भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 439, कुल 778 में से

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पृष्ठ 439

श्रीरासपञ्चाध्यायी ४२९ न सतायेंगे, इसलिये इधर पधारे हैं। अस्तु, हे तरुवरो! जाने दो इस विवादको। इससे यह तो निर्विवाद सिद्ध हो गया कि आपने श्रीश्यामसुन्दरको यहाँ देखा है, वे प्रियाजीके साथ विहार करते इधर पधारे हैं तो हमपर इतनी कृपा करो, बतलाओ, अब वे कहाँ हैं?' कुछ महानुभावोंका कहना है कि वे यह समझती हैं कि ये वृक्ष श्रीराधा-कृष्णसे लालित- पालित हैं। वे स्वयं अपने हाथसे इनका लालन करते हैं, इससे ये रोमाञ्चवान् हैं और ये अन्तरंग भी हैं। गोपांगनाओंको इनसे श्रीश्यामा-श्यामके दर्शनोंकी सम्भावना है, अतः पूछती हैं—'क्या आपके प्रणामका अभिनन्दन करते हुए श्रीश्यामाश्याम इस ओरसे निकले हैं?' श्रीव्रजदेवियोंने पहले एक-एक वृक्ष, लता, पशु, पक्षियोंसे श्रीश्यामसुन्दरकी स्थिति पूछी। अन्तमें उन्होंने समस्त तरुओंसे एक साथ पूछा। वे तरु सुमनफलभारसे विनम्र हो रहे थे, भूमिका स्पर्श कर रहे थे, उनकी शाखा-उपशाखाएँ झुकी हुई थीं। तरुओंकी उस मुद्रासे गोपांगनाओंने निश्चय किया कि वे श्रीनन्दनन्दनको उपहारसहित प्रणाम कर रहे हैं। साथ ही उनके मनमें इस कल्पनाने भी स्थान पाया कि श्रीमोहन यहीं हैं, कहीं गये नहीं; क्योंकि ये तरुवर प्रणामार्थ अभी झुके ही हुए हैं और श्रीप्रभुने अभी इनके प्रणामका उत्तर नहीं दिया, इनका अभी अभिनन्दन नहीं किया, अतएव ये झुके ही हैं। व्रजदेवियाँ इस स्थितिमें उनसे प्रश्न करती हैं— बाहुं प्रियांस उपधाय गृहीतपद्मो रामानुजस्तुलसिकालिकुलैर्मदान्धैः। अन्वीयमान इह वस्तरवः प्रणामं किं वाभिनन्दति चरन् प्रणयावलोकैः॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।१२) 'हे तरुओ! वे श्रीबलरामके भैया, जिन्होंने एक हाथमें कमल धारण कर रखा है और दूसरा हाथ अपनी प्रियाके कन्धेपर रखा है तथा तुलसीकी सुगन्धिके लोभसे कितने ही मदान्ध भौंरे जिनका पीछा कर रहे हैं, क्या प्रेमपूर्वक तुम्हारी ओर देखकर उन्होंने तुम्हारे प्रणामका अभिनन्दन किया? क्या तुम्हारे फल-पुष्पके उपहारकी ओर दृष्टि भी डाली? हम तो समझती हैं नहीं, क्योंकि उन्हें अपनी प्रियाकी ललित गतिके अवलोकनसे ही अवकाश कहाँ?' (इसीके पोषणार्थ श्रीकृष्णका साक्षात् नाम न लेकर व्रजांगनाओंने 'रामानुजः' नामसे यहाँ उनका संकेत किया है) 'तरुओ! वारुणीपान करके प्रमत्त रहनेवाले दाऊजीके ये छोटे भाई हैं, वे वारुणीपानसे मत्त हैं तो ये श्रीवृषभानुनन्दिनीकी रूप-लावण्यवारुणीका पान करके प्रमत्त हैं। तरुओ! इनके पीछे जो ये मतवाले भौंरे भागे आ रहे हैं, इससे यह भी स्पष्ट हो गया कि इनके साथी भी इन्हींकी तरह प्रमत्त हैं। ऐसी दशामें तुम्हारे-जैसे साधुओंका अभिनन्दन करनेके लिये उन्हें अवकाश कहाँ? इसके अतिरिक्त वे अपनी प्राणेश्वरीके कन्धेपर अपना वाम बाहु स्थापितकर अर्थात् उसे ही उपधान बनाकर दक्षिण हस्तगत नील कमलसे उन भौंरोंको हटा रहे हैं, जो श्रीराधामुखाम्भोज- माधुर्यके महालोभसे चारों ओर मँडरा रहे हैं। इस प्रकार वे अपनी प्राणेश्वरीकी सेवामें तत्पर हैं। उन्हें तुम्हारे प्रणामको देखनेका अवकाश ही नहीं है।' जैसे 'एणपत्नी' के प्रति परमप्रेष्ठ सखीकी उक्ति थी, उसी तरह यह भी उक्ति है। नित्यनिकुञ्जेश्वरी श्रीजीकी प्रेष्ठ सखियों और श्रुतिरूपा आदि सखियोंका भी इसमें ग्रहण है। ऐसी परिस्थितिमें वहाँ श्रीयुगलकिशोर ही अकेले नहीं हैं, किंतु ये सब दर्शन हुआ है। अतएव पूछती हैं—'हे तरुओ! तुम्हारे इस सोपहार प्रणामको, जो तुम इतनी देरसे कर रहे हो, क्या उन्होंने देखा और उसका अभिनन्दन किया? तरु यदि यह कहें कि 'सखियो! क्यों न वे हमारे प्रणामका अभिनन्दन करेंगे?' तो इसपर व्रजांगनाओंका कहना है कि 'इसीलिये कि वे अपनी श्रीप्राणेश्वरीकी सेवामें संलग्न हैं।' यहाँ 'तुलसिका' पद वृन्दादेवीका बोधक है और 'आली' से उनकी सखियोंका ग्रहण है। इसके अतिरिक्त नित्यनिकुञ्जेश्वरी श्रीजीकी प्रेष्ठ सखियों और श्रुतिरूपा आदि सखियोंका भी इसमें ग्रहण है। ऐसी परिस्थितिमें वहाँ श्रीयुगलकिशोर ही अकेले नहीं

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