भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीविष्णु-तत्त्व ४८१

असत्यसंकल्पता होनेसे अर्थसिद्ध अनीश्वरता हुई। अतः जगत्का उत्पादक, पालक, संहारक एक ही परमेश्वर है। उसका किसी भी नामसे भले ही व्यवहार हो, परंतु प्रमाणभूत शास्त्रसे जिसमें जगत्कारणत्व, सर्वज्ञत्व, सर्वशक्तिमत्त्वादि अवगत हों, उसे ही परमेश्वर समझा जा सकता है। विष्णु, रुद्र, ब्रह्मा आदि नामोंके अतिरिक्त आकाशादि शब्दोंसे भी जगत्कारणत्वादि हेतुओंसे परमेश्वरका ही बोध होता है। अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्ति-स्थिति- प्रलयकारिणी ब्रह्मनिष्ठमहाशक्ति ही सम्पूर्ण अवान्तर अचिन्त्य अनन्त शक्तियोंकी केन्द्र है। उन्हीं शक्तियोंसे अनन्त ब्रह्माण्ड बनते हैं। प्रत्येक ब्रह्माण्डकी शक्तियोंमें तमःप्रधान शक्तिसे भूत—भौतिक प्रपंचकी सृष्टि होती है। तामस भूतोंमें भी सत्त्व, रज, तम आदिका अंश रहता है, अतएव सात्त्विक भूतोंसे अन्तःकरण एवं ज्ञानेन्द्रियाँ, राजससे प्राण एवं कर्मेन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं। तामससे स्थूलभूत बनते हैं। ब्रह्माण्डशक्तिके तामस अंशसे जैसे उपर्युक्त प्रपंच बनता है, वैसे ही रजस्तमोलेशानुविद्ध सत्त्वांशसे अविद्या एवं रज आदिसे अननुविद्ध सत्त्वसे विद्या या मायाका आविर्भाव होता है। अविद्याएँ रज आदिके अनुवेध-वैचित्र्यसे अनन्त हैं, अतः उनमें प्रतिबिम्बित चैतन्यरूप जीव भी अनन्त हैं। जो लोग अविद्याको भी एक ही मानते हैं, उनके मतसे जीव भी एक ही होता है। विशुद्धसत्त्वप्रधाना विद्यामें भी अंशतः सत्त्व, रज, तम होते हैं। उसी सत्त्वप्रधाना शक्तिस्वरूपा विद्याके सात्त्विक अंशसे विष्णु, राजस अंशसे ब्रह्मा और उसी विद्याके तामस अंशसे रुद्रका आविर्भाव होता है। अवान्तरशक्तिके ही विभागके समान ही महाशक्तिके भी विभाग समझने चाहिये। महाशक्तिके तमःप्रधान अंशसे पंच तन्मात्रादि जड़वर्गका, अशुद्ध (मलिन) सत्त्वप्रधान शक्तिसे प्राज्ञसंज्ञक जीववर्गका और विशुद्ध सत्त्वप्रधानशक्तिसे महेश्वरका आविर्भाव होता है। महाशक्तिविशिष्ट ब्रह्म एक ही है, अतः एक ब्रह्मका ही तमःप्रधाना मायाके योगसे भोग्य, मलिन सत्त्वप्रधाना प्रकृतिरूपा अविद्याके योगसे भोक्ता तथा विशुद्ध सत्त्वप्रधाना मायाके योगसे महेश्वरके रूपमें आविर्भाव समझा जाता है। भोग्यवर्ग एवं भोक्तृवर्गकी एकता-अनेकताका प्रश्न उठ सकता है, परंतु महेश्वरकी अनेकताका प्रश्न ही नहीं उठ सकता। उत्पत्ति- स्थिति-लयका कारण एक ही है तथापि उत्पत्तिकारण- त्वादिकी पृथक्-पृथक् विवक्षासे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि कहा जाता है। तमःप्रधानशक्तिविशिष्ट चित्में उपादानता तथा विशुद्धसत्त्वप्रधान विद्याशक्तिविशिष्टमें निमित्तता होनेपर भी एक मूलप्रकृतिविशिष्ट ब्रह्म ही जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है, उसमें नानात्व नहीं है। उपादानसे कार्यकी सदृशता होती है, अतः जड़कार्यके अनुरूप ही तमःप्रधानशक्तिविशिष्ट पंच तन्मात्राओंमें जड़ताके अनुरोधसे उपादानता मानी गयी है। निमित्तमें कुलालादिके सदृश कार्यसे विलक्षणता होती है, अतः तदनुरूप ही विद्याविशिष्ट महेश्वरमें निमित्तकारणता मानी गयी है। सर्वापेक्षया प्रबल ही सर्वसंहारक होता है, वही पालक भी हो सकता है; वही विश्वका उत्पादक भी है। अनन्त- ब्रह्माण्डनायक भगवान्को ही 'विष्णु', 'पद्म' आदि पुराणोंमें विष्णु; 'रामायण', 'भारत' आदिमें राम, कृष्ण आदि रूपमें गाया गया है। 'शिव-स्कन्दादि' पुराणोंमें वही शिव 'रुद्र' आदि नामोंसे कहा जाता है। शिवपरक पुराणोंमें कार्यविष्णु अर्थात् एक-एक ब्रह्माण्डके विष्णुका वर्णन है, इसीलिये उनका कुछ अपकर्ष भी भासित होता है। विष्णुपरक पुराणोंमें शिव भी कार्यान्तःपाती ही हैं। अनन्तब्रह्माण्डनायककी प्राप्तिमें अपकर्षककी कल्पना भी संगत ही है। फलतः अनन्तब्रह्माण्डनायक परब्रह्म परमात्मा ही वेद, रामायण, भारत, पुराण आदिमें अनेक रूपों एवं नामोंसे गाये गये हैं। वे ही भगवान् 'विष्णु' शब्दसे प्रसिद्ध हैं। जगत्पालनके लिये भगवान् विष्णुमें सर्वातिशायी ऐश्वर्य जगत्के पालनमें सर्वातिशायी ऐश्वर्यकी अपेक्षा