भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 462, कुल 778 में से

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पृष्ठ 462

'वर' है। भगवान् गणपतिका वाहन 'मूषक' है। 'मूषक' सर्वान्तर्यामी, सर्वप्राणियोंके हृदयरूप बिलमें रहनेवाला, सर्वजन्तुओंके भोगोंको भोगनेवाला ही है। वह चोर भी है; क्योंकि जन्तुओंके अज्ञात सर्वस्वको हरनेवाला है। उसको कोई जानता नहीं; क्योंकि मायासे गूढ़रूप अन्तर्यामी ही समस्त भोगोंको भोगता है। इसीलिये उसे 'भोक्तारं यज्ञतपसाम्' कहा गया है। 'मुष् स्तेये' इस धातुसे मूषक शब्द बनता है। जैसे मूषक प्राणियोंकी सर्वभोग्य वस्तुओंको चुराकर भी पुण्य-पापोंसे विवर्जित ही रहता है, वैसे ही मायागूढ़ सर्वान्तर्यामी भी सर्वभोग्यको भोगता हुआ पुण्य-पापोंसे विवर्जित है। वह सर्वान्तर्यामी गणपतिकी सेवाके लिये मूषकका रूप धारणकर वाहन बना— मूषकं वाहनाख्यं च पश्यन्ति वाहनं परम्। तेन मूषकवाहोऽयं वेदेषु कथितोऽभवत्॥ मुष् स्तेये तथा धातुः ज्ञातव्यः स्तेयब्रह्माधुक्। नामरूपात्मकं सर्वं तत्रासद् ब्रह्म वर्तते॥ भोगेषु भोगभोक्ता च ब्रह्माकारेण वर्तते। अहङ्कारयुतास्तं वै न जानन्ति विमोहिताः॥ ईश्वरः सर्वभोक्ता च चोरवत्तत्र संस्थितः। स एव मूषकः प्रोक्तो मनुजानां प्रचालकः॥ भगवान् गणेश 'लम्बोदर' हैं; क्योंकि उनके उदरमें ही समस्त प्रपंच प्रतिष्ठित है और वे स्वयं किसीके उदरमें नहीं हैं। तथा च—'तस्योदरात्समुत्पन्नं नाना विश्वं न संशयः।' भगवान् 'शूर्पकर्ण' हैं; क्योंकि योगीन्द्र- मुखसे वर्ण्यमान तथा उत्तम जिज्ञासुओंसे श्रूयमाण, अतः हृद्गत होकर शूर्पके समान पाप-पुण्यरूप रजको दूर करके ब्रह्मप्राप्ति सम्पादित कर देते हैं— रजोयुक्तं यथा धान्यं रजोहीनं करोति च। शूर्पं सर्वनराणां वै योग्यं भोजनकाम्यया॥ तथा मायाविकारेण युतं ब्रह्म न लभ्यते। त्यक्तोपासनकं तस्य शूर्पकर्णस्य सुन्दरि॥ शूर्पकर्णं समाश्रित्य त्यक्त्वा मलविकारकम्। ब्रह्मैव नरजातिस्थो भवेत्तेन तथा स्मृतः॥ गणेशजी 'ज्येष्ठराज' हैं। सर्व-ज्येष्ठों (बड़ों)- के अधिपति या सर्व-ज्येष्ठ जो ब्रह्मादि हैं, उनके बीचमें वे विराजमान हैं। वे ही गणेशजी शिव-पार्वतीके तपसे प्रसन्न होकर पार्वती-पुत्रके रूपमें प्रादुर्भूत हुए हैं। गणपति, श्रीकृष्ण, शिव आदि एक ही तत्त्व हैं श्रीरामचन्द्र और श्रीकृष्णचन्द्र जैसे दशरथ एवं वसुदेवके पुत्ररूपमें प्रादुर्भूत होकर भी उनसे अपकृष्ट नहीं हैं, वैसे ही भगवान् गणेश शिव-पार्वतीसे उत्पन्न होकर भी उनसे अपकृष्ट नहीं हैं, अतएव उनकी शिव-विवाहमें विद्यमानता और पूज्यता होना कोई आश्चर्य नहीं है। 'ब्रह्मवैवर्तपुराण' में लिखा है कि पार्वतीके तपसे गोलोक-निवासी पूर्ण परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण ही गणपतिरूपसे प्रादुर्भूत हुए हैं। अतः गणपति, श्रीकृष्ण, शिव आदि एक ही तत्त्व हैं। इसी गणपति-तत्त्वको सूचित करनेवाला ऋग्वेद (२।२३।१)-का यह मन्त्र है— 'गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपम- श्रवस्तमम्। ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम्॥' इससे मिलता-जुलता ही गणपति-स्तावक मन्त्र यजुर्वेद (२३।१९)-में भी है। 'गणानां त्वा गणपतिँ हवामहे' इत्यादि। ऋग्वेदके मन्त्रका सर्वथा गणपतिस्तुतिमें ही तात्पर्य है। यजुर्वेदगत मन्त्रका विनियोग यद्यपि अश्वस्तवनमें है तथापि केवल अश्वमें मन्त्रोक्त-गुण अनुपपन्न होनेसे अश्वमुखेन गणपतिकी ही स्तुति इस मन्त्रसे होती है। मन्त्रार्थ इस तरह है—'हे वसो! वसति सर्वेषु भूतेषु व्यापकत्वादिति, तत्सम्बुद्धौ। गणानां महदादीनां, ब्रह्मादीनाम् अन्येषां वा समूहानाम्। गणीरूपेण, साक्षिरूपेण, ज्ञेयाधिष्ठान- रूपेण वा। 'गण' संख्याने इत्यस्माद् गण्यते बुद्ध्यते, योगिभिः साक्षात्क्रियते यः स गणस्तद्रूपेण वा पालकम्, एतादृशं त्वां आवाहयामहे। तथा प्रियाणां वल्लभानां, प्रियपतिं प्रियस्य पालकम्। तच्छेषतयैव सर्वस्य प्रेमास्पदत्वात्। 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवतीति' श्रुतेः। निधीनां सुखनिधीनां,

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