भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 460

द्वितीय खण्ड—देवोपासनातत्त्व गणपति-तत्त्व गणपति ब्रह्म ही हैं सर्वजगन्नियन्ता पूर्ण परमतत्त्व ही गणपति-तत्त्व है; क्योंकि 'गणानां पतिः गणपतिः।' 'गण' शब्द समूहका वाचक होता है—'गणशब्दः समूहस्य वाचकः परिकीर्तितः।' समूहोंका पालन करनेवाले परमात्माको गणपति कहते हैं। देवादिकोंके पतिको भी गणपति कहते हैं। अथवा 'महत्तत्त्वादितत्त्वगणानां पतिः गणपतिः।' अथवा 'निर्गुणसगुणब्रह्मगणानां पतिः गणपतिः', अथवा 'सर्वविध गणोंको सत्ता- स्फूर्ति देनेवाला जो परमात्मा है, वही गणपति है।' अभिप्राय यह कि 'आकाशस्तल्लिङ्गात्' इस न्यायसे जिसमें ब्रह्मतत्त्वके जगदुत्पत्तिस्थितिलयत्व, जगन्निय- न्तृत्व, सर्वपालकत्वादि गुण पाये जायें, वही ब्रह्म होता है। जैसे आकाशका जगदुत्पत्तिस्थितिकारणलीलत्व 'आकाशादेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते' इस श्रुतिसे जाना जाता है, इसलिये वह भी आकाशपदवाच्य परमात्मा माना जाता है, वैसे ही 'ॐ नमस्ते गणपतये। त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि। त्वमेव केवलं कर्तासि। त्वमेव केवलं धर्तासि। त्वमेव केवलं हर्तासि। त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि।' इत्यादि 'श्रीगणपत्यथर्वशीर्ष' वचनसे गणपति ब्रह्म ही हैं। अतीन्द्रिय, सूक्ष्मातिसूक्ष्म वस्तुतत्त्वका निर्णय केवल शास्त्रके ही आधारपर किया जा सकता है। जैसे शब्दकी अवगति श्रोत्रसे ही होती है, वैसे ही पूर्ण परमतत्त्वकी अवगति भी शास्त्रसे ही होती है। इसलिये 'तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि' 'शास्त्रयोनित्वात्' इत्यादि श्रुतिसूत्र तथा अनेकविध युक्तियोंसे भी यही सिद्ध होता है कि सर्वजगतकारण ब्रह्म शास्त्रैकसमधिगम्य है। यदि शास्त्रातिरिक्त अन्य प्रमाणोंसे वस्तुतत्त्वकी अवगति हो जाय तो शास्त्रके अनुवादकमात्र होनेसे उनका नैरर्थक्य-प्रसंग भी दुर्वार होगा, इसलिये गणपतितत्त्वकी अवगतिमें मुख्यतया शास्त्र ही प्रमाण है। शास्त्रानुसार यही जाना जाता है कि सर्वदृश्यजगत्का पति ही गणपति है; क्योंकि 'गण्यन्ते बुद्धयन्ते ते गणाः' इस व्युत्पत्तिसे सर्वदृश्यमात्र ही गण है और उसका जो अधिष्ठान है, वही गणपति है। कल्पितकी स्थिति, प्रवृत्ति अधिष्ठानसे ही होती है, अतः कल्पितका पति अधिष्ठान ही युक्त है। यद्यपि कहा जा सकता है कि तब तो भिन्न-भिन्न पुराणोंमें शिव, विष्णु, सूर्य, शक्ति आदि सभी ब्रह्मरूपसे विवक्षित हैं। जब कि ब्रह्मतत्त्व एक ही है तो उसके नाना रूप भिन्न-भिन्न पुराणोंमें कैसे पाये जाते हैं? इसका उत्तर यही है कि एक ही परमतत्त्व भिन्न-भिन्न उपासकोंकी भिन्न- भिन्न अभिलषित सिद्धिके लिये अपनी अचिन्त्य लीला-शक्तिसे भिन्न-भिन्न गुणगणसम्पन्न एवं नामरूपवान् होकर अभिव्यक्त होता है। जैसे भामनीत्व, सर्वकामत्व, सर्वरसत्व, सत्यसंकल्पत्वादिगुण-विशिष्ट ब्रह्मतत्त्वकी उपासना करनेसे उपासकोंको उपास्यविशेषण गुण ही फलरूपमें प्राप्त होते हैं, ठीक वैसे ही प्राधान्येन विघ्नविनाशकत्वादिगुणगणविशिष्ट गणपति- रूपमें वही परमतत्त्व आविर्भूत होता है। शास्त्रद्वारा ही गणपतिके ब्रह्मत्वका परिज्ञान यदि कहा जाय कि फिर इसी तरहसे बाह्याभिमत भिन्न-भिन्न देव भी ब्रह्मतत्त्व ही होंगे तथा इतना ही क्यों, जबकि सारा ही प्रपंच ब्रह्मतत्त्व है, तब गणपति ही क्यों विशेषरूपसे ब्रह्म कहे जायें? इसका उत्तर यही है कि यद्यपि अधिष्ठानरूपसे बाह्याभिमत देव तथा तत्तद्वस्तु सकल ब्रह्मरूप कहे जा सकते हैं तथापि तत्तद्गुणगणविशिष्टरूपसे ब्रह्मत्व तो केवल शास्त्रसे ही जाना जा सकता है; अर्थात् शास्त्र ही जिन-जिन नामरूपगुणयुक्त तत्त्वोंको ब्रह्म बतलाते हैं, वे ही ब्रह्म हो सकते हैं; क्योंकि यह कहा जा चुका है कि 1982 Bhaktisudha_Section_16_1_Back