भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदें। भोले या जड़ वृक्ष उनकी इस चतुराईको क्या जानें, उसे तो हम समझती हैं। अतएव वे प्रियाके कन्धेपर हाथ रखकर इस ओर निकल आये, उन्हें किसीके प्रणाम और अभिनन्दनसे प्रयोजन ही क्या— ‘बाहुं प्रियांस····?’ यह एक और ढंगसे वृक्षोंके निरभिनन्दन पक्षका समर्थन हुआ।' जब व्रज-बालाएँ अपनेमें दोष और श्रीश्याम- सुन्दरमें गुणानुसन्धान करती हैं, तब सोचती हैं कि श्रीश्यामसुन्दरने अवश्य वृक्षोंका अभिनन्दन किया होगा; क्योंकि वे बड़े सरल, उदार और कृपालु हैं। तभी तो यह उन्मदान्ध तुलसिकालिकुल भी उनका अनुसरण कर रहा है। तब तो हम मानवतियोंको भी क्यों न ऐसा करना चाहिये ? परंतु दोष-दृष्टिके आते ही व्रजांगनाओंका विचार तुरंत बदल जाता है। वे सोचती हैं—तुलसीका क्या, वह तो मदान्धोंसे अन्वीयमान है, कोई इज्जतदार उसका कैसे अनुगमन कर सकता है ? यदि गोपांगनाओंसे कहें कि तुम इतनी विह्वल क्यों हो रही हो, इन भ्रमरोंके पीछे-पीछे चली जाओ, तुम्हें तुम्हारे प्राणाधार मिल जायँगे—तो गोपांगनाओंका इसपर उत्तर होगा—हम ऐसा कभी न करेंगी; क्योंकि ये भौंर तो हमारी सौत तुलसीके पक्षपाती हैं, प्रमुख हैं, इनसे हमें कभी अपने कार्यमें सफलता न मिलेगी, भला मतवालोंका अनुसरण करके किसने श्रीश्यामसुन्दरको प्राप्त किया है ? गोपी जब तरुओंको स्तब्ध देखती हैं तो कहती हैं—'ये श्रीमन्मोहनसे अभिनन्दित नहीं हुए, इसलिये अथवा पुरुष हैं—कठोर हैं, इसलिये हमें इनसे कोई आशा न रखनी चाहिये। अतः चलो, सखियो, इन लताओंसे पूछेंगी।' विशेष भाव यह है कि यहाँ भी मधुर-विहारका वर्णन है। सुरतान्तश्रमशिथिल दोनों श्रीप्रिया-प्रियतम निकुंजान्तरकी ओर जा रहे हैं। गलबॉही किये श्रीयुगल-सरकार एक-दूसरेको निहारते हुए मन्दगतिसे पादन्यास कर रहे हैं। निर्मल-निष्कलंक अनन्तानन्त- तारापति-पाथोधि-निर्मन्थन-समुद्भूत श्रीश्यामसुन्दरके मुखचन्द्रको, जिसपर कोटि-कोटि चन्द्र न्योछावर हो रहे हैं और जो मकराकार कुण्डलोंसे देदीप्यमान हो रहा है, श्रीप्रियाजी अतृप्त नेत्रोंसे निहार रही हैं। यही दशा श्रीव्रजकिशोरकी है। फिर प्रथम मिलनमें सम्पन्न दन्तक्षत, नेत्रांजन आदिको मन्दस्मितपूर्वक देखते हुए नित्य निकुंजमें पधारते हैं। इस रहस्यको जाननेवाली वे लता श्रीलाड़िली-लालके इस मधुर मिलनका संकेत प्रेष्ठ सखीको दे रही हैं। वे लता अन्तश्चेतन, किंतु बाह्य जड़ हैं। श्रीयुगलमूर्तिके मुखमण्डल इतने प्रभापुंजपूर्ण हैं, ऐसे देदीप्यमान हैं कि बड़ों-बड़ोंके नेत्र वहाँ नहीं ठहर पाते। इन्हीं सबका संकेत लताओंने प्रेष्ठ सखीको किया। अतएव व्रजांगना आपसमें मन्त्रणा करती हैं—सखियो, इन लताओंसे पूछो— पृच्छतेमा लता बाहूनप्याश्लिष्टा वनस्पतेः। नूनं तत्करजस्पृष्टा बिभ्रत्युत्पुलकान्यहो॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।१३) ये सुवर्ण-यूथिका लताएँ अपने मुकुलित पुष्पविकाससे श्रीराधा-कृष्णके मधुर मिलनका अनुभव और हमें संकेत कर रही हैं। इसीसे ये ‘नूनं तत्करजस्पृष्टाः’ हैं और तभी इनमें मधुधारा आदि दीख पड़ रही हैं। केवल श्रीव्रजाधिपने ही नहीं, अपितु श्रीव्रजेश्वरीने भी, दोनोंहीने अपने वेश-विशेषकी रचनाके लिये इनसे पुष्प लिये हैं। तभी तो अपने पति तरुओंसे श्लिष्ट होकर भी ये विशेष पुलकित हैं। यह प्राकृत पतिके मिलनकी पुलकावली नहीं। यह मधुधारा, अश्रुधारा आदि तो उस परब्रह्म पूर्णतम-पुरुषोत्तम श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्दके संस्पर्शसे ही सम्भव है। उसी सम्मिलनका यह सुवर्ण-यूथिका लता हमें संकेत कर रही हैं, आओ सखियो, उन्हींसे पूछें। श्रीव्रजदेवियाँ प्राणप्यारे श्यामसुन्दरको ढूँढ़तीं, विभिन्न तरुओंसे पूछतीं, अन्तमें कहती हैं—‘इन लताओंसे पूछो, ये अपने पति वनस्पतियोंका आलिंगन किये रहनेपर भी पुलकित हो रही हैं। इनमें यह उत्पुलकितता प्रिय श्रीश्यामसुन्दरके दर्शनसे ही उत्पन्न है।’ यह महानुभाव है। सर्वरसोपमर्दी श्रीकृष्ण हैं, नहीं तो रसान्तराविष्टमें रसान्तरावेश नहीं बनता। कोई भी प्राकृत कामिनी अपने कान्तके परिरम्भमें स्थित रहकर ही रसान्तरका अनुभव नहीं कर सकती। उस