भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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४५४ भक्तिसुधा


मा तपः क्षपयाबुद्धे कल्पकालमहानलैः। यो न दग्धोऽस्मि मे तस्य किं त्वं शापेन धक्ष्यसि ॥ संसारावलयो ग्रस्ता निगीर्णा रुद्रकोटयः। भुक्तानि विष्णुवृन्दानि क्व न शक्ता वयं मुने ॥ इससे सिद्ध हुआ कि गणेश-स्मरणहीन सभी निःश्रेयस-साधन सत्कर्मोंमें कालरूप विघ्नका प्रादुर्भाव होना अनिवार्य है। अतः विघ्नोंके निवारणके लिये गणेश-स्मरण सभी सत्कर्मोंमें आवश्यक है। यदि कहा जाय कि ओंकार ही सर्वमंगलमय है, वेदोक्त समस्त कर्म-उपासनाओंके आदिमें ओंकारका ही स्मरण किया जाता है, इसलिये गणेश-स्मरण निरर्थक है। तो यह ठीक नहीं, क्योंकि ओंकार भी सगुण गणेश- स्वरूप ही है। 'मौद्गलपुराण' में भी कहा है— 'गणेशस्यादिपूजनं चतुर्विधं चतुर्मूर्तिधारकत्वात्।' ब्रह्माके चारों मुखोंसे अष्टलक्ष श्लोकात्मक पुराणोंका प्रादुर्भाव हुआ। उसके पश्चात् द्वापरान्तमें व्यासदेवने कलियुगीय मन्दमति प्राणियोंके बोधार्थ अष्टादश पुराणोपपुराणोंका निर्माण किया। उनमें पहला 'ब्रह्मपुराण' है, उसमें निर्गुण एवं बुद्धितत्त्वसे परे गणेश- तत्त्वका वर्णन है। अन्तिम 'ब्रह्माण्डपुराण' है, उसमें सगुण गणेशका माहात्म्य प्रतिपादित है; क्योंकि वह विशेषरूपसे प्रणवात्मक प्रपंचका प्रतिपादन करनेवाला है। उपपुराणोंमें भी पहला 'गणेशपुराण' है, जो कि सगुण-निर्गुण गणेशकी एकताका प्रतिपादन करनेवाला है और गजवदनादिमूर्तिधर गणेशका भी प्रतिपादन करता है। यहाँपर जो यह कहा जाता है कि उपपुराण अपकृष्ट हैं, यह ठीक नहीं है; क्योंकि जैसे उपेन्द्र इन्द्रसे अपकृष्ट नहीं, वैसे ही पुराणापेक्षया उपपुराण अपकृष्ट नहीं। 'मौद्गल' अन्तिम उपपुराण है। उसमें योगमय गणेशका माहात्म्य प्रतिपादित है। इस तरह वेद, पुराण, उपपुराण आदिके भी आदिमें, मध्यमें और अन्तमें गणेश-तत्त्वका प्रतिपादन मिलता है। इतना ही क्यों, ब्रह्म-विष्णु आदि भी गणेशांश होनेसे ही शास्त्र-प्रतिपाद्य हैं। कोई लोग बुद्धिस्थ चिदात्मरूप गणेशका स्मरण करके सत्कर्म करते हैं, कोई प्रणवस्मरणपूर्वक सत्कर्म करते हैं, कोई गज-वदनाद्यवयव-मूर्तिधर गणेशका स्मरण करते हैं एवं कोई योगमय गणपतिका स्मरण करते हैं। इस तरह सभी शुभकार्योंके आरम्भमें येन-केनचिद्रूपेण (किसी न किसी रूपमें) गणेशस्मरण देखा जाता है। मरणासन्नावस्था तथा श्राद्ध आदिमें भी गणेश-स्मरण आवश्यक कोई कहते हैं कि प्राण-प्रयाणके समय एवं पितृ-यज्ञादिमें गणेश-स्मरण प्रसिद्ध नहीं है, यह ठीक नहीं; क्योंकि गया-स्थित गणेश-पद पितृ-मुक्ति देनेवाला है। वेदोक्त पितृ-यज्ञारम्भमें गणेश-पूजनका निषेध नहीं है। अतः वहाँ भी गणेश-पूजन होता है और होना युक्त है, इसीलिये श्रुति गणाधिपतिको ज्येष्ठराज पदसे सम्बोधित करती है। 'गणेशपुराण' में त्रिपुर-वधके समय शिवजीने कहा है— शैवैस्त्वदीयैरथ वैष्णवैश्च शाक्तैश्च सौरैरथ सर्वकार्ये। शुभाशुभे लौकिकवैदिके च त्वमर्चनीयः प्रथमं प्रयत्नात्॥ 'गणेश-गीता' में मरण-कालमें भी गणेश- स्मरण कहा है— यः स्मृत्वा त्यजति प्राणमन्ते मां श्रद्धयान्वितः। स यात्यपुनरावृत्तिं प्रसादान्मम भूभुज॥ 'गणेशोत्तरातापिनी' में भी कहा है— ॐ गणेशो वै ब्रह्म तद्विद्यात्। यदिदं किञ्च सर्वं भूतं भव्यं जायमान च तत् सर्वमित्याचक्षते॥ इस तरह यह सिद्ध हुआ कि पूर्ण परब्रह्म परमात्मा ही निर्गुण एवं विघ्नविनाशकत्वादि-गुणगणविशिष्ट, गजवदनादि-अवयव-मूर्तिधरके रूपमें श्रीगणेश हैं। क्या गणेशजी अनार्योंके देव हैं ? आजकल कुछ ग्रन्थचुम्बक पण्डितम्मन्य पाश्चात्योंके शिष्य होकर बाह्य कुसंस्कार-दूषितान्तः- करण सुधारक श्रीगणेशतत्त्वपर ऊटपटाँग विचार करनेका साहस कर बैठते हैं। वे अपने गुरुओंके विपरीत भला कितना विचार कर सकते हैं? उनका