भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 479, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंशिवलिङ्गोपासना-रहस्य ४६१
अभिव्यक्तिका स्थान—गोलक है, इन्द्रिय उससे पृथक् सूक्ष्म वस्तु है। प्रसिद्ध नासिका या कान ही घ्राण और श्रोत्र नहीं, किंतु ये सब तो गोलक हैं। घ्राण, श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ तो अतिसूक्ष्म हैं, वे नेत्रादिके विषय नहीं हैं। फिर भी विशेषरूपसे उनका इन गोलकोंमें प्राकट्य होता है, अतएव कभी जब इन गोलकोंके ज्यों-के-त्यों बने रहनेपर भी इन्द्रियशक्ति क्षीण हो जाती है, तब दर्शन, श्रवण, आघ्राण आदि नहीं होते। योगियोंको घ्राण, श्रोत्र, नेत्र-सम्बन्ध बिना भी दूरदर्शन- श्रवणादि होते हैं। उसी तरह लौकिक प्रसिद्ध लिंग- योनि आदि केवल गोलक हैं, उनमें व्यक्त होनेवाला योनि-लिंग तो अतीन्द्रिय ही है। वैसे ही प्रजनन- इन्द्रिय, वीर्य, रज आदि भी उसके मुख्य रूप नहीं, किंतु उनसे भी सूक्ष्म, उनमें विशेषरूपसे व्यक्त दृक्- दृश्य ही शिव और शक्ति है। यद्वा जैसे अग्नितादात्म्यापन्न लौह-पिण्डमें दाहकत्व, प्रकाशकत्व हो सकता है, वैसे ही पुरुष- प्रतिबिम्बोपेत ही अचेतन प्रकृति चेतित होकर विश्वका निर्माण करती है। जैसे पुरुषके सर्वांगसार वीर्यको पाकर ही योनि सन्तान रचती है, वैसे ही पुरुष- प्रतिबिम्ब भी पुरुष समानाकार पुरुषकी प्रतिकृति ही होता है, उसीसे अचेतन प्रकृतिमें भी चेतनताका संचार होता है। इधर मूर्तिपूजाका भी भाव यही होता है कि दृश्यसे अदृश्यकी पूजा हो। शालग्राममें विष्णुकी भावना होती है। केवल काष्ठ, पाषाण, धातुकी पूजा नहीं होती, किंतु मन्त्र और विधानोंकी महिमासे आहूत, संनिहित व्यापक दैवतत्त्व ही मूर्तिमें आराध्य होता है। व्यष्टिके द्वारा ही प्राणियोंके मनमें समष्टिभावका आरोहण होता है। अतएव समस्त व्यष्टि-लिंगों एवं अन्यत्र भी व्यापक शिवतत्त्वकी समष्टि मूर्ति महादेव-लिंग है। जैसे व्यष्टि नेत्रोंका अधिष्ठाता समष्टिदेव सूर्य है, वैसे ही व्यष्टि प्रजननशक्तियोंमें व्याप्त शिवतत्त्वका समष्टिस्वरूप शिवलिंग है। जैसे व्यष्टिनेत्रकी उपासना न होकर समष्टिनेत्र सूर्यकी ही आराधना होती है और प्रतिमा भी उन्हींकी बनती है, वैसे ही समष्टि शिवमूर्तिकी ही उपासना और प्रतिमा होती है। जैसे जाग्रत्, स्वप्नकी उत्पत्ति और लय सौषुप्त तमसे ही होते हैं, वैसे ही तमसे ही सबका उद्भव और उसीमें सबका लय होता है। तमको वशमें रखकर उसके अधिष्ठाता शिव ही सर्वकारण हैं। कार्योंको कारणके आद्यन्तका पता नहीं लगता। यह कहा जा चुका है कि समस्त योनियोंका समष्टि रूप प्रकृति है, वही शिवलिंगकी पीठ या जलहरी है। योनिमें प्रतिष्ठित लिंग आनन्दप्रधान, आनन्दमय होता है। जैसे समस्त रूपोंका आश्रय चक्षु, समस्त गन्धोंका आश्रय—एकायतन—घ्राण है, वैसे ही समस्त आनन्दोंका एकायतन लिंग-योनिरूप उपस्थ है। अतएव प्रकृतिविशिष्ट दृक्रूप परमात्मा आनन्दमय कहलाता है। सुषुप्तिमें भी उसीके अंश- भूत व्यष्टि आनन्दमयका उपलम्भ होता है। प्रिय, मोद, प्रमोद, आनन्द—ये आनन्दमयके अवयव हैं, शुद्ध ब्रह्म इन सबका आधार है। जब अनन्त- ब्रह्माण्डोत्पादिनी प्रकृति समष्टियोनि है, तब अनन्तब्रह्माण्डनायक परमात्मा ही समष्टिलिंग हैं और अनन्त ब्रह्माण्ड प्रपंच ही उनसे उत्पन्न सृष्टि है। इसीलिये परमप्रकाशमय, अखण्ड, अनन्त शिवतत्त्व ही वास्तविक लिंग है और वह परम प्रकृतिरूप योनि—जलहरीमें प्रतिष्ठित है। उसीकी प्रतिकृति पाषाणमयी, धातुमयी जलहरी और लिंगरूपमें बनायी जाती है। अदूरदर्शी अज्ञ प्राणीके लिये सांसारिक सुखोंमें सर्वाधिक सुख प्रियाप्रियतम-परिष्वंग-मैथुनमें है। अतः उसके उदाहरणसे भी श्रुतियोंने अनन्त, अखण्ड, परमानन्द ब्रह्म और प्रकृतिके आनन्दमय स्वरूपको दिखलाया है। कहीं-कहीं जीवात्माके परमात्मसम्मिलन- सुखको इसी दृष्टान्त सुखसे दिखलाया गया है— तद् यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरमेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरम्॥ (बृहदा० ४।३।२१)