भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३० भक्तिसुधा हैं, अपितु ये सब सखियाँ भी सेवामें उपस्थित हैं। फिर भी स्वयं श्रीलालजी ही श्रीजीकी भ्रमर- निवारणादि सेवामें रत हैं. ऐसा क्यों ? इसका कारण यह है कि अलिकुलसहित वृन्दादेवी आदि श्रीप्रियाप्रियतमके प्रेमोन्मादमें स्वयं उन्मदान्ध हैं। जैसे प्रिया-प्रियतम परस्परके अपूर्व अनुरागरससिन्धुमें मग्न हैं, वैसे ही इनकी इस मधुर स्थितिके अवलोकनसे सखी-समूहसहित श्रीतुलसी आदि भी प्रिया-प्रियतमके अनुरागरससिन्धुमें निमग्न हैं। गोपांगनाएँ पूछती हैं- 'तरुओ! क्या इसी अवसरपर आपलोगोंको भी उनके दर्शनका सौभाग्य प्राप्त हुआ है और उस प्रेममग्न अवस्थामें ही क्या आपलोग भी निस्तब्ध खड़े हैं?' इस 'बाहुं प्रियांस' पर कई महानुभावोंके कुछ और भी भाव हैं। उनके भावानुसार प्रिया-प्रियतमकी यह सुरतान्त स्थिति है। 'प्रियांसे' यह सामीप्यमें सप्तमी है। श्रीलालजी अत्यन्त सुकुमारी श्रीप्राणेश्वरीके शैथिल्यको सँभालनेके लिये अपने बाहुसे उनके बाहु-अंसको सहारा देते हुए चल रहे हैं तथा श्रीजीके मुखाम्भोजमधुलोभी भ्रमरोंको, जो उनके समीप मँडरा रहे हैं, अपने दक्षिणहस्तगत नील कमलसे हटा रहे हैं। 'रामानुजः' में 'रामानुगः' की अनुसारिणी व्युत्पत्ति करके एक भाव यह भी है कि 'रामा- मनुगच्छति रमयति या सा रामा श्रीवृषभानु- नन्दिनी।' रामा अन्य गोपी भी हैं, पर श्रुतिमुनिरूपा आदि स्वयं श्रीमदनमोहनमें रमण करती हैं। अतएव 'आत्मारामोऽप्यरीरमत्' कहा गया है। यहाँ प्रेरणामें 'णिच्' प्रत्यय है। 'स्वयं रमण किया' यह इसका अर्थ नहीं, अपितु 'रमण कराया' यह अर्थ है। इसी तरह प्राणसखी, प्रेष्ठसखी, नित्यसखी आदि भी श्रीकृष्णमें तो रमण नहीं करतीं, पर युगलमूर्तिमें रमण करती हैं। इन सखियोंमें उत्तरोत्तर तत्सुख-सुखित्वका ही भाव होता है, इनकी रमणवस्तु केवल प्रिया- प्रियतमका मिलन है। परंतु श्रीकृष्ण परमात्माको रमण करानेवाली तो वही 'रामा' हैं। इन्हींके साथ रमण करनेकी उत्कण्ठामें उन 'अमनाः' ने 'मनश्चक्रे'- मनका निर्माण किया। भगवानपि ता रात्रीः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः । वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१) श्रीरासपंचाध्यायीके इस प्रथम पद्यमें 'योगमाया' का अर्थ 'श्रीवृषभानुनन्दिनी' है। 'योगाय इतरासां संयोगाय माया यस्याः सा योगमाया' यह योगमाया पदका विग्रह है। इस प्रकार श्रीकृष्ण परमात्माका सम्बन्ध अन्योंको प्राप्त करानेकी जिनके मनमें इच्छा हुई, वह योगमाया श्रीवृषभानुनन्दिनी हैं। यह उन समस्त सखियोंकी युग-युगान्तरोंकी तपस्याका, आराधनाका फल था, जिससे सन्तुष्ट होकर योगमाया श्रीवृषभानुजाके 'उप'=सामीप्यमें 'आश्रित' होकर भगवान्ने 'मन' बनाया-'रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः।' यहाँ 'चक्रे' इस क्रियामें आत्मनेपद है, जिसका फल आत्मगामी होता है। दूसरी ओर 'अरीरमत्' में परस्मैपद है, जिसका फल परगामी होता है। इससे यही ध्वनित हुआ कि श्रीकृष्ण परमात्माको रमण करानेवाली श्रीरासेश्वरी राधा हैं और इसी अपने रमणके लिये भगवान्ने 'मन' बनाया तथा इन्हीं श्रीजीकी प्रेरणासे अन्योंको उनके आनन्दके लिये रमण कराया। श्रीकृष्ण परमात्माके प्रति जैसा-जैसा उत्कृष्ट भाव व्रजांगनाओंका देखा गया है, वैसा-ही-वैसा या उससे भी अधिक श्रीजीके प्रति भगवान्का है। जैसे व्रजांगनाओंको श्रीश्यामसुन्दरके वियोगमें एक-एक क्षण कल्पके समान प्रतीत होते थे, 'त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम्' वही श्रीवृषभानु- नन्दिनीके बिना श्रीव्रजेन्द्रनन्दनका भी हाल था। व्रजांगनाएँ जब श्रीनन्दनन्दनको निहारने लगतीं, तब उनकी पलकें बलात् गिर जातीं और वे 'उच्चै- र्निरीक्ष्यमाणानां पक्ष्मनिर्माता विधाता जडः'- नेत्रोंपर पलकोंका निर्माण करनेवाले ब्रह्मा अज्ञ प्रतीत होते हैं, उन्हें इस रसका पता ही नहीं-इत्यादि रूपमें ब्रह्माजीको भरपेट कोसतीं। अटति यद् भवानह्नि काननं त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम्। कुटिलकुन्तलं श्रीमुखं च ते जड उदीक्षतां पक्ष्मकृद् दृशाम्॥ (श्रीमद्भा० १०।३१।१५) श्रीश्यामसुन्दर भी सखियोंमें बैठकर सदा यही