भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविरुद्ध भाव, जो प्राणत्यागरूप है, नहीं हुआ; क्योंकि यहाँ विशुद्ध भावना थी, अतः इसका फल तो हुआ, पर जिघांसा न होनेसे प्राणत्याग नहीं हुआ। गोपियोंद्वारा शकटासुर-तृणावर्त-उद्धार आदि लीलाओंका अनुकरण 'तोकायित्वा रुदत्यन्या पदाहञ्छकटायतीम्॥' (श्रीमद्भा० १०।३०।१५) पूतनालीलाका अनुकरण समाप्त हुआ। अब दूसरी शकटासुर-लीलाका अनुकरण आरम्भ हुआ। 'तोकवत् आचरन्ती तोकायन्ती'—एक मासके छोटे बच्चेके जैसा आचरण करनेवाली एक दूसरी गोपी बन गयी। इसमें उन्हें भगवान्की बाललीलाकी स्फूर्ति हुई। भगवान् बालकृष्ण जबतक मैयाको नहीं देखते, तबतक इधर- उधर क्रीड़ासक्त रहते हैं, परंतु ज्यों ही मैयाको देखा कि दूध पीनेके लिये पाँव पटक-पटककर रोने लगते, मचलने लगते हैं। वैसे ही यह गोपी बालचापल्यके अनुकरणको सफल बनाती है—पाँव पटकती है; मानो रूप-सरोवरमें समुद्भूत कमल विरह पवनसे विधूनित हो रहा हो। यहाँ उसका रूप ही सरोवर, पाद ही कमल और उनका प्रताड़न ही विधूनन है। विरुद्ध भावका गोपांगनाओंको स्पर्श भी नहीं करना है। यहाँ श्रीव्रजेन्द्रचन्द्र नन्दनन्दनकी अधरसुधाके पानकी ही इन्हें उत्कण्ठा है। जैसे श्रीश्यामसुन्दर यशोदाके पयःपानार्थ पादप्रताड़न करते हैं, वैसे सुधापानार्थ गोपांगनाओंका यह अनुकरण है। यों बालकके अनुकरणमें रोती हुई एक गोपीने शकटासुरका आचरण करनेवाली दूसरी गोपीको पाँवसे गिरा दिया— 'पदाहञ्छकटायतीम्॥' वास्तविक परिस्थितिका स्मरण करके वियोगतप्त गोपांगना परस्पर कहती हैं—'हाय सखि, यदि हम शकटासुर भी बनी होतीं तो श्रीप्राणप्यारेका यह सुकोमल चरणतल तो मिला होता।' लीलानुकरणमें शकटकी तरह गोपी बनी, उसे श्रीकृष्णपादस्पर्शका सुख नहीं मिला। दूसरीने कहा—'सखि ! तृणावर्त अच्छा था, हम लालसा करती हैं, कब प्यारे श्यामसुन्दर हमारे हार बनें। इन हीरक हारोंमें आनन्द नहीं, वह हार हमें नहीं, तृणासुरको मिला। प्यारे मोहन उसके गलेसे लिपटे और हार बन गये। सखि ! इस जन्ममें तो वे हमारे हार बनेंगे नहीं, आओ तब राक्षस ही बनें, राक्षस ही सही, प्राणप्यारे तो मिलेंगे।' गोपांगनाओंका तुरंत भाव बदल जाता है और वे प्रार्थना करने लगती हैं—'प्यारे मनमोहन, हमारे हृदयहार बननेमें आपको लज्जा लगती है और उन क्रूर राक्षसोंके गलेसे लगे रहते हो, क्या हम इतनी बुरी हैं?' गोपांगनाओंके समूहमें कोई एक गोपी बाललीलानुकणार्थ श्रीकृष्णस्वरूप बनी। यह योगमायाका प्रभाव है, वह परमानुरागवती गोपीसे जो