भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरामपञ्चाध्यायी ४४९ कहींपर यही औपपत्यादि आलम्बनादिके उत्कृष्ट अतएव अरुन्धती आदि सतियाँ इनकी पादपांसु चाहती होनेसे उत्कृष्ट माना जाता है, जैसे यही गोपांगनाओंका हैं। इनके अतिरिक्त कौन ऐसी युवति होगी, जो श्रीकृष्णविषयक प्रणयौत्कण्ठ्य, जिसके फलस्वरूप साक्षात् नारायणके दर्शन करके उनपर मुग्ध न हो। यह अनसूया, अरुन्धती-जैसी भी उनकी पादधूलिके लिये तो गोपांगनाओंकी ही विशेषता थी कि जो श्रीमन्नारायणके लालायित रहती हैं। गोपांगना यद्यपि पुंश्चली गिनी भी साक्षात् दर्शन करके उनसे भी श्रीश्यामसुन्दर- गयीं, पर वे थीं श्रीकृष्णकी - परम पुरुषकी संगिनी या सम्मिलनकी ही प्रार्थना की, यहाँ यह दिखाया गया कि पुंश्चली, अतएव उनका यह उत्कर्ष है, तभी तो जैसे महासम्राट के समक्ष इतरोंका ऐश्वर्य अभिव्यक्त श्रीकृष्ण परमात्मा भी उनके दास्यकी प्रार्थना करते हैं। नहीं होता, जैसे सूर्यके सामने चन्द्रनक्षत्रादि फीके पड़ कोई कितनी भी साध्वी-पतिव्रता होगी, वह भी जाते हैं, दीखते ही नहीं, वैसे ही महामहामाधुर्यके सामने भगवान्के ऐश्वर्य-माधुर्यपूर्ण नारायणस्वरूपपर मुग्ध समस्त ऐश्वर्य अस्त हो जाते हैं, प्रकट ही नहीं होते। हुए बिना नहीं रह सकती। अनसूया-जैसी भी भगवान् श्रीराधिकाजीमें पूर्णतम माधुर्यका प्रकाश नारायणके स्वरूपपर आसक्त हो गयी- यह भूषण ही प्रेमकी स्थिति प्राणिमात्रमें अणु-परिमाणमें, है, कोई दूषण नहीं। परंतु एक कथासे ज्ञात होता है कि पार्षदादिमें मध्यम परिमाणमें और महत्परिमाणमें कृष्णप्रणयिनी गोपांगना उसपर भी मुग्ध न हुईं। गोपांगनाओंमें थी। इसके अतिरिक्त श्रीराधिकाजीमें ऐश्वर्यभावसे भी अधिक माधुर्यभावकी वही प्रेम परममहत्परिमाणपरिमित था। पूर्णतम माधुर्यका महत्ता - लीलाका एक दृष्टान्त प्रकाश वहीं हुआ। वहींकी यह कथा प्रसिद्ध है कि एक बार श्रीश्यामसुन्दर गोपांगनाओंके साथ उसी निकुंजमें जहाँ गोपांगनाओंके सामने श्रीकृष्ण वासन्तिक रासोत्सव मना रहे थे। उसी समय सहसा नारायणरूपमें छिप गये, श्रीराधाजीके आते ही उनकी धोखा देकर वे एक कुंजमें छिप गये। गोपांगना ढूँढ़ती वह ऐश्वरी माया नहीं टिक सकी। उनका वह हुई वहीं जा पहुँचीं; क्योंकि वे अपने सौगन्ध्य- चतुर्भुजस्वरूप द्विभुज श्यामसुन्दरके रूपमें तुरंत प्रकट माधुर्यादिपूरको न छिपा सके, उसके लोभी भौंरे, मयूर हो गया। अतः यहाँ जितना-जितना लोकदृष्टिमें तथा हरिणांगनाओंका ताँता उधर ही बँध गया। अपकर्ष, उतना-ही-उतना प्रणय-पथमें उत्कर्ष सिद्ध श्रीश्यामसुन्दरने सोचा- 'ये तो आयी, अब क्या करें, होता है। इसी दृष्टिसे औपपत्यका भी उत्कर्ष है। अपनी तो यह निह्नुति-लीला (गोपन-लीला) ही जैसे जल और तरंगमें अन्य सम्बन्धकी कल्पना बिगड़ी।' दासीके समान पीछे-पीछे घूम रही ऐश्वर्यशक्तिकी नहीं- '....तरङ्गन वारि ज्यों....' वैसे ही बाहर- सहायतासे वे झटपट चतुर्भुजधारी नारायण बन गये ! भीतर गोपांगनाओंमें श्रीकृष्णतत्त्व विराजमान है। अन्वेषणक्रम-प्राप्त उन नारायणका गोपांगनाओंने दर्शन जलका और तरंगका अखण्ड सम्बन्ध है। इनमें किया, पर वह आकर्षण, वह औत्कण्ठ्य, वह आनन्द श्रीवृषभानुनन्दिनी राधारानी तो और भी अन्तरंग हैं, उन्हें नहीं प्राप्त हुआ, जो श्रीकृष्ण-सम्मिलनमें प्राप्त वे जलमें माधुर्यस्थानीया हैं। फिर वहाँ कैसा औपपत्य ? होता। परंतु फिर भी उन्होंने नम्रतासे प्रणाम किया। अतः औत्कण्ठ्यवृद्ध्यर्थ इनकी कल्पना है। ऐसे ही उन्हें वरदानोन्मुख देखकर वर माँगा- 'श्रीश्यामसुन्दर 'गोपालाङ्गणकर्दमेषु विहरन्' की कल्पना है। इन हमें शीघ्र मिल जायँ।' क्या श्रीनारायणमें भूषण- भगवल्लीलाओंकी अति साधारणतासे प्राणियोंको वसन-सौन्दर्यकी कमी थी ? पर उनके मनमें-हृदयमें विश्वास, आशा बँधती है कि हम दीनोंको भी उस विराजमान अद्भुत छवि श्रीश्यामसुन्दरकी मूर्तिके आगे तत्त्वका स्वरूपदर्शन सम्भव है। तथा च इन्हीं वह सब कुछ नहीं जँचा। इस दृष्टान्तसे इनकी दृष्टियोंसे 'पूतनायन्ती, कृष्णायन्ती', 'दैत्यायित्वा' अटलता, अनन्यता तथा प्रणयातिशय व्यक्त होता है। आदि श्रीब्रजसुन्दरीयोंकी सफल लीला-प्रकृति है।