भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 493, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीविष्णु-तत्त्व ४८३ कृष्णरूप होता है— ‘शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गतः॥’ (श्रीमद्भा० १०।८।१३, १०।२६।१६) इस दृष्टिसे कलिनियामक होनेसे भगवान् श्यामल हैं। भगवान्के आभूषणों एवं आयुधोंका रहस्य भगवान् जीव-चैतन्य ज्योतिःसमूहको ही कौस्तुभमणिके रूपमें धारण करते हैं। वेदान्तसिद्धान्तके अनुसार एक, अखण्ड, अनन्त, सच्चिदानन्द भगवान्के ही समाश्रित सम्पूर्ण जीव-चैतन्य होते हैं, अतः अवश्य ही जीव भगवान्के भूषण हो सकते हैं। विशेषतः भगवत्प्राप्त भगवद्भक्त तो अवश्य ही भगवान्के कण्ठके देदीप्यमान, चमत्कारपूर्ण भूषण बनते ही हैं। भक्त लोग तभी तो इनसे ईर्ष्या करते हैं— अहो सुमनसो मुक्ता वज्राण्यपि हरेरुरः। न त्यजन्ति वयं तत्र का वा स्मरवशाः स्त्रियः ॥ (गोपालचम्पू पूर्व० १७।१०५) अर्थात् अहो! मुक्ता (मोती) एवं सुमनस् (पुष्प) (पक्षान्तरमें मुक्तलोग तथा देवतालोग) वैदूर्यादि वज्रक (पक्षान्तरमें कूटस्थब्रह्मभावापन्न लोग) भी जब श्रीहरिके उरःस्थलको छोड़ना नहीं चाहते, तब भला स्मरवशा गोपांगनाएँ कैसे भगवान्को छोड़ दें? उस कौस्तुभमणिकी व्यापिनी साक्षात् प्रभाको ही श्रीवत्सके रूपमें भगवान् धारण करते हैं। दक्षिण वक्षःस्थलपर कमलनाल-तन्तुके सदृश दक्षिणावर्त श्वेत रोमराजि ‘श्रीवत्स’ कही जाती है। वाम वक्षःस्थलपर वामावर्त सुवर्णवर्णा रोमराजि लक्ष्मीका चिह्न है। एतावता भोक्तृवर्गका सार तथा भोग्यवर्गका सार श्री एवं श्रीवत्सके रूपमें भगवान्के वक्षःस्थलपर विराजमान है। ऐश्वर्याधिष्ठात्री महाशक्ति भगवती लक्ष्मी ‘श्री’ है। परमात्मकर्तृक गर्भाधानकी महिमासे श्रीप्रसूतजीवन चैतन्यसार ‘श्रीवत्स’ है। श्री वामवक्षः- स्थलमें और श्रीवत्स दक्षिणवक्षःस्थलमें है और बीचमें भृगुचरण चिह्न है। एतावता विप्रचरणारविन्दका समादरपूर्वक सेवन करनेसे ही श्री एवं श्रीवत्सकी प्राप्ति सूचित होती है। नाना गुणमयी त्रिगुणात्मिका माया ही ‘वनमाला’ है। परमसौगन्ध्यमय तथा अनेक रंगके तुलसी, कुन्द, मन्दार, पारिजात सरोरुहोंसे विरचित माला त्रिगुणात्मिका प्रकृतिके ही मनोहर पुष्पोंकी बनी समझनी चाहिये। छन्दःसमूह ही भगवान्का पीताम्बर है। जैसे—छन्दोंसे भगवान्का स्वरूप चमत्कृत एवं शोभित होता है, वैसे ही पीताम्बरसे भगवान्का स्वरूप चमत्कृत एवं सुशोभित होता है, किन्हीं- किन्हीं स्थानोंपर मोहिनी मायाको ही पीताम्बर बतलाया गया है। जैसे मायाकी निजी चमक-दमकसे ब्रह्मस्वरूप तिरोहित हो जाता है, वैसे ही पीताम्बरसे भगवान्का मंगलमय श्रीअंग आवृत्त रहता है। मायाके चाकचिक्यसे अनासक्त एवं अप्रभावित ही जैसे भगवत्स्वरूपको जानता है, वैसे ही पीताम्बरकी चमक-दमकको पार करनेपर ही भगवत्स्वरूपका उपलम्भ होता है। छन्दोंको भी पहले छादक बतलाया गया है— ‘छन्दांसि यस्य पर्णानि’ (गीता १५।१) त्रिवृत् अर्थात् त्रिमात्र प्रणव ही भगवान्का उपवीत है। सांख्य एवं योगको भगवान्ने मकराकृत कुण्डलके रूपमें कानोंमें धारण कर रखा है। पारमेष्ठ्य पद ही भगवान्का मुकुट है। अनन्त नामक अव्याकृत ही भगवान्का आसन है। प्रकृतिरूप समष्टि कारणदेहाभिमानी चैतन्य ही अव्याकृत कहलाता है, उसीको शेष भी कहा जाता है। कार्य-प्रपंचके प्रलय हो जानेपर जो अवशिष्ट रहता है, वही शेष है। उन अनन्तशेषरूप अव्याकृतपर ही चतुर्भुज मूर्ति भगवान् विष्णु विराजते हैं। यों भी अव्याकृतके ऊपर ही कार्य-कारणातीत तुरीयतत्त्व विद्यमान रहते हैं। चतुर्वर्गप्रद, चतुर्वेदात्मा, चतुर्युग, चतुरस्र भगवान्की चार भुजाएँ हैं। एक हाथमें वे धर्म-ज्ञानादियुक्त सत्त्वमय पद्मको धारण किये हैं। पद्मकी ही सुन्दरता, मधुरता, सरसता, सुगन्धता धर्मादिमय सत्त्वमें होती है। ओज, बलादियुक्त, प्राणतत्त्व ही भगवान्की गदा है। उन्होंने जलतत्त्वको शंखके रूपमें, तेजस्तत्त्वको सुदर्शनके रूपमें दो हाथोंमें धारण कर रखा है। आकाशतत्त्वको ही