भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४८ भक्तिसुधा रोकते हैं, शम, दम, उपरति, तितिक्षा आदि साधनोंमें अपने जीवनको मिटा देते हैं, आश्चर्य है कि आप उनके मालिक भी नहीं बनना चाहते, स्वामी बननेसे भी घृणा करते हो। आपके इन चरित्रोंको देखकर यही निश्चय करना पड़ता है कि आपकी पदप्राप्ति केवल प्रेमसाध्य है, एकमात्र रागानुगा भक्ति ही सर्वतोभावेन आपको वशमें कर सकती है। वहाँ रुचि किस चीजकी थी, यह बात दूसरी है। गायने हुंकार किया, बछड़ेने बुलाया, हम्मारव करते ही चट बोल पड़े। उधर गोपांगनाओंके पुंश्चली भावपर भी रीझ गये। यहाँ सब बात उलटी। जितनी ऊँची चीज सब नीची कर दी गयी। महाराजाधिराजका वह स्वरूप इतने महत्त्वका नहीं हुआ, जितना पार्थसारथिका। सखा अर्जुनके घोड़ोंके सहीस बने। महाभारत-युद्धमें अर्जुनके घोड़े जलके बिना क्लान्त हो गये, उनके लिये उन्होंने पाताल-गंगा निकाली। पार्थसारथिने रथसे घोड़ोंको खोलकर जल पिलाया, स्नान कराया, घोड़ोंकी लगाम अपने मुखमें पकड़ी, तोत्र (चाबुक)-को मुकुटमें खोंसा और चार हाथोंसे उनको धोया-पोंछा। उस समयकी उनकी झाँकी देखते ही बनती थी। राजा-महाराजा भी जिसको नहीं कर सकते, उसे प्रेमके बन्धनमें बँधकर उनके अधिराजराजने किया। परंतु यह भी गोपांगणकर्दम- क्रीड़ाके आगे तो फीका पड़ जाता है। तभी तो एक महात्माने कहा— 'परमिममुपदेशमाद्रियध्वं, निगमवनेषु नितान्तखेदखिन्नाः। विचिनुत भवनेषु वल्लवीनामुपनिषदर्थमुलूखले निबद्धम्॥' अर्थात् वेदशास्त्रोंके उपदेशारण्यमें—कर्मोपासना एवं ज्ञानकी भूलभुलैयामें भटक रहे और अभिलषितको न प्राप्त करके दुःखी हो रहे प्राणियो, हमारी नेक सलाह मानो, वह उपनिषदोंका सार अरण्योंमें या आरण्यकोंमें न मिलेगा, वह तो गँवारी ग्वालिनोंके घरोंमें माखन- चोरी करते हुए अथवा यशोदाके आँगनमें ऊखलसे बाँधा मिलेगा, वहाँ उसे ढूँढ़ो। यहाँ प्रेमकी रसमयी लीलाओंमें गुंजाओंके समक्ष कौस्तुभ- मणिका कोई सम्मान या महत्त्व नहीं। यहाँ लक्ष्मीपति और रुक्मिणीपतित्व भी पुंश्चलीपतित्व या गोपीजनवल्लभताके सामने मन्थर पड़ जाता है। 'उज्ज्वलनीलमणि' में समर्थन किया गया है कि अरुन्धती, अनसूया आदि बड़े-बड़े सतीवृन्द भी इन पुंश्चलियोंकी पादधूलिके लिये लालायित हैं—व्याकुल हैं; क्योंकि ये ही सती परम सती हैं, जिन्होंने अपर पुरुषका संग त्यागकर 'परपुरुष' का संग किया। अनन्त अखण्ड महामहिम श्रीकृष्ण ही परम पुरुष हैं, परमात्मा हैं, ब्रह्म हैं। वसिष्ठ, अत्रि आदि पुरुष हैं, जीव हैं, पातिव्रत्यधर्मपूर्वक इनकी सेवासे फलरूपमें परम पुरुषकी प्राप्ति होती है, ये साधन हैं, वे साध्य; अरुन्धती आदि सतियाँ अभी आराधना करती हैं, पीछे हैं और गोपांगनाओंने फल प्राप्त कर लिया, उन्हें 'परपुरुष' की प्राप्ति हो गयी, वे कृतकृत्य हो गयीं। अतएव मन, बुद्धि, रोम-रोममें प्रविष्ट श्रीकृष्णकी शकटायती आदि अनुकृति-लीलाद्वारा गोपांगना परानन्दमें विलीन हुईं। दैत्यायित्वा जहारान्यामेका कृष्णार्भभावनाम्। रिङ्गयामास काप्यङ्घ्री कर्षन्ती घोषनिःस्वनैः॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।१६) इसी लीलानुकरणमें एक गोपांगना श्रीश्यामसुन्दरकी भावनासे बालकृष्ण बन गयी। पाँवोंमें नूपुर पहन लिये, घुटनोंके बल चलने लगी। नूपुरके छोटे-छोटे घुँघुरूके घोषसे वह साशंक हो गयी। बालवत् किलकारी मारकर भाग उठी। अपनी ही पादस्थ नूपुर ध्वनिसे वह चकित हो गयी। नूपुरके रुचिर घोषसे स्तब्ध होकर वह पीछेकी ओर मुँह घुमाकर देखने लगी, यों भगवान् बालमुकुन्दके अनुकरणमें मग्न हो गयी। इसका अभिप्राय यह कि इस प्रकारकी तल्लीनतासे— तीव्रसंवेगवान् प्रेमसे निम्नकोटिके भी लोग उन पूर्ण पुरुषको प्राप्त कर सकते हैं। 'गोपालाङ्गणकर्दमेषु विहरन्' आदिसे भी यही ध्वनित होता है। यहाँकी लीला ही अद्भुत है। राजाधिराजस्वरूपकी अपेक्षा पार्थसारथिका भाव ही दूसरा है और इसकी अपेक्षा भी गोपालांगणकर्दम-विहारीका स्वरूप और भी उच्च है। कहीं ज्ञानवैराग्योदीप्त शान्त रस ही उत्कृष्ट माना जाता है, शृंगार रस उसके सामने निकृष्ट है। कहीं दाम्पत्यप्रेममें शृंगार रस ही उत्कृष्ट हो जाता है। इसके विपरीत औपपत्यमें वह रसाभास हो जाता है, परंतु