भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगणपति-तत्त्व ४५१ अतीन्द्रिय वस्तुका ज्ञान करानेमें एकमात्र शास्त्र ही प्रमाण हो सकता है। शास्त्र मुख्यरूपसे वेद और वेदानुसारी स्मृतीतिहासपुराणादि ही हैं, यह बात आगे पूर्णरूपसे विवेचित की जायगी। शास्त्र गणपतिको पूर्ण परब्रह्म बतलाते हैं। पूर्वोक्त 'श्रीगणपत्यथर्वशीर्ष' श्रुतिमें गणपतिको 'त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि'—ऐसा कहा गया है। उसका अभिप्राय यह है कि गणपतिके स्वरूपमें नर तथा गज—इन दोनोंका ही सामंजस्य पाया जाता है। यह मानो प्रत्यक्ष ही परस्परविरुद्धसे प्रतीयमान 'तत्पदार्थ' तथा 'त्वं पदार्थ' के अभेदको सूचित करता है; क्योंकि तत्पदार्थ सर्वजगत्कारण सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमात्मा होता है एवं त्वं पदार्थ अल्पज्ञ अल्पशक्तिमान् जीव होता है। उन दोनोंका ऐक्य यद्यपि आपात-विरुद्ध है तथापि लक्षणासे विरुद्धांश-द्वयका त्यागकर एकता सुसम्पन्न होती है। तद्वत् लोकमें यद्यपि नर और गजका ऐक्य असम्मत है तथापि लक्षणासे विरुद्धधर्माश्रय भगवान्में उसका सामंजस्य है अथवा जैसे तत्पद-लक्ष्यार्थ सर्वोपाधि- निष्कृष्ट 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' एवं लक्षणालक्षित ब्रह्म है, वैसे ही त्वं पदार्थ जगन्मय सोपाधिक ब्रह्म है। इन दोनोंका अखण्डैकरस, 'असि' पदार्थमें सामंजस्य है। इसी तरह नर और गजस्वरूपका सामंजस्य गणपतिस्वरूपमें है। 'त्वं'-पदार्थ नर-स्वरूप है तथा 'तत्'-पदार्थ गजस्वरूप है एवं अखण्डैकरस गणपतिरूप 'असि' पदार्थमें इन दोनोंका सामंजस्य है। गणेशजीके विविध नामों तथा आयुधों आदिका स्वरूप शास्त्रोंमें नरपदसे प्रणवात्मक सोपाधिक ब्रह्म कहा गया है—'नराज्जातानि तत्त्वानि नाराणीति विदुर्बुधाः'। गजशब्दार्थका विवेचन शास्त्रोंमें ऐसा किया गया है—'समाधिना योगिनो गच्छन्ति यत्र इति गः, यस्माद् बिम्बप्रतिबिम्बवत्तया प्रणवात्मकं जगज्जायते इति जः।' समाधिसे योगी लोग जिस परमतत्त्वको प्राप्त करते हैं, वह 'ग' है और