भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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केदारेश्वरकी नित्यसिद्ध स्वयम्भू मूर्ति कहीं भी लिंगके आकारकी नहीं है। वही कारणावस्था या पिण्डावस्थाका चिह्न ही लिंग समझना चाहिये। वस्तुदृष्टिसे फिर भी वह लिंग ही है। आधुनिक वैज्ञानिकोंकी भी दृष्टिसे आकाश वक्र है जैसा कि लिंगका स्वरूप है। किं बहुना देश, काल, वस्तु सभी वक्र हैं, ब्रह्मको भी वक्र और स्तब्ध कहा है। फिर उससे उत्पन्न सबको वक्र होना ही चाहिये। अनन्तकोटि विश्व सब लिंगमय ही है। विश्वोंसे परे सगुण ब्रह्मका भी आकार लिंग ही है। शिवशक्तिके सहवासमें अवकाश न मिलनेसे शुक्राचार्यने उन्हें शाप दिया कि तुम योनिस्थ लिंगके रूपमें पूजित होगे। एकबार शंकर दिगम्बर वेशसे स्वलिंग अपने हस्तमें लेकर दारुकवनमें गये। उन्हें देखकर ऋषिपत्नियां मोहित हो गयीं, यह देखकर ऋषियोंने शंकरको शाप दिया कि तुम्हारा लिंग गिर जाय। ऐसा ही हुआ, किंतु लिंगके पृथ्वीपर गिरते ही वह प्रज्वलित होकर अपने तेजसे लोकको जलाने लगा। अन्तमें शिवाने उसे योनिमें स्थापित किया और सब ऋषियों और देवताओंने उसकी पूजा की। यहाँ लिंग-योनि दिव्यप्रकृति और परम पुरुष ही हैं। शिवशक्तिरूप लिंग-योनिको प्राकृत स्त्री-पुरुषके समान चर्मखण्ड मूत्रेन्द्रियमात्र मान लेना बड़ा अपराध होगा। वहीं यह भी कथा है कि मुनियोंके शापसे गिरा हुआ शिवलिंग अग्निके समान जाज्वल्यमान होकर भूमि, स्वर्ग एवं पातालमें फिरा, सभी लोक बड़े दुःखी हुए। ब्रह्माजीने कहा कि 'गिरिजाकी प्रार्थना करो, वे ही योनिरूपसे परमज्योतिर्मय लिंगको धारण कर सकती हैं।' फिर सब देवताओं एवं मुनियोंने जब आराधना की, तब भगवान् और गिरिजा प्रसन्न हुए और गिरिजामें शिवकी प्रतिष्ठा हुई। क्या साधारण लिंगका गिरकर अग्निमय होकर सर्व लोकोंमें घूमना बन सकता है ? और विष्णु, राम, कृष्ण तथा सभी देव, मुनि क्या केवल साधारण लिंग-योनिकी ही पूजा करते थे ? यदि यही बात थी, तो कृष्णकी उपमन्युके यहाँ जाकर दीक्षापूर्वक शिवाराधनके लिये घोर तपस्या करनेकी क्या आवश्यकता थी ? कुछ लोग कथामें आये हुए उक्त शिवलिंगको केवल ब्रह्माण्ड कहते हैं, उसीको हाथमें लिये हुए भगवान् लीलया दारुकवनमें गये थे, वहीं मुनियोंके शापसे उनके हाथसे लिंग गिर पड़ा। अतएव वहाँ उसका 'गिरना' कहा गया है, 'कटना' नहीं। उस ज्योतिर्लिंग ब्राह्म तेजका आधार पंचतत्त्वात्मिका प्रकृति ही योनि है। अतः पार्वतीने योनिरूपसे उस लिंगको धारण किया अर्थात् पंचतत्त्वात्मिका प्रकृति बनकर उन्होंने ब्रह्माण्डको धारण किया। अग्निमय सर्वदाहक लिंगको योनि-प्राकृत चर्मखण्ड मूत्रेन्द्रियमें कौन धारण कर सकता था ? 'बाणरूपा श्रुता लोके पार्वती शिववल्लभा।' योनिरूपाका अर्थ ही बाणरूपा है। 'बाण' शब्द पाँच संख्याका बोधक होता है, पंचशरके अभिप्रायसे काममें, पंचमुखके अभिप्रायसे शिवमें, पंचतत्त्वात्मिकाकी दृष्टिसे पार्वतीमें 'बाण' शब्दका प्रयोग होता है। जैसे विद्युत-पुंज पंचतत्त्वमें व्याप्त होते हुए भी जल और पर्वतश्रेणीमें अधिकतासे रहता है, वैसे ही पार्वती बाणरूपा हुईं अर्थात् पर्वतश्रेणीरूपा हुईं और उन्हींमें वह तेजोमय लिंग समा गया। विद्युत्-पुंज यदि अपनी योनि पृथ्वी या जलमें पड़े तो स्थिर होता है, अन्यथा वृक्ष, मनुष्य सबको भस्म ही करता है। यही बात शिवजीने कहा है- पार्वतीञ्च विना नान्या लिङ्गं धारयितुं क्षमा। तया धृतञ्च मल्लिङ्गं द्रुतं शान्तिं गमिष्यति ॥ अर्थात् पार्वतीके बिना कोई इसे नहीं धारण कर सकता, उनके धारणसे वह शीघ्र ही शान्त हो जायगा। 'सतश्च योनिमसतश्च।' (यजु०) 'यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येकः।' (श्वेता० ४।११) 'यच्च स्वभावं पचति विश्वयोनिः।' (श्वेता० ५।५) 'तस्य योनिं परिपश्यन्ति धीराः।' (यजु०)