भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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४६८ | भक्तिसुधा

शिव-शक्तिका सम्मिलन होता है। वही शृंगाररस है। कामेश्वर-कामेश्वरी, श्रीकृष्ण-राधा, अर्धनारीश्वर वही है। पूर्ण सौन्दर्य अनन्त है, अप्सराओंका सौन्दर्य उसके सामने नगण्य है। उसी सौन्दर्यके कणमात्रसे विष्णुने मोहिनीरूपसे शिवको मोह लिया। उसीके लेशसे मदन मुनियोंको मोहता है। वही सगुणरूपमें कहीं ललिता, कहीं कृष्णरूपमें प्रकट होता है— 'षोडशी तु कला ज्ञेया सच्चिदानन्दरूपिणी।' (सुभगोदय) 'नित्यं किशोर एवासौ भगवानन्तकान्तकः ॥' कभी आद्या ललिता ही पुंरूपधारिणी होकर कृष्ण बनती हैं, वही वंशीनादसे विश्वको मोहित करती हैं— कदाचिदाद्या ललिता पुंरूपा कृष्णविग्रहा। वंशीनादसमारम्भादकरोद्विवशं जगत्॥ (तन्त्रराज) शिव-शक्तिमें ही लिंगयोनि-भावकी कल्पना प्रकृतिपार, सौन्दर्य-माधुर्यसार, आनन्दरससार परमात्मामें भी शिव-पार्वती-भाव बनता है। अनन्तकोटि- ब्रह्माण्डोत्पादिनी अनिर्वचनीय शक्तिविशिष्ट ब्रह्ममें भी शिव-पार्वती-भाव है। उस परमात्मामें ही लिंगयोनि- भावकी कल्पना है। निराकार, निर्विकार, व्यापक दृक् या पुरुषतत्त्वका प्रतीक ही लिंग है और अनन्तब्रह्माण्डोत्पादिनी महाशक्ति प्रकृति ही योनि, अर्घा या जलहरी है। न केवल पुरुषसे सृष्टि हो सकती है, न केवल प्रकृतिसे। पुरुष निर्विकार, कूटस्थ है, प्रकृति ज्ञानविहीन, जड़ है। अतः सृष्टिके लिये दृक्-दृश्य, प्रकृति-पुरुषका सम्बन्ध अपेक्षित होता है। 'गीता' में भी प्रकृतिको परमात्माकी योनि कहा गया है— मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्। सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥ (१४।३) भगवान् कहते हैं—महद्ब्रह्म—प्रकृति—मेरी योनि है, उसीमें मैं गर्भाधान करता हूँ, तभी उससे महदादिक्रमेण समस्त प्रजा उत्पन्न होती है। प्रकृतिरूप योनिमें प्रतिष्ठित होकर ही पुरुषरूप लिंगका उत्पादन करता है। अतएव बिना योनि-लिंग-सम्बन्धके कहीं भी किसीकी सृष्टि ही नहीं होती। हाँ, यह बात अवश्य समझ लेनी चाहिये कि लोकप्रसिद्ध मांसचर्ममय ही लिंग और योनि नहीं है, किंतु वह व्यापक भी है। उत्पत्तिका उपादानकारण पुरुषत्वका चिह्न ही लिंग कहलाता है। दृश्य अण्डरूप ब्रह्म ही अदृश्य पुरुष ब्रह्मका चिह्न है और वही संसारका उपादान भी है, अतः वह लिंगपदवाच्य है। लिंग और योनि पुरुष- स्त्रीके गुह्यांगपरक होनेसे ही उन्हें अश्लील समझना ठीक नहीं है। गेहूँ, यव आदिमें भी जिस भागमें अंकुर निकलता है, उसे योनि माना जाता है, दाने निकलनेसे पहले जो छत्र होता है, वह लिंग है। ब्रह्मा या देवताओंके संकल्पसे उत्पन्न सृष्टिका भी लिंग- योनिसे सम्बन्ध है अर्थात् शिव-शक्ति ही यहाँ लिंग- योनि शब्दसे विवक्षित हैं। उत्पत्तिका आधारक्षेत्र भग है, बीज लिंग है। वृक्ष, अंकुरादि सभी प्रपंचकी उत्पत्तिका क्षेत्र भग है, बीज पुरुष लिंग है। जैसे दृक्तत्त्व व्यापक है, वैसे ही दृश्य प्रकृतितत्त्व भी। तभी तो कभी लोकप्रसिद्ध योनि-लिंगके बिना भी मानसी संकल्पजा सृष्टि होती थी। कहीं दर्शनसे, कहीं स्पर्शसे, कहीं फलादिसे भी सन्तान उत्पन्न हो जाती थी। कहीं भी, कैसी भी, सृष्टि क्यों न हो, परंतु वहाँ सृष्टिके उत्पादनानुकूल शिव-शक्तिका सम्बन्ध अवश्य मानना पड़ता है। वृक्ष, लता, दूर्वा, तृणादि सभी तत्त्वोंकी उत्पत्तिमें तदुपयुक्त शिव-शक्तिका सम्बन्ध अनिवार्य है। योगसिद्ध महर्षियोंका प्रकृतिपर अधिकार होता था। अतः ये संकल्प, स्पर्श, अवलोकन आदिसे ही सृष्टिके उपयुक्त लिंग-योनि-सम्बन्ध स्थापित कर सकते थे। प्रसिद्ध लिंग और योनि ही असली लिंग-योनि नहीं है। किंतु यह तो उनकी अभिव्यक्तिका स्थान, केवल गोलक है। सर्वसाधारण लोग जिसे नेत्र समझते हैं, वह नेत्र नहीं है, किंतु वह तो अतीन्द्रिय नेत्र इन्द्रियकी