर, अद्वैत परमानन्दका अनुसन्धान करके स्वयं शुद्धबोधा- नन्दस्वरूप होकर महावाक्यका स्मरण करता हुआ