भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४० भक्तिसुधा है। भगवान्की लीलाशक्तिने जब देखा कि अब इन व्रजांगनाओंको इनका यह जीवन भार हो रहा है तो वह स्वयं ही इनकी रक्षाके लिये प्रकट हुए। वैसे श्रीश्यामसुन्दर कहीं बाहर नहीं चले गये थे, वे तो आन्तर-रमणके निमित्त व्रजांगनाओंके अन्तरमें प्रविष्ट हुए थे। जब उन्होंने देखा कि अब ये बाहर मुझे न देखकर अतिसन्तप्त हो रही हैं तो उनके आश्वासनके लिये अपनी लीलाओंको उन्होंने भेजा। 'आनन्द- वृन्दावनचम्पू' में इसपर एक गम्भीर भाव व्यक्त हुआ है। उसका आशय है कि जैसे दीपादिकी ज्योत्स्ना प्रकोष्ठके मध्यमें होनेपर वह बाहर नहीं दीखे, जैसे घनमें विद्युत् होती है, पर उसके मध्यमें होनेसे वह बाहर सदा नहीं दीखे, वैसे ही श्रीश्यामसुन्दरकी स्थिति यहाँ है। एक बात और भी कि यदि ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो कि विद्युत्की ज्योत्स्नासे प्रकाशमान गौरवर्ण घनमें श्याम घन छिप जाय, विद्युत्के प्रकाशातिशयसे उसके होनेपर भी वह न दीखे। यदि ऐसी स्थिति कदाचित् बन सके तो श्रीश्यामसुन्दरके अन्तर्हित भावका वर्णन हो सकता है। ऐसे स्थलोंमें 'अभूतोपमा' होती है, जैसा कि श्रीमद्भगवद्गीता (११।१२)-में है— दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता । यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥ ऐसा हो तब अन्तर्हितताकी उपमा बने। कल्पना कीजिये—एक प्रेमानन्द परिपूर्णहित सरोवर है, उसमें सुवर्णवर्णा कमलिनी खिली है, उनमें मिलिन्द छिपा है। इनके मध्यमें एक कमलनाल है, जिसमें सुवर्णवर्णा कमलिनी और श्यामवर्ण कमल दोनों खिले हैं, जैसे अकस्मात् वे तरुण कमल- कमलिनी अन्य सुवर्णवर्णा कमलिनियोंसे हटकर भीतर छिप जायँ, ऐसे ही श्रीराधा-कृष्ण उस समय योगमायासे अन्तर्हित हुए हैं, गोपांगनाओंसे अलग नहीं हुए हैं। जैसे मनोहर अमृतवर्षी घन विद्युत्से अलग न हो, वैसे ही यहाँकी परिस्थिति है। उन व्रजदेवियोंके संवित्में, ज्ञानमें, चित्तमें श्रीकृष्णतत्त्व और श्रीकृष्णतत्त्वमें उनका चित्त, ज्ञान, संवित् सब ओत-प्रोत हैं, दोनों एकमेक हो रहे हैं। इस परिस्थितिमें लीलानुकरण आरम्भ हुआ है— 'लीला भगवतस्तास्ता ह्यानुचक्रुस्तदात्मिकाः ॥' (श्रीमद्भा० १०।३०।१४) पूर्णतम पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णको ढूँढ़ते- ढूँढ़ते व्रजदेवियाँ बेहाल हो गयीं। तरु, लता, पशु, पक्षी—सभीसे उन्होंने पूछा, पर कहीं भी उनकी पृच्छा पूर्ण नहीं हुई, इससे और भी अधिक व्यग्र हो उठीं। उस समय उनका श्रीकृष्ण-प्रेमोन्माद, श्रीकृष्ण-विरह पूर्ण परिपाक-अवस्थाको प्राप्त हो चुका था। तब उनमें कुछ धैर्य रखनेवाली हितैषिणी व्रजांगनाओंने अपनी सखियोंके साथ अपनेको अति आतुर देखकर सोचा—अब कोई चित्त-सान्त्वनाका और उपाय होना चाहिये, नहीं तो प्रेमकी अन्तिम दशा आ जायगी, हम सबका जीवन ही न रह सकेगा। यह वियोगजन्य तीव्रतापसे अतिसन्तप्तता न जाने क्या करा दे। अतः प्राणधन श्रीश्यामसुन्दरकी मधुर लीलाओंका अनुकरण करना चाहिये। सम्भव है, उनके श्रवण, मनन और दर्शनसे हमलोगोंको कुछ शान्ति मिले अथवा भगवल्लीलाशक्ति ही उनकी विह्वलता देखकर अनुकम्पासे स्वयं प्रकट हुई; क्योंकि लीलाके साथ ही श्रीकृष्ण परमात्मा पहले उनमें अन्तर्हित थे। अतः अन्तर्निविष्ट श्रीकृष्ण परमात्माने ही व्रजदेवियोंकी सान्त्वनाके लिये लीलाओंका प्राकट्य किया अर्थात् गोपांगनाओंको अब स्वलीलामय बनाकर उन्होंने प्रकट किया। अतः उन्मत्तवचना गोपांगनाओंने अब भगवान्की उन-उन लीलाओंका अनुकरण आरम्भ किया— इत्युन्मत्तवचोगोप्यः कृष्णान्वेषणकातराः । लीला भगवतस्तास्ता ह्यानुचक्रुस्तदात्मिकाः ॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।१४) गोपांगनाओंके इस 'उन्मत्तवचः' विशेषणसे यह अभिप्राय नहीं है कि जैसे लोकमें पागलोंकी बात या क्रिया उपहास्य और उपेक्षणीय होती है, वैसे इनकी भी ये बातें अथवा प्रस्तुत भगवल्लीलानुकरण उपेक्षणीय हैं। प्रत्युत इनके इस उन्मत्तवचस्त्वपर कोटि-कोटि सावधानोंके वचन न्योछावर कर दिये जाते हैं। ऐसा उन्मत्तवचस्त्व किसी परमसुकृतीको ही मिल सकता है। अतः 'उन्मत्तवचः' का अर्थ है—