भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 463

सुखनिधेः पालकं त्वां हवामहे आवाहयामहे। मदन्तःकरणे प्रादुर्भूय स्वस्वरूपानन्दसमर्पणेन ममापि पतिर्भूयाः। पुनः हे देव! अहन्ते गर्भधम् अजायां प्रकृतौ चैतन्य-प्रतिबिम्बात्मकं गर्भं दधातीति गर्भधं बिम्बात्मकं चैतन्यम्, (तथा च—'मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहमिति' भगवत्स्मरणात्) आ-आकृष्य योगबलेन, अजानि- स्वहृदि स्थाप्यानि, त्वं च मम हृदि अजासि-क्षिपसि स्वस्वरूपं स्थापयसि।' अधिकारी उपासक गणपतिकी प्रार्थना करता है—हे सर्वान्तर्यामिन्! देवादिसमूहोंके अधिष्ठान तथा साक्षीरूपसे, प्रियोंको प्रियरूपसे, लौकिक प्रेमास्पदोंको परमप्रेमास्पद-रूपसे, लौकिक सुखराशियोंको अलौकिक परमानन्दसे पालन करनेवाले अर्थात् अपने अंशसे सम्पादन करनेवाले आपका मैं पतिरूपसे आवाहन करता हूँ। आप मेरा भी स्वरूपानन्द-समर्पणद्वारा पालन करें। जगदुत्पादनार्थ प्रकृतिरूप योनिमें स्वकीय चैतन्यप्रतिबिम्बात्मकरूप गर्भको धारण करनेवाले बिम्बचैतन्यरूपको मैं अपने हृदयमें विशुद्धान्तःकरणसे धारण करूँ, एतदनुकूल अनुग्रह करें। ऐसी प्रार्थना है। सर्वविघ्नोंके विनाशक गणेशकी आदिपूज्यता इस तरह मन्त्र-प्रतिपाद्य गणपतितत्त्व सर्वविघ्नोंका विनाशक है। अतएव 'श्रीगणपत्यथर्वशीर्ष' के एक मन्त्रमें 'विघ्नविनाशिने शिवसुताय श्रीवरदमूर्तये नमो नमः' ऐसा आया है। सायणाचार्यने इसका व्याख्यान करते हुए कहा है—'समयकालात्मक- भयहारिणे, अमृतात्मकपदप्रदत्वात्' अर्थात् गणेशजी कालात्मक भयको हरण करनेवाले हैं; क्योंकि वे अमृतात्मकपदप्रद हैं। 'स्कन्द' तथा 'मौद्गल पुराण' में विनायक-माहात्म्य-विषयक एक ऐसी गाथा है— किसी समय राजा अभिनन्दनने इन्द्रभागशून्य एक यज्ञ आरम्भ किया। यह जानकर इन्द्र कुपित हुआ। उसने कालको बुलाकर यज्ञ-भंगकी आज्ञा दी। कालपुरुष यज्ञको भंग करनेके लिये विघ्नासुररूपमें प्रादुर्भूत हुआ। जन्ममृत्युमय जगत् कालके अधीन है। काल तीनों लोकोंको भ्रमण कराता है। ब्रह्मज्ञानी पुरुष कालको जीतकर अमृतमय हो जाते हैं। ब्रह्मज्ञानका साधन वैदिक स्मार्त सत्कर्म है। 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥' सत्कर्मसे विशुद्धान्तःकरण पुरुषको भगवत्तत्त्व-साक्षात्कार होता है और उससे ही कालकी पराजय होती है। यह जानकर काल उस सत्कर्मके नाशके लिये विघ्नरूप होकर प्रादुर्भूत हुआ। सत्कर्महीन जगत् सदा ही कालके अधीन रहता है। इसीलिये कालस्वरूप विघ्नासुर राजा अभिनन्दनको मारकर जहाँ- तहाँ दृश्यादृश्यरूपसे सत्कर्मका खण्डन करने लगा, उस समय वसिष्ठादि मुनि भ्रान्त हो ब्रह्माकी शरणमें गये और उनकी आज्ञासे भगवान् गणपतिकी स्तुति की; क्योंकि गणपतिको छोड़कर किसी भी देवतामें कालनाश- सामर्थ्य नहीं है। गणेशजी असाधारण विघ्नविनाशकत्व गुणसे सम्पन्न हैं, यह बात श्रुति, स्मृति, शिष्टाचार तद्वाक्य एवं श्रुतार्थापत्तिसे अवगत है। श्रीगणेशजीसे विघ्नासुर पराजित होकर उनकी शरणमें गया और उनका आज्ञावशवर्ती हुआ। अतएव गणेशजीका नाम विघ्नराज भी है। उसी समयसे गणेशपूजन-स्मरणरहित जो भी सत्कर्म होता है, उसमें विघ्नका प्रादुर्भाव अवश्य होता है। इसी नियमसे विघ्न भगवान्के आश्रित रहने लगा। विघ्न भी कालरूप होनेसे भगवत्स्वरूप है। 'विशेषेण जगत्सामर्थ्यं हन्तीति विघ्नः।' ब्रह्मादिकोंमें भी जगत्सर्जनादि-सामर्थ्यको हनन करनेवालेको विघ्न कहते हैं। अभिप्राय यह है कि ब्रह्मादि त्रिदेव कार्यब्रह्म कोटिके जब मान्य हैं, तब सृष्टि-सर्जन, रक्षण और संहरणरूप उनके कार्य विघ्नसे अभिभूत होते हैं; अतः वे जगत्सर्जनादिमें पूर्ण स्वतन्त्र सिद्ध नहीं होते। किंतु गणेशके अनुग्रहसे ही विघ्नविरहित होकर कार्यकारणक्षम होते हैं। विघ्न और विनायक—ये दोनों ही भगवान् होनेके कारण स्तुत्य हैं। अतएव 'भगवन्तौ विघ्न- विनायकौ प्रीयेताम्' ऐसा पुण्याहवाचनमें लिखा है। विघ्न गणेशके अतिरिक्त और किसीके वशमें नहीं है, जैसा कि 'योगवासिष्ठ' में शाप देनेको उद्यत भृगुके प्रति विघ्नरूप कालने कहा है—