भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्वस्वरूपमें ही रमण होता है। अधर-सुधामें दोनों प्रकट हैं। जहाँ इसका सम्बन्ध है, वहीं श्रीराधाका प्राकट्य है। भगवद्भोग्या सुधा भी अधरसुधाका साधन बनती है। इस प्रकार पूतना आदि और व्रजांगनाओंके श्रीकृष्ण-सायुज्यमें भेद है। लीलाके अनन्त होनेसे यहाँ सर्वदा सायुज्य नहीं। प्रेमपीड़ावश गोपांगना पूतनाको बड़ी मानकर उसके भावसे पूतना बनना चाहती हैं। वे चाहती हैं—किसी भी प्रकार हमें भी प्राण-धन श्रीश्यामसुन्दर मदनमोहन राधाविहारीका सम्बन्ध मिल जाय। इसीलिये पूतना भी बननेको तैयार हैं— ‘कस्याश्चित् पूतनायन्त्याः कृष्णायन्त्यपिबत् स्तनम्।’ गोपांगनाएँ सोचती हैं—‘अहो ! पूतना धन्य है, जिसके उरःस्थलपर प्राणप्यारे श्रीश्यामसुन्दरने विहार किया, हाय, हम कहीं पूतना भी बनी होतीं तो हमारा भाग्योदय हो जाता।' इन भावोंमें मग्न व्रजांगनाएँ पूतना बनीं। अथवा गोपांगनाएँ सायुज्यप्राप्ति ही चाहती हैं। यद्यपि अन्तःकरणसे उन्हें यह इष्ट नहीं है तथापि वियोगकी असह्यतामें वे इसे ही अच्छा समझती हैं। सोचती हैं, चलो पूतना बननेसे प्राणधनका उरःस्थानपर विहार तो मिलेगा ही, जो हमें इष्ट है, फिर सायुज्य ही सही, रात-दिन विरहवह्निमें जलते रहनेसे वही क्या बुरा है। पहले सायुज्यमें भेद बतलाया गया है—अघासुर, बकासुर आदिको सायुज्य प्राप्त हुआ, वे भगवत्पादारविन्दमें लीन हुए और गोपांगनाएँ श्रीमुखमें। दैत्यवध, भक्तसंकेत आदिमें साधनता है और परिरम्भण आदिमें फलता है, परंतु मुखमें तो सदा ही फलरूपता है। हाँ, उसकी सुधामें भेद अवश्य है, जैसे देवभोग्या सुधा साधन होती है, लता-वृक्ष आदिमें भगवदुपयोग्यता-सम्पादनार्थ उसका प्रयोग किया जाता है। वेणुगीतपीयूषसे लतादिमें, परिकरोंमें भगवद्भोग्यता सम्पादित की जाती है; क्योंकि वहाँ श्रीवृषभानुनन्दिनीका संचार हुआ है। मुख अग्नि माना गया है—‘मुखादग्निरजायत।’ कौन अग्नि प्राकृत नहीं ? जब पूर्णतम पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण प्राकृत नहीं, अपितु अचिन्त्य, अनन्त, अद्भुत रससुधासिन्धु हैं, तब उनकी मुखाग्नि भी प्राकृत नहीं, अपितु वह अप्राकृत विरहवैश्वानर है। यह अग्नि मुखमें ही क्यों ? तो प्राधान्यात् मुखमें व्यपदेश है, वैसे तो वह सर्वावयव-अधिष्ठित है। विप्रलम्भ-सम्भोगात्मक उभयविध शृंगार भी उनमें है। भगवान् सकल- विरुद्धधर्माश्रय हैं, अतः उनमें दोनों ही शृंगार एक साथ हैं, वहाँ भी उद्बुद्ध और उद्वेलित रूपमें यहाँ उभयविधता भी श्रीभगवान्के सर्वांगहीमें है। ‘मुखम्’ का अन्यत्र प्राधान्य अर्थ है। यहाँ भी ‘मुखमिव मुखम्’ के रूपसे मुखकी प्रधानता है। उसमें प्रधानता विरहकी है। सर्वांगमें मुख प्रधान है, शृंगारमें विरहाग्नि प्रधान है। इस प्रकार दोनों प्राधान्य है। श्रीमद्वल्लभाचार्य ‘विरहवैश्वानरावतार’ माने गये हैं। वह विप्रलम्भशृंगार ‘अग्नि’ होनेपर भी ‘रस’ है और वह भी है सर्वोत्कृष्ट। इस प्रकार श्रीकृष्ण परमात्माके मुखमें लय होना मानो वियोगरसमें लय होना है। मुख विप्रयोग रस है, व्रजांगनाओंका उसीमें लय होना है। अतः यही विशेषता है, यह लय स्थायी नहीं। जैसे अपार समुद्रकी उसीकी वस्तुका उसीमें निमज्जन-उन्मज्जन हो। वस्तुतस्तु श्रीकृष्णके उभयविध उद्बुद्ध शृंगारमें पुनः- पुनः भावुकोंका आविर्भाव-तिरोधान भाव होता है। मुखमें भी सर्वातिशायी अधरसुधाका पान होता है। अस्तु, देवभोग्या सुधा तो समझमें आयी, पर भगवद्भोग्या क्या ? तो यही विलक्षणता है। केवल श्रीकृष्णभोग्या ही भगवद्भोग्या सुधा है। परंतु अपने ही रसका अपनेको पान कैसे हो ? नायिकाधरका रसास्वाद होता है। यह रसरीतिके विरुद्ध है। इसके बहुत भेद हैं। लोभ ही अधर है (यह भगवद्विभूति है), वही अध्यक्ष है। मायाशक्तिसे लोभी कोषाध्यक्ष बना है। पात्रापात्रविचारपूर्वक दान ही अध्यक्षता है। अतः उसे अपनी अधरसुधाका अध्यक्ष वह देवभोग्या देवोंको देता है और गोपांगनाभोग्याको उनके हृदयोंमें वंशीद्वारा भेजता है। वेणु बहुत ऊँचे अधिकारवाली है, पर उसे कुछ नहीं मिला। ‘दर्वी पाकरसं यथा’— जैसे कलछुल दाल-साग आदिके खट्टे-मीठे स्वादको नहीं जानती, वैसी ही वंशीकी दशा है। चषक (पानपात्र)-को कुछ नहीं मिलता। श्रीश्यामसुन्दर भगवान्ने भगवद्भोग्या सुधाको गोपांगनाओंके अन्तरमें पहुँचानेके लिये वंशीको रखा है। वह दर्वीकी तरह