भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशिवलिङ्गोपासना-रहस्य ४७३ है, केन्द्र या मध्यबिन्दु लिंग है— मूलाधारे त्रिकोणाख्ये इच्छाज्ञानक्रियात्मके। मध्ये स्वयम्भुलिङ्कन्तु कोटिसूर्यसमप्रभम् ॥ इस वचनमें इच्छा-ज्ञान-क्रियात्मक योनिमें कोटिसूर्यसमप्रभ स्वयम्भू चिज्ज्योतिस्वरूप शिवलिंग माना गया है। मूलाधार आदि षट्चक्र भी योनि ही है। सर्वत्र यही लिंग भी भिन्न-भिन्न रूपमें विराजमान है। योनिसे अतीत होकर बिन्दु अव्यक्त और लिंग अलिंग हो जाता है। कोई गुण, कर्म, द्रव्य बिना योनि-लिंगके नहीं बन सकते। याज्ञिकोंके यहाँ भी वेदीकी स्त्री-रूपमें, कुण्डकी योनिरूपमें और अग्नि- रुद्रकी लिंगरूपमें उपासना होती है। शिवलिंग योनिरूपा कुण्डलिनीसे परिवेष्टित एक समय देवी पार्वतीने भगवान् शंकरसे प्रश्न किया कि 'इन्द्रियोंसे रहित देव शून्यरूप है, उसका कोई आकार नहीं है, उस शून्यके पूजनसे क्या फल ?' शिवजीने कहा- 'महेशानि ! शक्तिशून्य शिव शव या प्रेतके ही समान है। उसकी पूजा नहीं बन सकती, अतः रौद्री शक्तिसहित ही उनकी पूजा होनी चाहिये। वही ब्रह्मा-विष्णु-शिवात्मिका आद्याशक्ति सार्द्धत्रिवलया (साढ़े तीन फेरेकी) कुण्डलिनीरूपा है। वह शिवतत्त्वको अपने साढ़े तीन फेरेसे वेष्टित किये हुए है। उसी शक्तिके संयोगसे शिव अनन्त ब्रह्माण्डका उत्पादनादि कार्य करते हैं। वही कुण्डलिनी योनि है, उससे परिवेष्टित शिवलिंग है। यही अपर्णालतापरिवेष्टित स्थाणु भी है, अपर्णा पार्वती योनि है, कूटस्थ ब्रह्म ही स्थाणु, हूँठ या लिंग है— देव्युवाच इन्द्रियै रहितो देवः शून्यरूपः सदाशिवः । आकारो नास्ति देवस्य किं तस्य पूजने फलम् ॥ शिव उवाच प्रेते पूजा महेशानि कदाचिन्नास्ति पार्वती । रुद्रस्य परमेशानि रौद्रीशक्तिरितीरिता ॥ रौद्री तु परमेशानि आद्या कुण्डलिनी भवेत् । वर्तते परमेशानि ब्रह्मविष्णुशिवात्मिका ॥ सार्द्धत्रिवलयाकारैः शिवं वेष्ट्य सदा स्थिता। शक्तिं विना महेशानि प्रेतत्वं तस्य निश्चितम् ॥ शक्तिसंयोगमात्रेण कर्मकर्ता सदाशिवः । अतएव महेशानि पूजयेच्छिवलिङ्गकम् ॥ (लिंगार्चनतन्त्र पटल २) लिंगपूजनसे भुक्ति एवं मुक्ति 'स्कन्दपुराण' के अनुसार लिंगपूजनके बिना महान् अमंगल होता है और उसके पूजनसे भुक्ति, मुक्ति सब कुछ मिलती है— विना लिङ्गार्चनं यस्य कालो गच्छति नित्यशः । महाहानिर्भवेत्तस्य दुर्गतस्य दुरात्मनः ॥ एकतः सर्वदानानि व्रतानि विविधानि च। तीर्थानि नियमा यज्ञा लिङ्गाराधनमेकतः ॥ भुक्तिमुक्तिप्रदं लिङ्गं विविधापन्निवारणम् । यद्यपि शिवलिंग और उसकी पूजा अनादिकालसे ही है तथापि उनके आविर्भावका पुराणोंमें वर्णन है— ब्रह्मा, विष्णु दोनों ही 'मैं बड़ा हूँ' ऐसा कहकर परस्पर लड़ रहे थे। उनका विवाद मिटानेके लिये परमज्योतिर्मय लिंगका आविर्भाव हुआ। ब्रह्मा भगवान्के उस ज्योतिर्मयलिंगका पता लगानेके लिये हंसपर आरूढ़ होकर ऊपरकी ओर गये और विष्णु वराहरूप धारणकर नीचे गये। हजारों वर्षतक घोर परिश्रम करनेपर भी दोनोंको उसका कहीं आद्यन्त न मिला। शिवलिंगके मस्तकसे गिरती हुई केतकीने कहा कि 'मैं दस कल्पसे चलते यहाँतक पहुँची हूँ, अभी कुछ ठिकाना नहीं कि कितना जाना पड़ेगा।' इससे शिवलिंगकी अनन्तता मालूम पड़ती है। दिव्यवाणीसे भगवान्ने ब्रह्मा, विष्णु दोनोंहीको प्रबोध कराया। अन्यत्र पृथ्वीको पीठ और आकाशको लिंग कहा है। जैसे वेदीपर लिंग विराजता है, वैसे ही पृथ्वीपर आकाश है। जैसे ब्रह्मका एक देश ही प्रकृति-संस्पृष्ट है, वैसे ही आकाशलिंगका भी एक देश ही पृथ्वीसंस्पृष्ट है। इसीलिये कहीं लिंग ठीक पुरुषके जननेन्द्रियके समान ही होता है, कहीं ब्रह्माण्डके आकारका, कहीं पिण्डके आकारका।