भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरामपंचाध्यायी ४३१ योगीन्द्रदुर्गमगतिर्मधुसूदनोऽपि तस्यै नमोऽस्तु वृषभानुभुवोदिशेऽपि॥ अर्थात् श्रीवृषभानुनन्दिनीके वसनांचल खेलसे समुत्पन्न, अतएव अपनेको परमधन्य समझनेवाला वायु भी जब कभी श्रीनन्दनन्दनके स्पर्शका विषय होता है तो वे उतनेमात्रसे भी अपनेको परम कृतार्थ मानते हैं, यह स्थिति उन मधुसूदनभगवान्की है, जिनकी प्राप्तिके लिये बड़े-बड़े योगीन्द्र-मुनीन्द्र तरसते रहते हैं। वह तो दिशा भी वन्दनीय है, जहाँ श्रीवृषभानुभूपतनयाका चरण-संचार होता है। तात्पर्य यह है कि उन श्रीवृषभानुनन्दिनीके संग परम उमंगमें श्रीश्यामसुन्दर इधरसे निकले हैं, इन लताओंने उन्हें देखा है, श्रीराधाकृष्णका सम्मिलन इनके सामने हुआ है, इसीसे ये रोमांचित हो रही हैं, ये उनकी परम अन्तरंगा हैं, इन्हींसे पूछो— पृच्छतेमा लता बाहूनप्याश्लिष्टा वनस्पतेः। नूनं तत्करजस्पृष्टा बिभ्रत्युत्पुलकान्यहो ॥ इत्युन्मत्तवचोगोप्यः कृष्णान्वेषणकातराः। लीला भगवतस्तास्ता ह्यनुचक्रुस्तदात्मिकाः॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।१३-१४) यों पागलोंकी तरह गोपबालाएँ पूछती फिरती हैं—कारण्डव, भ्रमर, लता, तुलसी, वृक्षोंसे। यह प्रेमकी परिस्थिति है। जो वस्तुतः व्यग्र हैं, उन्हें किसीसे भी पूछनेमें संकोच नहीं। 'तस्यै नमोऽस्तु वृषभानुभुवोदिशेऽपि ॥' फिर उधरसे बयार (वायु) भी आये तो उसे प्रणाम क्यों नहीं? वह तो बरसानेका बयार है, बड़ा प्रिय है। यों उन्मत्त हैं, किसीसे भी बोलने लगती हैं, कुछ भी बोलने लगती हैं। 'उन्मत्तवचः' का यह भी अर्थ है कि 'उत्कृष्टा- नाम्=योगीन्द्रमुनीन्द्राणामपि, मोहो यस्माद् वचसः' अर्थात् जिन व्रजांगनाओंकी बात सुनकर बड़े-बड़े योगियोंको भी भ्रम, मोह उत्पन्न हो जाय, जिनके वचनोंसे वे गोपियाँ अथवा 'उत्कृष्टस्य पूर्णतम- पुरुषोत्तमस्य श्रीकृष्णस्य सर्वज्ञस्यापि मोहो यस्माद् वचसः' अर्थात् श्रीकृष्ण भी जिनकी, गम्भीर, ऊँचे भावकी वाणीको सुनकर विस्मित हो जाते हैं। अहो गोपियो! धन्य है तुम्हारा प्रेम-बन्धन, कितना ऊँचा है तुम्हारा भाव! रात्रिका समय, श्रीश्यामसुन्दरका मुरलीके द्वारा आह्वान ! उस समयके आनन्दको पाकर उसे ही अब ये ढूँढ़ती फिरती हैं। इनके वचनोंका स्पष्ट अर्थ तो श्रीकृष्ण परमात्माको ही लगा है। इनके सामने उस सर्वज्ञकी सर्वज्ञता भुला गयी। 'गोप्यः गाः=वाचः भगवद्गुणगानेन पान्तीति गोप्यः' अपने प्रिया-प्रियतम श्रीराधाकृष्णके गुणगानसे वाणीका पालन-रक्षण करनेवाली ये गोपियाँ हैं। इसके अतिरिक्त अन्य वाणी तो वन्ध्या है— '····वन्ध्यां गिरं तां बिभृयान्न धीरः ॥' (श्रीमद्भा० ११।११।२०) व्रजांगनाओंने इसका पूर्ण पालन किया। वे श्रीश्यामसुन्दर प्राणधनके अन्वेषणमें व्यग्र हैं, उन्मत्त हैं। गोपांगनाओंद्वारा श्यामसुन्दरकी मधुर लीलाओंका अनुकरण गोपियोंने सबसे पूछा, पर किसीने भी उन्हें समुचित उत्तर नहीं दिया, उन्हें पागल जानकर उनकी ठिठोली की। हताश उन्होंने भगवल्लीलाका आश्रय लिया—'लीला भगवतस्तास्ता ह्यनुचक्रुस्तदा- त्मिकाः ॥'* वे '····पूतनासुपयः पानम्····' (श्रीमद्भा० १२।१२।२८) आदि लीलाओंका अनुकरण करने लगीं। व्रजांगना पहले ही सन्तप्त हैं, फिर भगवल्लीला- नुकरणरूप घृतसंयोगसे वाडवाग्निके जैसा उनका विरहानल और भी अधिक उद्दीप्त हुआ होगा। वैसी परिस्थितिमें तो वे जीवित भी कैसे रह सकेंगी? इसलिये कहा है—'तदात्मिकाः' ('स कृष्णः आत्मनि यासां ताः') अर्थात् श्रीश्यामसुन्दरके वाचक 'कृष्ण' नामके 'क' में, जो सुशीतल अमृतवर्ण है, उनका चित्त आसक्त था, उसीने उनकी रक्षाकर भस्म हो जानेसे बचा लिया। अथवा 'तदात्मिकाः' पदसे लीलाका ही परिग्रह
- इत्युन्मत्तवचोगोप्यः कृष्णान्वेषणकातराः। लीला भगवतस्तास्ता ह्यनुचक्रुस्तदात्मिकाः ॥ परीक्षित् ! इस प्रकार मतवाली गोपियाँ प्रलाप करती हुई भगवान् श्रीकृष्णको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते कातर हो रही थीं। अब और भी गाढ़ आवेश हो जानेके कारण वे भगवन्मय होकर भगवान्की विभिन्न लीलाओंका अनुकरण करने लगीं। (श्रीमद्भा० १०।३०।१४)