भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 451

'उत्कृष्टानां सनकादिशुकादिमुनीनामपि मदः सञ्जायते यासां वचसा ता उन्मत्तवचः' अर्थात् सनकादि-शुकादि परम वीतराग महामुनियोंको भी जिन व्रजदेवियोंकी बातें सुनकर, तन्मयता देखकर मद—आनन्दविभोरता होती है अथवा इन मुनियोंकी कौन कहे, इनसे भी उत्कृष्ट इनके भी उपास्य साक्षात् श्रीकृष्ण परमात्मा भी जिनके प्रेम-लपेटे अटपटे वचनोंको सुनकर मोदमग्न हो उठते हैं, उन उन्मत्तवचनाओंको धन्य है—'उत्कृष्टस्य श्रीकृष्णस्य परमात्मनोऽपि उन्मादकरो वचो यासां ता उन्मत्तवचः।' ऐसी हैं वे उन्मत्तवचना, कोई सामान्य नहीं। उन्होंने लीला आरम्भ की। प्रश्न हो सकता है कि जब वे भगवान्‌की लीलाके स्मरणसे ही इस दशाको पहुँची हैं—परम सन्तप्त हो रही हैं, तब उसीसे उन्हें सान्त्वना कैसे मिल सकती है? क्या लीलानुकरणरूप घृतसे समुद्दीप्त वह विरह-वाडवाग्नि अबकी बार उन्हें भस्म ही न कर देगा? हाँ, यह सम्भव है, परंतु वे तो 'तदात्मिकाः' ('तस्मिन् श्रीकृष्णे एव आत्मा मनो यासां ताः') हैं। उनका मन शैत्यसुधापाथोधिसदृश श्रीकृष्ण परमात्मामें समासक्त था, अतः भस्म नहीं हुईं, जीवित ही रहीं। बात ठीक भी है—'को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद् यदेष....।' (तैत्तिरीय० २।७) कौन उन पूर्णतम पुरुषोत्तम परब्रह्म श्रीकृष्णके बिना जीवित रहता, सत्तावान् होता, यदि उनमें वे विराजमान न होते। अतएव उनके अन्तर्हित होते ही 'अतप्यंस्तमचक्षाणाः' (श्रीमद्भा० १०।३०।१) आदि गोपदेवियोंकी स्थिति बतलायी गयी है और अब उन्हींके लिये 'लीला भगवतस्तास्ता ह्यनुचक्रुस्तदात्मिकाः' कहा जा रहा है। भाव यह है कि श्रीकृष्ण ही उनमें विराजमान थे और उनकी लीलाने ही उन्हें लीलानुकरणमें प्रवृत्त किया। लीलानुकरण आरम्भ हुआ— कस्याश्चित् पूतनायन्त्याः कृष्णायन्त्यपिबत् स्तनम्। तोकायित्वा रुदत्यन्या पदाहञ्छकटायतीम्॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।१५) किसीने पूतनाके जैसा आचरण किया, कोई गोपी उसके स्तनपानार्थ श्रीबालमुकुन्द बन गयी। पूतनाभाव प्रकृत उज्ज्वल रसके विरुद्ध है, गोपीभावसे इसमें बहुत अन्तर है। पूतना श्रीकृष्ण-जिघांसा (मारनेकी इच्छा)-से आयी थी, उसने अपने स्तनोंमें कालकूटका लेप किया था, वही स्तन उसने यशोदोत्संगललित श्रीबालमुकुन्दको पिलाया था। इससे भी अवश्य उसकी दिव्यगति हुई, धात्रीके जैसी गति उसने पायी— अहो बकी यं स्तनकालकूटं जिघांसयापाययदप्यसाध्वी। लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं कं वा दयालुं शरणं व्रजेम॥ (श्रीमद्भा० ३।२।२३) परंतु इस पद्यमें 'जिघांसया' से इस कार्यका अनौचित्य निर्दिष्ट हुआ है, ऐसे ही 'अपि' से भी अर्थात् जो प्रभु समस्त निरुपाधिक कल्याण-गुणगणोंके आस्पद थे, जिनकी समस्त प्रकारसे अर्हणा उचित थी, जिनके मंगलमय श्रीविग्रहपर अपनेको न्योछावर कर देना चाहिये था, उन्हें विषपान कराया; उनके प्रति जिघांसा प्रकट की, धिक्-धिक्! यह दूसरी बात थी कि इस दुष्कृत्यसे भी पूतनाको धात्र्युचित उत्तमगतिका लाभ हुआ। यह तो श्रीकृष्ण परमात्माके सम्बन्धकी विशेषताका महत्त्व है। उत्तम आश्रय और विषय आदिकी महिमासे अनुचित भी उचित हो जाता है। चोरी बुरी, परंतु श्रीकृष्णकी माखन-चोरी इसका अपवाद है, वह भावुकजनमानसोल्लासिनी है। काम बुरा, पर विषय-महिमासे (कृष्णविषयक होनेसे) कान्तभाववती व्रजांगनाओंके लिये वह अत्युत्तम हो गया। अस्थि-मांसादियुक्त शरीरादि विषयकी अपवित्रतासे काम बुरा, बहुत बुरा, पर श्रीश्यामसुन्दर मदनमोहनके सम्बन्धसे वह भूषण बन जाता है। इसलिये जिघांसा बुरी—जो प्रभु पूजा, प्रेम, भक्ति करनेके योग्य हैं, उनके हननकी चेष्टा करना बुरा, पर उसके श्रीकृष्ण परमात्मविषयक होनेसे वह भी उत्तम हो गया— '....सद्गतिभवाय....।' परंतु गोपांगनाओंमें यह पूतना- भावना नहीं थी, वे अत्यन्त शुद्ध भाववती थीं, तो उनमें यह पूतनाका भाव कैसे हो गया ? इसका समाधान यही कि यह लीलासाधनार्थ