भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 477

शिवलिङ्गोपासना-रहस्य ४६७

अंश ही है, इसीलिये अद्वैत आत्मा ही निरुपाधिक प्रेमका आस्पद कहा जाता है, परंतु वहाँ प्रेम और उसके आश्रय तथा विषयमें भेद नहीं है। प्रेम, आनन्द, रस—ये सभी आत्माके ही स्वरूप हैं। रसरूप आनन्दसे ही समस्त विश्व उत्पन्न होता है, अतः सबमें उसका होना अनिवार्य है। इसीलिये जिस तरह सोपाधिक आनन्द और सोपाधिक प्रेम सर्वत्र है ही, उसी तरह कान्ता भी सोपाधिक आनन्दरूप कही जा सकती है। अतएव वह सोपाधिक प्रेमका विषय भी है। परंतु निरुपाधिक प्रेम तो निरुपाधिक आत्मामें ही होना ठीक है। जैसे सत्के ही सविशेष रूपमें अनुकूलता, प्रतिकूलता, हेयता, उपादेयता होती है, निर्विशेष तो शुद्ध आत्मा ही है, वैसे ही सविशेष आनन्द और प्रेममें भी हेयता, उपादेयता है। शास्त्रनिषिद्ध विषयोंमें आनन्द और प्रेम दोष है, हेय है सुन्दर, मनोहर देवता और तद्विषयक प्रेम आदि उपादेय है, सुन्दरी वेश्यादिकी आनन्दरूपता और तद्विषयक प्रेम हेय है। जैसे अतिपवित्र दुग्ध भी अपवित्र पात्रके संसर्गसे अपवित्र समझा जाता है, वैसे ही आनन्द और प्रेम भी अपवित्र उपाधियोंके संसर्गसे दूषित हो जाता है। शास्त्रनिषिद्ध विषयोंमें आनन्द और प्रेम दोष है, हेय है। शास्त्रविहित विषयोंमें आनन्द और प्रेम पुण्य है, उपादेय है। परंतु निर्विशेष, सर्वोपाधिमुक्त प्रेम, आनन्द तो स्पष्ट आत्मा या ब्रह्म ही है। आत्माके ही अंश अपवित्र विषयके दूषणसे ही कामिनी आदि विषयक प्रेमको काम या राग आदि कहा जाता है, देवताविषयक प्रेमको भक्ति आदि कहा जाता है। सजातीयमें ही सजातीयका आकर्षण होता है। बस यह आकर्षण ही प्रेम या काम है। कान्ता- कान्त दोनोंमें ही रहनेवाले तत्तदवच्छिन्न रस या आनन्दमें ही जो परस्पर आकर्षण है, वही काम है। शुद्ध प्रेम ही शुद्ध काम है समष्टि ब्रह्मका प्रकृतिकी ओर झुकाव आधिदैविक काम है। परंतु जहाँ शुद्ध, सच्चिदानन्दघन परब्रह्मका स्वरूपमें ही आकर्षण होता है, किंवा आत्माका अपने ही अत्यन्त अभिन्न स्वरूपमें ही जो आकर्षण या निरतिशय, निरुपाधिक प्रेम है, वह तो आत्मस्वरूप ही है। यही राधा-कृष्ण, गौरी-शंकर अर्धनारीश्वरका परस्पर प्रेम, परस्पर आकर्षण है और यह शुद्ध प्रेम ही शुद्ध काम है। यह कामेश्वर या कृष्णका स्वरूप ही है। अनन्त ब्रह्माण्डमें विस्तीर्ण कामबिन्दु मन्मथ है। अनन्तब्रह्माण्डनायकका प्रकृतिमें वीर्याधानका प्रयोजक कामसागर साक्षात् मन्मथ है। परंतु सौन्दर्य- माधुर्यसारसर्वस्व, निखिलरसामृतमूर्ति कृष्णचन्द्रका जो अपनी ही स्वरूपभूता माधुर्याधिष्ठात्री राधामें आकर्षण है, वह तो साक्षान्मन्मथमन्मथ ही है। उनका पूर्णतम सौन्दर्य ऐसा अद्भुत है कि उन्हें ही विस्मित कर देता है। काम उनकी पदनखमणिचन्द्रिकाकी रश्मिछटाको देखकर मुग्ध हो गया। उसका स्त्रीत्व-पुंस्त्वभाव ही मिट गया, उसने अपने मनमें यह ठान लिया कि अनन्त जन्मोंतक भी तपस्या करके ब्रजांगनाभाव प्राप्तकर श्रीकृष्णके पद-नखमणिचन्द्रिकाका सेवन प्राप्त करूँगा। परंतु यहाँ तो कृष्णने ही अपने स्वरूपपर मुग्ध होकर उस रसके आस्वादनके लिये ब्रजांगनाभावप्राप्त्यर्थ तपस्याका विचार कर लिया। यहाँ शुद्ध परमतत्त्वमें ही शिवशक्तिभाव, अर्धनारीश्वरभाव और शुद्ध आकर्षण प्रेम या काम है। सत्-रूप गौरी एवं चित्-रूप शिव दोनों ही जब अर्धनारीश्वरके रूपमें मिथुनीभूत (सम्मिलित) होते हैं, तभी पूर्ण सच्चिदानन्दका भाव व्यक्त होता है, परंतु यह भेद केवल औपचारिक ही है, वास्तवमें तो वे दोनों एक ही हैं। कुछ महानुभावोंका कहना है कि पूर्ण सौन्दर्य अपनेमें ही अपने प्रतिबिम्बको अपने-आप देख सकता है, भगवान् अपने स्वरूपको देखकर स्वयं विस्मित हो जाते हैं— 'विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धेः' (श्रीमद्भा० ३।२।१२) बस, इसीसे प्रेम या काम प्रकट होता है। इसीसे