भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 448

४३८ भक्तिसुधा कर लेते हैं; क्योंकि सर्वरसोपमर्दी श्रीराधाकृष्णके दिव्य दर्शन, रसपानसे वे सर्वदा छके रहते हैं। ब्रह्मास्वादपरायण योगीन्द्र-मुनीन्द्रोंकी भी यही स्थिति होती है। वे लटे तन, फटे कपड़े रखते हुए भी परमैश्वर्यसम्पन्न सम्राट्दुर्लभ प्रसन्नतामें मग्न रहते हैं। श्रीराधाकृष्ण-तत्त्वकी ब्रह्मतामें यह भी एक प्रमाण है। जिसके कारण उनको वह ऊँची प्रसन्नता है, वह तत्त्व श्रीराधाकृष्ण ही है। ऐसे पुरुषोंको बाहरके दुःखोंकी, सुखोंकी कुछ परवाह ही नहीं होती। ये लता उसी स्थितिमें हैं, लौकिक पति—वनस्पतियोंके अंकमें रहकर भी उनको उसका कोई लौकिक सौख्य या उसके अभावमें दुःख नहीं है, वे तो श्रीश्यामसुन्दरके करस्पर्शानन्द-समुद्रमें मग्न हैं। अतः उन्हींसे पूछती हैं—‘पृच्छतेमा लता''''।’ श्रीयुगलबिहारीकी प्रेष्ठसखीरूपा व्रजांगनाओंको तो उन लताओंका दर्शन करके ही आश्वासन और एक प्रसन्नता मिली। कारण, वे जानती हैं कि वे लता विशुद्ध सख्यभाववती हैं। यही समझकर उन्होंने उनसे प्रश्न भी किया। इन व्रजांगनाओंके मनमें लताओंकी उस स्थितिसे यह भाव उत्पन्न हुआ कि 'सुवर्णयूथिका लताएँ श्रीयुगलबिहारीकी लीलासे प्रेरित होकर उस भावको हमें इंगित करनेके लिये ही मानो तरुण तमालके साथ समालिंगित हुई हैं। अतएव 'तत्करजस्पृष्टाः' ( 'तयोः करजैः स्पृष्टा') हैं। दोनोंने एक-दूसरेका श्रृंगार करनेके लिये अर्थात् श्रीवृषभानुकिशोरीने प्यारे श्रीश्यामसुन्दरके अपने- जैसे स्त्रीवेशकी रचनाके लिये और श्रीनन्दसूनूने श्रीगौरसुन्दरीके अपने जैसे पुरुष वेशकी रचनाके लिये लताओंसे सुमन-स्तवक और सुमनोंका चयन किया है। उन्हींके संस्पर्शसे इनमें यह पुलकभाव है।' इन सखियोंकी स्थिति बहुत ऊँची है, ये श्रीयुगलबिहारीकी उपासना सख्यभावसे करती हैं। जो सुख इन परमप्रेष्ठ सखियोंको प्राप्त है, उसके लिये श्रीबिहारीलाल भी लालायित रहते हैं। वे जानते हैं कि हम दोनोंके समुदित आह्लाद-आनन्दका यथावत् अनुभव इन्हींको होता है अर्थात् श्रीश्यामसुन्दरको केवल श्रीगौरसुन्दरीके और उन्हें केवल श्रीश्यामसुन्दरके प्रणय-सौख्यका अनुभव होता है, परंतु ये सखियाँ दोनोंके विभिन्न और समुदित लोकोत्तर स्नेहसौख्यको प्राप्त करती हैं। लता पतिस्थानीय वनस्पतियोंसे समाश्लिष्ट रहकर भी श्रीश्यामसुन्दरके मुखदर्शनसे मुग्ध हैं, उनपर फूल बिखेरती हैं। लताओंकी कौन कहे, देवांगनाएँ जो सौन्दर्यकी सीमा गिनी जाती हैं, अपने परम विदग्ध पतिदेवोंके अंकमें विराजमान होकर भी गँवारे ग्वालबालोंसे श्रृंगारित श्रीनन्दनन्दनके मयूरचन्द्रिकाचित, वन्य कुसुमकल्पित कुण्डलाद्यलंकृत आननपर सकृद्दर्शनसे ही सदाके लिये बलिहार हो जाती हैं, उनकी नीवी शिथिल पड़ जाती हैं, अकस्मात् उत्पन्न रोमांचकी तीव्रतासे उनके केशपाश विशीर्ण हो जाते हैं और उनमें ग्रथित शत-शत कुसुमगुच्छ युगपत् विकीर्ण हो जाते हैं। दूसरी ओर श्रीवृषभानुनन्दिनीका वह सौन्दर्य- माधुर्य है, जिसकी कमनीयता, लोकोत्तरतापर पूर्णतम पुरुषोत्तम परब्रह्म श्रीकृष्णभगवान्ने अपनेको न्योछावर कर दिया। साधारण व्रजरमणी लक्ष्मी हैं, गोपीजन लक्ष्मीतम हैं। अतिशयमें तमप् है। उनकी भी सिरमौर श्रीचन्द्रावली हैं, ये अनन्तानन्त गोपीयूथकी प्रभु हैं। श्रीश्यामसुन्दरका अभिसार दो ही स्थानपर होता था—या तो श्रीवृषभानुनन्दिनीके यहाँ या चन्द्रावलीके यहाँ। उन श्रीचन्द्रावलीके दिव्यप्रासादमें श्रीकृष्ण एक बार पधारे। रसरीतिके अनुसार परिरम्भबद्ध होकर वे श्रीचन्द्रावलीके अंकमें विराज रहे थे। पर श्रीवृषभानु-नन्दिनीका अनुस्मरण होते ही श्रीचन्द्रावलीके सौन्दर्य, लावण्य, प्रणयपाश उन्हें भूल गये, श्रीराधोद्देश्यक कम्प, हर्ष, रोमांचादि होने लगा और वे 'श्रीराधे श्रीराधे' बरबस कहने लग पड़े। यह इनकी वही स्थिति हुई जो देवांगनाओंकी अपने पतिदेवोंके अंकमें स्थित रहते भी श्रीकृष्णदर्शनसे हुई थी। वे श्रीचन्द्रावलीकी गोदमें श्रीराधाके लिये विह्वल हो गये; जो माधुर्यामृतसिन्धुकी लहर श्रीराधांकमें विराजमान होकर उठती थी, उसके लिये वे लालायित हो गये। यस्याः कदापि वसनाञ्चलखेलनोत्थ- धन्यातिधन्यपवनेन कृतार्थमानी।