भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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४२८ | भक्तिसुधा

रूपमें ये तुम्हारे आनन्दाश्रु बह रहे हैं। उनका पता देकर जरा हमें भी अपने आनन्दमें सम्मिलित करो।' गोपांगनाओंका मनमोहनके स्वरूपका वर्णन करके वृक्षोंसे प्रश्न करना बाहुं प्रियांस उपधाय गृहीतपद्मो रामानुजस्तुलसिकालिकुलैर्मदान्धैः। अन्वीयमान इव वस्तरवः प्रणामं किं वाभिनन्दति चरन् प्रणयावलोकैः॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।१२) व्रजांगनाओंका यहाँ बहुतोंसे प्रश्न है—'हे वृक्षो! क्या इस ओर मोहन पधारे हैं, तुमने उन्हें देखा है?' वे किस रूपमें इधर आये होंगे, इसपर कहती हैं—'अपना एक बाहु प्रियाके स्कन्धमें उपधान (तकिया)-के समान रखकर दूसरेमें कमलका पुष्प लिये इधर आये हैं अर्थात् वामांगमें श्रीवृषभानुनन्दिनी हैं, अतः वाम बाहुको उनके स्कन्धपर स्थापित किया है और दक्षिण हस्तमें नीलकमल ग्रहण कर रखा है। अपने कम्बुकण्ठमें उन्होंने तुलसीकी माला पहन रखी है। उसके मधुलोभसे मदान्ध भ्रमरवृन्द उन्हें घेरे हुए हैं। उनको हटानेके लिये ही उन्होंने हाथमें कमल ले रखा है अथवा तुलसीकी माला श्रीवृषभानुनन्दिनीने धारण कर रखी है, उसके पीछे भ्रमर दौड़े आ रहे हैं, उनको हटानेके लिये ही मानो श्रीनन्दनन्दनने कमल ग्रहण किया है। इस रूपमें वे इधर पधारे हैं। हे वृक्षो! क्या अपनी झुकी शाखाओंसे किये गये आपके प्रणामका अपने प्रेमावलोकनसे उन्होंने अभिनन्दन किया है?' व्रजांगनाएँ मानो देख रही हैं—वृक्ष अपने फूल, फल, पल्लवोंसे भूमिका स्पर्श कर रहे हैं— अहो अमी देववरामरार्चितं पादाम्बुजं ते सुमनःफलार्हणम्। नमन्त्युपादाय शिखाभिरात्मन- स्तमोऽपहत्यै तरुजन्म यत्कृतम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१५।५) यह देखकर व्रजांगनाओंने कहा—'ये इसी अपने फूल-फलादिके उपहारको लेकर पल्लवों, उपशाखाओंसे श्रीकृष्ण परमात्माका अभिनन्दन कर रहे हैं, उनके पादरजको लेनेके लिये झुककर भूमिका स्पर्श कर रहे हैं।' व्रजांगनाएँ सोचती हैं—'ये प्रणाम कर रहे हैं। यदि प्रभुने इनका अभिनन्दन किया होता तो ये उठते, पर ये उठ नहीं रहे हैं, अपनी शाखाओंसे वैसे ही झुके हुए हैं, अतः मालूम होता है कि वे मुरलीमनोहर यहीं कहीं हैं। वे इनका जबतक अभिनन्दन नहीं करेंगे, तबतक ये ऐसे ही रहेंगे।' व्रजांगनाएँ कहती हैं—'परंतु हे तरुओ! क्या वे तुम्हारा अभिनन्दन कर रहे हैं? 'किं वाभिनन्दति' बात यह है कि उन्हें तुम्हारे प्रणामके उत्तर देनेका— कृपा करनेका अवकाश ही नहीं; क्योंकि वे कान्ताके संगमें पड़े हैं, उनकी तुम-सरीखे साधुओंपर दृष्टि ही कहाँ? वे तो कुन्दमालाके गन्धमें रमे हैं।' यदि वृक्ष कहें कि 'नहीं, इस ओर तो वे सदा आते हैं और हमारा अभिनन्दन करते हैं, फिर तुम ऐसा प्रश्न क्यों करती हो?' इसपर व्रजांगनाएँ कहती हैं—'तुम तो साधु हो, भोले हो और वे रामानुज हैं— ('रामस्य वारुणीपानमत्तस्य अनुजः') वारुणीका पान करके मतवाले रहनेवाले बलरामके छोटे भाई हैं। उनके साथी भी मत्त ही हैं—वे हैं तुलसीके मकरन्दपानसे मत्त हुए भौंरे। जो मत्तोंके अनुज हैं और जिनके साथीतक मत्त हैं, वे तुम-जैसे साधुओंके प्रणामका उत्तर दें, यह असम्भव है। फिर वे सम्भोगशृंगारवशात्, शैथिल्यात् प्रियाके स्कन्धपर हाथ धरकर, मुख-से- मुख मिलाकर चलते हैं, इसमें विघ्न पहुँचानेवाले भ्रमरोंको नीलकमलसे हटाकर वे प्रियाकी सेवामें लगे हैं। वृक्षो! तुम्हारा उन्हें ध्यान भी कहाँ?' इसपर मानो वृक्षोंने कहा—'नहीं, नहीं, गोपांगनाओ! बात ऐसी नहीं है, तुम भ्रममें पड़ी हो, वे अपनी प्रियाको हमारी शोभा दिखानेके लिये ही इधर पधारे हैं।' वृक्षोंके इस अनुकूल तर्कपर वे कहती हैं—'तुम जड हो, उनकी बातको समझ नहीं सकते, उनके इधर आनेका कारण हमसे सुनो, वे तो मदान्ध तुलसिकालिकुल (तुलसीपर मँडरानेवाले भौंरोंके झुण्ड)-से उद्विग्न हुई श्रीप्रियाजीके सान्त्वनार्थ नीलकमलसे उन्हें उड़ाते हुए इधर आये हैं। उन्होंने यह सोचा है कि ये भौंरे इन वृक्षोंमें भटक जायँगे अथवा इनके फूलोंमें रम जायँगे और प्रियाजीको