भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 476, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 476

४६६ भक्तिसुधा शिवलिङ्गोपासना-रहस्य सच्चिदानन्द परमात्माका शिवशक्ति- रूपमें प्राकट्य सर्वाधिष्ठान, सर्वप्रकाशक, परब्रह्म परमात्मा ही 'शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः' (माण्डूक्योपनिषद् ७) इत्यादि श्रुतियोंसे शिवतत्त्व कहा गया है। वही सच्चिदानन्द परमात्मा अपने-आपको ही शिवशक्तिरूपमें प्रकट करता है। वह परमार्थतः निर्गुण, निराकार होते हुए भी अपनी अचिन्त्य दिव्य लीलाशक्तिसे सगुण, साकार, सच्चिदानन्दघनरूपमें भी प्रकट होता है। वही शिवशक्ति, राधाकृष्ण, अर्द्धनारीश्वर आदि रूपमें प्रकट होता है। सत्ताके बिना आनन्द नहीं और आनन्दके बिना सत्ता नहीं। 'स्वप्रकाश सत्तारूप आनन्द' ऐसा कहनेसे आनन्दकी वैषयिक सुखरूपताका वारण होता है, सत्ताको आनन्दरूप कहनेसे उसकी जड़ताका वारण होता है। जैसे आनन्दसिन्धुमें माधुर्य उसका स्वरूप ही है, वैसे ही पार्वती-शिवका स्वरूप किंवा आत्मा ही है। माधुर्यके बिना आनन्द नहीं और आनन्दके बिना माधुर्य नहीं। दूसरी दृष्टिसे- सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता॥ (गीता १४।४) समस्त योनियोंमें, जितनी वस्तुएँ-मूर्तियाँ अर्थात् प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबकी योनि अर्थात् उत्पन्न करनेवाली माता प्रकृति है और बीज देनेवाला शिव (लिंग) पिता मैं हूँ। अर्थात् मूल प्रकृति और परमात्मा ही उन माता-पिता (योनि-लिंग)-रूपमें उन-उन मूर्तियों (वस्तुओं)-का उत्पादन करते हैं। जैसे लोकमें प्रजोत्पादनकी कामनासे प्राणी नारीमें गर्भाधान करता है, वैसे ही "एकोऽहं बहु स्यां, प्रजायेय" इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार एक ब्रह्मतत्त्व ही प्रजोत्पादन या बहुभवनकी कामनासे प्रकृतिमें गर्भाधान करता है। "सोऽकामयत" यह प्रजाकी सिसृक्षारूप काम ही प्राथमिक आधिदैविक काम है। इसी कामद्वारा प्रकृतिसंसृष्ट होकर भगवान् ब्रह्माण्डको उत्पन्न करते हैं। यह काम भी भगवान्‌का ही अंश है—'कामस्तु वासुदेवांशः' (श्रीमद्भा० १०।५५।१)। लोकमें भी प्रेम, काम या इच्छाका मुख्य विषय आनन्द ही है। सुखमें साक्षात् कामना और उससे अन्यमें सुखका साधन होनेसे इच्छा होती है, इसीलिये आनन्द और तद्रूप आत्मा निरतिशय, निरूपाधिक परप्रेमका आस्पद है, अन्य वस्तुएँ सातिशय, सोपाधिक अपर प्रेमके आस्पद हैं। कान्तको कान्ताकी कामना उसको सुखाभिव्यंजक अतएव सुखमय समझकर ही होती है। कामना या तृष्णासे व्यथित हृदयमें स्वरूपभूत आत्मानन्दका प्राकट्य नहीं होता। परंतु अभिलषित कान्ताकी प्राप्ति होनेपर क्षणभरके लिये वह तृष्णा निवृत्त हो जाती है, बस; तभी अन्तर्मुख किञ्चित् शान्त मनपर आत्मानन्दका प्राकट्य होता है। परंतु आत्मामें ही आनन्द है अथवा आनन्दाभिव्यंजक तृष्णाकी निवृत्तिमें, इसको तो विवेकी ही जानता है, अविवेकी तो आत्माके स्वरूपभूत आनन्दको नहीं समझता। तृष्णानिवर्तक सुन्दरी-कान्तामें ही आनन्द मानता है। अतएव उसीकी पुनः तृष्णा करता है और फिर कान्ताप्राप्तिकी तृष्णारूप व्यथाकी निवृत्तिसे आनन्दित होकर फिर उसीको चाहता है। विवेकी समझता है कि यद्यपि कान्ताप्राप्तिके अनन्तर आनन्द होता है तथापि कान्ता साक्षात् आनन्दरूप नहीं है, किंतु तृष्णानिवृत्ति, मनःशान्तिसे आत्माका ही आनन्द प्रकट होता है। आनन्दकी प्राप्तिमें कान्ता दूरतः कारण है, वह भी आनन्दजनकत्व या आनन्दमयत्वकी भ्रान्तिसे। जैसे विषके प्रभावसे कटु निम्बमें मिठास प्रतीत होती है, वैसे ही भ्रान्ति या मोहके प्रभावसे मांसमयी कान्तामें आनन्दका भान होता है। परंतु इसके अतिरिक्त शुद्ध आनन्द या आत्मामें जो प्रेम, आनन्द, कामना है, वह तो स्वाभाविक है, आत्माका