भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासपंचाध्यायी ४३७ समय उसमें रसान्तरका आवेश असम्भव है। यदि किसी दूसरे रसका आवेश हो सकता है तो केवल श्रीकृष्णरसका ही। यह दिव्यातिदिव्य विशुद्ध रस है। अतएव अन्यत्र कहा गया है—विभिन्न लोक-रसों (रागों)-में विरसता अति कठिनतासे होती है। उत्कृष्ट वैराग्य यदि कोई है तो यही श्रीकृष्णरस है। यह कोटिशः प्रयत्न करनेपर भी मिलता नहीं। संसारके राग शब्द, स्पर्श आदि ऐसे हैं, जो छूटते ही नहीं। परंतु उनके बीच यदि यह श्रीकृष्ण-राग समाविष्ट हो जाय तो सब छूट जाते हैं। गोस्वामीजीका वचन है— ‘रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी॥’ (रा०च०मा० २।३२४।८) यह विश्वविलास, साम्राज्य आदि सब रमाविलास है, इसमें सच्ची विरसता-वैराग्य होना कठिन है। पर इसमें कहीं श्रीकृष्णरस समाविष्ट हो जाय तो वे समस्त लोकरस (राग) तुरंत फीके पड़ जायँ। यही सच्चा वैराग्य है। श्रीरासपंचाध्यायीके पठन, श्रवण एवं मननका फल—हृद्रोग—कामका सर्वथा विनाश रासपंचाध्यायीके श्रवण, पठन, मननका यही फल है कि जगरस विरस हो जायँ। यह परमहंसोंकी संहिता है। इसे अन्य श्रोता भी श्रद्धासे सुने तो उसे परमहंसोंकी ही तरह जगसे विराग हो जाय। इसके अन्तमें फलश्रुति है— विक्रीडितं व्रजवधूर्भिरिदं च विष्णोः श्रद्धान्वितोऽनुशृणुयादथ वर्णयेद् यः। भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामं हृद्रोगमाश्वपहिनोत्यचिरेण धीरः॥ (श्रीमद्भा० १०।३३।४०) जो इस रासलीलाको श्रद्धासे सुनते हैं, पढ़ते हैं, कणभर भी यदि इसका रस उन्हें मिल गया तो उनका हृद्रोग—काम, जो सबसे अधिक पापी है, अवश्य मिट जायगा। भगवल्लीलानुसन्धानमें यही महाबाधक है, जरा-सा भी काम होनेसे यहाँ काम न चलेगा। सिंहिनीके दूधकी तरह बिगड़ जायगा। इस कामका नाश इसके सुननेसे होता है, पर श्रोताको धीर होना चाहिये। फिर तो कामबाधानिवृत्तिकी पराकाष्ठा हो जायगी। देखो, ये लताएँ अपने पतियोंके अंकमें हैं, फिर भी श्रीश्यामसुन्दरके नखस्पर्शसे इनका हृदयकमल खिल रहा है, आनन्दाश्रु रुक नहीं रहे हैं। इस दशामें भी यह प्रेम है। किसी योगीसे कोई सुन्दरी लिपटी हो, उस समय भी यदि वह श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्द पूर्णतम पुरुषोत्तमकी लीलाका, उनके चन्द्रशत-तिरस्कारी मुखचन्द्रका ध्यान कर रहा है तो वह सुन्दरी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। जैसे बड़े-बड़े जापक हों परंतु कामिनी-दर्शन, ध्यानसे उनका चित्त विकल हो जायगा, किंतु श्रीश्याममूर्तिकी वह परम रमणीय आभा जब हृदयमन्दिरमें विराज जायगी, अनुभवमें आ जायगी तो वे कामिनीकी गोदमें रहकर भी निर्विकार ही रहेंगे। यही भाव लताओंके सम्बन्धमें है। वे चाहे पति—वनस्पतियोंसे लिपटी हैं, पर उनके मनमें तो वह श्रीमोहनमूर्ति बसी है। यही व्रजदेवियोंका आशय है, इसीलिये उनसे पूछती हैं—‘पृच्छतेमा लता।’ स्त्रीमें काम शतगुणित है, पर देखो, इन लताओंको कामोद्रेक नहीं। ये पति-अंकमें रहकर भी श्रीश्यामसुन्दरके नखस्पर्शसे उत्पन्न आनन्दका अनुभव कर रही हैं, यह इनका प्रफुल्ल भाव ही इसका पोषण कर रहा है। ये ऊँची कृष्णप्रणयिनी हैं। इनसे पूछो, ये बतायेंगी—‘पृच्छतेमा लता…।’ श्रीश्यामरसका आस्वादन होते ही अन्य रस नीरस हो जाते हैं इससे स्पष्ट है कि यह श्रीकृष्णरस सर्वरसोपमर्दी है। सब रस सड़ जाते हैं—नीरस हो जाते हैं, परंतु यह सदा नवनवायमान, उत्तरोत्तर वृद्धयभिमुख रहता है। तभी तो श्रीव्रजदेवियोंके लिये अथवा वैसे भावुक जनके लिये—जब वे श्रीश्यामरसका आस्वादन करने लगते हैं, उनके लिये समस्त विषय-रस नीरस हो जाते हैं। यही श्रीकृष्णरसोपासकोंकी कसौटी है। सूर्यके सामने चन्द्रादि फीके पड़ जाते हैं। अतएव उनका ऊपरका जीवन सर्वदा रूखा, बनावटी मण्डनसे दूर होता है। वे उन रूखे-सूखे टुकड़ोंसे भी उदरज्वाला शान्त कर देते हैं, जिन्हें शायद कुत्ते भी न खायें। ये फटे चिथड़ों, मृत्पात्रोंसे ही जीवन-निर्वाह