भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 489

शिवलिङ्गोपासना-रहस्य ४७९ 'स्थिरैरङ्गैः पुरुरूप उग्रो बभ्रुः शुक्रेभिः पिपिशे हिरण्यैः।' यहाँ रुद्रको पुरुरूप, असाधारण तेजस्वी और बभ्रुवर्ण कहा गया है। शिवको तामसदेवता कहना अनभिज्ञता वैदिकोंके यहाँ शिवपूजाकी सामग्रियोंमें कोई भी तामस पदार्थ नहीं है। बिल्वपत्र, पुष्प, फल, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे ही भगवान्‌की पूजा होती है। मद्य, मांसका तो शिवलिंगपूजामें कभी भी उपयोग नहीं होता। अतः शिव तामस देवता हैं, यह कहना अनभिज्ञता है। हाँ, त्रिमूर्त्यन्तर्गत शिव कारणावस्थाके नियन्ता माने जाते हैं। कारण या अव्यक्तकी अवस्था अवष्टम्भात्मक होनेसे तमःप्रधाना कही जा सकती है। 'तम आसीत्तमसागूढमग्रे' इस श्रुतिमें तमको ही सबका आदि और कारण कहा गया है। उसीमें वैषम्य होनेसे सत्त्व, रजका उद्भव होता है। तमका नियन्त्रण करना सर्वापेक्षयाऽपि कठिन है। भगवान् शिव तमके नियन्ता हैं, तमके वशमें नहीं हैं। शिव भयानक भी हैं, शान्त भी हैं। सर्व-संहारक, कालकाल, महाकालेश्वर, महामृत्युञ्जय भगवान्‌में उग्रता उचित ही है। ब्रह्मक्षत्रोपलक्षित समस्त प्रपंच जिसका ओदन है, मृत्यु जिसका दाल-शाक है, मृत्युसहित संसारको जो खा जाता है, उसका उग्र होना स्वाभाविक है। शिवसे भिन्न जो भी कुछ है, उन सबके संहारक शिव हैं। इसीलिये विष्णुको उनका स्वरूप ही माना जाता है। अन्यथा भिन्न होनेपर तो उनमें भी संहार्यता आ जायगी। वस्तुतः हरिहर, शिवविष्णु तो एक ही हैं। उनमें अणुभर भी भेद है ही नहीं। भीषास्माद्वातः पवते। (तैत्तिरीय० २।८) भगवान्‌के भयसे ही वायु, अग्नि, सूर्य, मृत्यु अपना काम करते हैं। महद्भयं वज्रमुद्यतम् समुद्यत महावज्रके समान भगवान्‌से सब डरते हैं, तभी भगवान्‌को मन्यु या चण्ड-कोपरूप माना गया है। 'नमस्ते रुद्र मन्यवे' हे रुद्र! आपके मन्युस्वरूपकी मैं वन्दना करता हूँ। वही शक्तिरूपधारिणी होकर चण्डिका कहलाते हैं, फिर भी वह ज्ञानियों और भक्तोंके लिये रसस्वरूप हैं। रसो वै सः। एष ह्येवानन्दयति॥ (तैत्तिरीय० २।७) भगवान् शिव रसमय, कल्याणमय भगवान् रसस्वरूप हैं, निखिलरसामृतमूर्ति भगवान्‌से ही समस्त विश्वको आनन्द प्राप्त होता है, इसीलिये अघोरा शिवतनु घोरतनुसे पृथक् वर्णित है— या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी। तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभि चाकशीहि॥ (यजु० १६।२) भगवान्‌की शन्तमा, शिवा तनू परमकल्याणमयी है। शान्तं शिवम् (माण्डूक्योपनिषद् ७) अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः। सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽअस्तु रुद्ररूपेभ्यः॥ इस तरह रुद्राध्यायमें उग्र, श्रेष्ठ और भीमरूप वर्णित हैं। नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शङ्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च॥ (यजु० १६।४१) इस मन्त्रमें शिवको शिवस्वरूप, कल्याणदाता, मोक्षदाता कहा गया है। इस तरह जब अनादि, अपौरुषेय वेदों एवं तन्मूलक इतिहास, पुराण, तन्त्रोंद्वारा शिवका परमेश्वरत्व, शान्तत्व, सर्वपूज्यत्व और अनादि सिद्धत्व सिद्ध होता है, तब शिवकी पूजा अनार्योंसे ली गयी है, इन बेसिर-पैरकी बातोंका क्या मूल्य है ?