भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 490

४८० भक्तिसुधा श्रीविष्णु-तत्त्व व्याप्त्यर्थक 'विष्लृ' धातुसे विष्णु शब्दकी निष्पत्ति होती है, तथा च व्यापक परब्रह्म परमात्माको ही 'विष्णु' कहा जाता है। 'यतो वा इमानी भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्त्यभि संविशन्ति।' (तैत्तिरीय० ३।१) —इस श्रुतिके अनुसार यही मालूम पड़ता है कि सम्पूर्ण जगत्की जिससे उत्पत्ति होती है, जिसमें स्थिति होती है और जिसमें विलय होता है, वही ब्रह्म है। विशेषरूपसे अनन्तकोटिब्रह्माण्डोत्पादिनी शक्तिमें कार्योत्पत्तिके लिये प्रकाशात्मक सत्त्व, चलनात्मक रज तथा अवष्टम्भात्मक तमकी अपेक्षा होती है। तत्तद्गुणोंकी प्रधानतासे ब्रह्म ही रजके सम्बन्धसे ब्रह्मा, तमके सम्बन्धसे रुद्र एवं सत्त्वके सम्बन्धसे विष्णु बन जाता है। प्रकारान्तरसे उत्पादिनीशक्तिविशिष्ट ब्रह्म 'ब्रह्मा', संहारिणीशक्तिविशिष्ट ब्रह्म 'रुद्र' तथा पालिनीशक्तिविशिष्ट ब्रह्म 'विष्णु' शब्दसे व्यवहृत होता है। प्रकारान्तरसे समष्टि-कारणप्रपंचाभिमानी अव्याकृत रुद्र, समष्टि-सूक्ष्मप्रपंचाभिमानी हिरण्यगर्भ विष्णु और समष्टि-स्थूलप्रपंचाभिमानी विराट् ब्रह्मा कहा जाता है। मुख्यरूपसे अव्यक्तादिके नियामक अन्तर्यामीको ही रुद्र, विष्णु, ब्रह्मा आदि कहा जाता है। जहाँ-कहीं उपासना-विशेषके कारण किसी जीवका ब्रह्मा होना सुना जाता है, वह अन्तर्यामी न होकर अभिमानी ही समझा जाना चाहिये। 'स एकाकी न रेमे', 'सोऽबिभेत्' —इत्यादि श्रुतिवचनोंमें जहाँ हिरण्यगर्भमें भय, अरमण आदिका श्रवण है, वहाँ हिरण्यगर्भमें जीवभावका ही निर्णय किया गया है; क्योंकि परमेश्वरमें भय, अरमण आदि कथमपि सम्भव नहीं। अभिमानी जीव भी हो सकता है, परंतु अन्तर्यामी सर्वत्र परमेश्वर ही है। पुराणोंमें ब्रह्माण्डोंकी अनन्तताका पता लगता है, अतएव तदनुसार विराट्, हिरण्यगर्भ आदिकोंकी भी अनन्तता ही मालूम पड़ती है। उत्पादक-पालक- संहारक-दृष्टिसे ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्रकी अनन्तता ही सिद्ध होती है। अन्तर्यामी होनेसे सभी परमेश्वर ही हैं। इस विचारसे उपनिषदोंका विराट् पुराणोंका महाविराट् है। अनन्तकोटिब्रह्माण्डात्मक समष्टि- स्थूल प्रपंचका एकमात्र अभिमानी एवं अन्तर्यामी उपनिषदोंका विराट् है। यही बात हिरण्यगर्भ और अव्यक्तके सम्बन्धमें भी समझनी चाहिये। तदनुसार ही अनन्तकोटि-ब्रह्माण्डात्मक सम्पूर्ण विश्वके उत्पादक ब्रह्मा, पालक विष्णु और संहारक रुद्र सर्वथा एक ही हैं। वे ही महाविष्णु, महारुद्र आदि नामोंसे भी यत्र- तत्र व्यवहृत होते हैं। जैसे गोधूमादि सस्योंका एक ही किसान उत्पादक, पालक तथा लावक (काटनेवाला) होता है, वैसे ही विश्वका भी उत्पादक, पालक, संहारक एक ही है, अन्यथा सर्वशक्तिमान् विष्णु परमात्मासे पालित जगत्‌का संहार दूसरा कैसे कर सकता है? यदि सर्वसंहारक रुद्रको ही परमेश्वर मानें, तो फिर संजिहीर्षित विश्वको पालनेवाला कौन हो सकता है? यदि विष्णुसे भिन्न ही रुद्र हैं, तब सर्वसंहारक रुद्रके द्वारा विष्णुके भी संहारका अवसर उपस्थित हो जायगा, अतएव विष्णु एवं रुद्र दोनोंको एक ही परमेश्वर मानना समुचित है। अनेक ईश्वरका मानना युक्तिविरुद्ध कोई भी संहारक अपनी अन्तरात्माका संहार नहीं कर सकता है। तभी सर्वसंहारक शिवका आत्मा होनेसे विष्णु बने रहते हैं। अनेक ईश्वरका मानना सर्वथा युक्तिविरुद्ध भी है; क्योंकि जब दोनोंमें मतभेद होगा और साथ ही विरुद्ध प्रकारके संकल्प होंगे, तब दो ईश्वर कथमपि नहीं टिक सकेंगे। यदि परस्परके विरुद्ध संकल्पसे दोनोंहीके संकल्प प्रतिरुद्ध होकर वितथ हो गये, तब तो दोनों ही अनीश्वर सिद्ध होंगे। यदि एकके संकल्पसे दूसरेका संकल्प कट गया, तो सिद्धसंकल्प ही परमेश्वर हुआ, तदतिरिक्तमें