भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 482

४७२ भक्तिसुधा ऊपर महान् अंश योनिबहिर्भूत प्रकृतिसे असंस्पृष्ट है— 'पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।' प्रकृतिविशिष्ट परम ब्रह्म ही सर्वकर्ता, सर्वफलदाता है, केवल तो उदासीन है। शुद्ध शिवतत्त्व त्रिगुणातीत है, त्रिमूर्त्यन्तर्गत शिव परम बीज, तमोगुणके नियामक हैं। सत्त्वके नियमनकी अपेक्षा तमका नियमन बहुत कठिन है। सर्वसंहारक तम है, पर उसको भी वशमें रखनेवाले शिवकी विशेषता स्पष्ट ही है। एक दृष्टिसे लिंग चिह्नको भी कहा जाता है। चिह्नशून्य निर्गुण, निराकार, निर्विकार ब्रह्म अलिंग है। श्रुतियाँ उसे अशब्द, अस्पर्श, अरूप बतलाती हैं। परंतु लिंगका अधिष्ठान मूल वही है। अव्यक्त तत्त्व लिंग है। मायाद्वारा एक ही परब्रह्म परमात्मासे ब्रह्माण्डरूप लिंगका प्रादुर्भाव होता है। चौबीस प्रकृति-विकृति, पचीसवाँ पुरुष, छब्बीसवाँ ईश्वर यह सब कुछ लिंग ही है। उसीसे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रका आविर्भाव होता है। प्रकृतिके सत्त्व, रज, तम—इन तीनों गुणोंसे त्रिकोण योनि बनती है। प्रकृतिमें स्थित निर्विकारबोधरूप शिवतत्त्व ही लिंग है। इसीको विश्व-तैजस-प्राज्ञ, विराट्-हिरण्यगर्भ- वैश्वानर, जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति, ऋक्-साम-यजुः, परा-पश्यन्ती-मध्यमा आदि त्रिकोणपीठोंमें तुरीय, प्रणव, परा वाक्स्वरूप लिंगरूपमें समझना चाहिये। 'अ, उ, म्' इस प्रणवात्मक त्रिकोणमें अर्द्धमात्रा- स्वरूप लिंग है। परमेश्वर समष्टि-व्यष्टि लिंगरूपसे प्रत्येक योनिमें प्रतिष्ठित होकर अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमयरूप पंचकोशात्मक देहोंको उत्पन्न करता है— अधितिष्ठति योनिं यो योनिं वाचैक ईश्वरः। देहं पञ्चविधं येन तमीशानं पुरातनम्॥ (लिंगपुराण २।१८।३९) लिंग-भगसे ही समस्त विश्वकी उत्पत्ति है, अतएव सभी लिंग और भगसे अंकित हैं। वेद, उपनिषद्, महाभारत, रामायण, पुराण, तन्त्र सर्वत्र ही शिवकी महिमा गायी गयी है। विष्णु, ब्रह्मा, कृष्ण, राम आदि देवाधिदेवोंने भी शिवलिंगकी अर्चा की है। सृष्टि-विस्तारकी दृष्टिसे लिंग-भगका महत्त्व समझमें आ सकता है, काम-प्रयुक्त भोगमात्रकी दृष्टिसे देखना और बात है। शंकरने कामको जलाकर सृष्टिकी बुद्धिसे ही मैथुनद्वारा सृष्टि की है, ऐसा ही औरोंको भी करना युक्त है। किसी अवसरमें दृग् और दृश्य दोनों एक ही रूप होते हैं— 'आसीज्ज्ञानमथो ह्यर्थ एकमेवाविकल्पितम्।' (श्रीमद्भा० ११।२४।२) सृष्टिसे पहले ज्ञान और अर्थ (दृश्य) एकमेव हो रहे थे। दृश्यशक्तिके उद्भव बिना सर्वसंद्रष्टा चिदात्मा भी अपनेको असत् ही मानने लगता है— 'मेनेऽसन्तमिवात्मानं सुप्तशक्तिरसृप्तदृक्॥' (श्रीमद्भा० ३।५।२४) वह अन्तर्मुख विमर्शरूप सुप्त शक्ति ही माया पदसे कही जाती है— 'सा वा एतस्य संद्रष्टुः शक्तिः सदसदात्मिका। माया नाम महाभाग ययेदं निर्ममे विभुः ॥' (श्रीमद्भा० ३।५।२५) शिव ही शक्ति और शक्ति ही शिव हैं निरधिष्ठान शक्ति नहीं और अशक्त (शक्तिरहित) अधिष्ठान नहीं, अतः उभय उभयस्वरूप ही हैं। इसीलिये शिव ही शक्ति और शक्ति ही शिव हैं, इस दृष्टिसे योनि लिंगात्मक एवं लिंग योन्यात्मक है। फिर भी इस द्वैतमें अद्वैततत्त्व अनुस्यूत है। ईश्वर और महाशक्तिकी अधिष्ठानभूत अद्वैतसत्ता भी निरंजन, निष्कलसत्ताके साथ एकीभूत है। यह सृष्टिका बीज होनेपर भी निःस्पन्द शिवमात्र है। अव्यक्त अवस्था अलिंगावस्था भी है। इसे महालिंगावस्था भी कहा जा सकता है। अव्यक्तसे तेजोमय, ज्योतिर्मय तत्त्व आविर्भूत होता है। वह स्वयं उत्पन्न होनेसे स्वयम्भू लिंग है। वह अव्यक्त अवस्थाका परिचायक होनेसे लिंग है। परमार्थतः द्वैतशून्य तत्त्व है। योनि त्रिकोण