भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 437, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंइसके द्वारा विनिर्दिष्ट परब्रह्मरूप श्रीकृष्णतत्त्वमें श्रीराधा और श्रीकृष्ण—दोनों आ जाते हैं। वह सत्ता, महासत्ता रूप है, जिसके बिना सब असत् है, उसी स्वप्रकाश सत्से सबकी सत्ता है, वही 'कृष्ण' हैं, इसमें णकार निर्वृति या आनन्दका द्योतक है तथा उनमें रहनेवाला आनन्द ही श्रीराधा हैं। आह्लादकी अन्तरात्मा आनन्द और आनन्दकी अन्तरात्मा आह्लाद दोनों एक तत्त्व हैं, भेद नहीं। इस प्रकार श्रीराधाकृष्ण उभय, उभयभावात्मा और उभय-उभय-रसात्मा हैं। यों कान्ताके हृदयह्रदमें जो पूर्णानुराग-महाभाव है, वहीं सुवर्णसदृश स्तनमण्डल और बाह्य कुंकुमके रूपमें अभिव्यक्त होकर शोभा बढ़ाता है। महाभाव ही कुंकुम है, उससे कुन्दमाला रँग गयी है। विशुद्ध अनुरागसे माला रँगी गयी है। उसीका सौगन्ध्य ब्रजमें फैला है। जिन्हें प्रभुकी अनुकम्पासे दिव्य घ्राण मिले, वे उसका अनुभव कर सकते हैं। पद्यमें 'वाति' वर्तमान काल है। आज भी ब्रजमें वही गन्ध विस्तीर्ण है, पर प्रभुकी कृपासे ही सूँघनेको मिलता है— 'कान्ताङ्गसङ्गकुचकुङ्कुमरञ्जितायाः कुन्दस्रजः कुलपतेरिह वाति गन्धः॥' (श्रीमद्भा० १०।३०।११) हरिणीके प्रति ईर्ष्याभाव जो गोपांगनाएँ भगवान्के अन्तरंगस्वरूपसे परिचित हैं, वे विप्रयुक्ता नहीं हैं, पर जो अन्यान्य मध्या, मुग्धा, प्रगल्भा आदि हैं, उनका साथ देनेके लिये वे भी श्यामुसुन्दरको ढूँढ़ती हैं। हरिणीसे इन सबने बहुत पूछा, कितने ही अन्तरंग रहस्य उसे बतलाये, पर वह न पसीजी, उसने उन्हें कुछ नहीं बतलाया। तब उससे उन्हें निराशा उत्पन्न हो गयी और उसीमें ईर्ष्या भी। उनमेंसे एक कहती है— 'पहले तो यह कृष्णसारकी (कृष्ण ही है सार जिसका—'कृष्णः सारो यस्य सः') अर्थात् कृष्णभक्त हरिणकी पत्नी थी, फिर वह कृष्णपत्नी हो गयी। अब वह इससे सापत्न्यभाव रखती है। इसीलिये उनका पता नहीं बतलाती।' दूसरी कहती है—'सखि! यह बात नहीं है, उन मनमोहन श्यामसुन्दरने अपने भ्रुकुटीरूप कामकोदण्डको तानकर कटाक्षशरसे इसे विद्ध किया है। इसका हृदय उससे विह्वल हो गया है, केवल इसके नेत्रोंमें श्रीश्याम- छवि बसी है। अतः हृदयशून्या होनेसे यह बेचारी हमारे वचनोंको सुन नहीं रही है। चकितदृष्टि, विह्वलहृदया वह हमारे प्रश्नोंका क्या उत्तर देगी?' तीसरी कहती है—'अभी तो यह मनोहारिणी थी, पर अब सुखहारिणी है, इससे अपनी आशा पूर्ण न होगी। चलो, किसी औरसे पता लें।' इस प्रकार वे श्रीकृष्णविरहिणी व्रजदेवियाँ जड़, चेतन, पशु-पक्षी, लता, वृक्ष सभीसे अपने प्राणधन घनश्यामका पता पूछती फिरती हैं। इससे सूचित करती हैं कि प्रेमी किसीसे भी अपने प्रियतमको पूछ सकता है। उसे स्वभावसे ही यह आशा बनी रहती है कि कदाचित् इनमेंसे कोई बता ही दे। 'आनन्दवृन्दावनचम्पू' में इस भावका खूब वर्णन किया है। श्रीकृष्णान्वेषण करती गोपियोंको कहीं तमालका वृक्ष दीख पड़ा, उसके दर्शनसे उनकी श्रीकृष्णस्मृति नवीन हो गयी। उस श्यामल तमालको देखनेसे उन्हें तमालश्याम मंजुल मुरलीमनोहर स्मरण हो आया, वे उस तमालको अपने मोहनका सखा मानती हैं। अगाध प्रेमसे गद्गद होकर उससे कहती हैं—'सखे! मालूम पड़ता है कि हमारे हृदय और तुम्हारी कान्तिके चोर श्यामसुन्दरने अभी-अभी तुम्हारा आलिंगन किया है, तभी तो ये तुम्हारे कोमल पल्लव अपनी अरुणिमाके व्याजसे तुम्हारे अनुरक्त हृदयका पता दे रहे हैं। बताओ, तुमने उन्हें किधर जाते देखा है?' उसे अपने प्रश्नका उत्तर न देते देख व्रजांगनाएँ यह कहती हुई आगे बढ़ जाती हैं—'सखियो! इसकी वेदना तो श्रीश्यामसुन्दरके आलिंगनसे शान्त है, अतः यह दूसरेकी वेदनाको क्या जाने?' आगे जाति (चमेली)-की लता मिल गयी। उससे कहती हैं—'तुम स्वभावसरला हो, तुम्हारे मुकुलपर श्रीश्यामसुन्दरने यह नखक्षत किया है, अतएव वह अरुण है।' आगे वे आम्रके नवकोमल अरुण पल्लवको देखकर कहती हैं—'सहकार! अवश्य हमारे प्राणधनने अपने नखोंसे तुम्हारा लुंचन किया है, तभी तो दुग्धके