भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 436

४२६ भक्तिसुधा वे कहीं हृदयमें बस गये तो फिर उन प्रियतम प्राणनाथ मुरलीमनोहर श्यामसुन्दरके स्पर्श, परिरम्भणादिकी लालसा सुस्थिर हो जाती है और मन होता है—'इन्हें अन्तरात्मामें, रोम-रोममें बसायें।' क्षणभरमें व्रजांगनाएँ हरिणीकी ओर झुककर कहती हैं—'सखि मृगांगने! वे तुम्हारे नेत्रोंमें अपनी छवि बसाकर चले गये होंगे; क्योंकि तुम्हारे नेत्रोंमें उनकी श्यामलता आदि स्फुट ही प्रतीत हो रही है। उनका यही काम है। हम उन्हें खूब जानती हैं। वे कुलपति हैं, व्रजांगनायूथके पति हैं। वे कुलपति होकर भी एक प्रेयसीके रसवश होकर हम सबको छोड़कर उसीके साथ हो लिये। यह कुंकुममिश्रित कुन्दमालाकी सुगन्ध ही इसका प्रमाण है।' इस समय व्रजांगनाओंके प्रेम-पयोधिमें ईर्ष्याकी लहर उठ आयी। वे कहने लगीं—'यह देखो अन्याय, 'किं सैवैका कान्ता न वयम्' क्या वही एक उनकी कान्ता है, हम नहीं; जो हमें छोड़कर उसके साथ चले गये? जो उन्हें बहकाकर ले गयी वही प्रेयसी है, हम नहीं? तुम साक्षी हो हरिणी, देखो, यह कुलपतिका कैसा अन्याय है।' मानिनी व्रजांगनाओंकी ओरसे ये भाव हैं।' इसके अतिरिक्त जो श्रीवृषभानुनन्दिनीकी शुद्ध प्रेष्ठतम सखी हैं, उनके वे ही भाव हैं कि हे कृष्णसार सती! तुम धन्य हो, तुमने युगलसरकारके दर्शन किये हैं, उनके सम्मिलित स्वरूपदर्शनसे तुम्हारे इन नेत्रोंकी सुनिर्वृति हुई है—परमानन्दकी प्राप्ति हुई है। तुम प्रेष्ठसखी हो, श्रीवृषभानुनन्दिनीकी अन्तरंगा हो। तुम्हारे नेत्रोंकी प्रसन्नतासे मालूम पड़ता है, अवश्य तुमने उन श्रीराधामाधवके यहाँ कहीं अभी दर्शन किये हैं। सखि! हम तुम्हारी बड़ी कृतज्ञ होंगी, हमको भी उनका पता दो। प्रकृति पद्यान्तर्गत 'कान्ता' पदकी व्युत्पत्ति की जाती है कि 'कस्य सुखस्य अन्तः सिद्धान्तो यस्यां सा' अर्थात् जिसमें अनुरागात्मक या आनन्दात्मक सुखका अन्त है वह 'कान्ता' है। तात्पर्य यह कि व्रजेन्द्रनन्दिनी श्रीराधा ही सुख- सिद्धान्तरूपा हैं। सुख क्या है? तो यदि वादी- प्रतिवादीनिर्णीत सिद्धान्त ही सुख है, ब्रह्मानन्द सुख है अथवा स्वर्गादि सुख है, इसका अन्तिम सिद्धान्त श्रीवृषभानुनन्दिनी ही हैं, परमानन्दमें रहनेवाला माधुर्यसारसर्वस्व वही हैं अथवा 'कस्य सुखस्य अन्तःपर्यवसानम् यस्यां सा कान्ता' अर्थात् सुखकी बढ़ते-बढ़ते अन्तिमावस्था पराकाष्ठा जहाँ हो, वह तत्त्व कान्ता है और वही श्रीराधातत्त्व है। श्रीराधास्वामी मतवाले कहते हैं कि 'वैदिक, पौराणिक लोगोंको केवल १४ लोक मिले, पर हमारे स्वामी १८वें लोकमें विराजमान हैं।' कल्पना करनेमें क्या लगता है? एक राजाको कहानीका बड़ा शौक था, वह ऐसी कहानी सुनना चाहता था, जिसका अन्त न हो और इनाम भी उसे देना चाहता था, जो बे-अन्त कहानी कहे। बेचारे सब परेशान होकर चले जाते थे, आखिर कितनी लम्बी कहानी होती। एक ऐसा कहानीकार उसे मिल गया। उसने कहना शुरू किया— 'एक बड़ा भारी जंगल था। उसमें एक बहुत बड़ा वृक्ष था, उसमें बड़े-बड़े असंख्य पत्र थे, एक-एक पत्रपर कई-कई पक्षी रहते थे, उनमेंसे एक उड़ा फुर्र, दूसरा उड़ा फुर्र। राजा जब पूछता—'फिर क्या हुआ?' तो कहानीकार कह देता 'फुर्र'। इस तरह और 'फुर्र' के चक्करमें बहुत समय निकल गया। राजाने खीझकर कहा—'आगे क्या हुआ?' कहानीकारने कहा—'हुजूर, सब पक्षी उड़ लें तब तो आगे कहानी चले।' अतः हमारे दार्शनिक एक बातपर निर्णय करते हैं, वाचस्पतिकी मति भी सुखकी कल्पना करनेमें थक जाय, वह नित्य निरतिशय-सुखास्पदा नित्यनिकुंजेश्वरी श्रीराधा हैं। अतएव 'कस्य सुखस्य अन्तो यस्याम्' यह संगत व्युत्पत्ति है। इन कान्ता श्रीव्रजेन्द्रनन्दिनीके मंगलमय श्रीअंगके संगसे श्रीश्यामसुन्दरकी कुन्दमाला रँग गयी। वह कुंकुम था—केसर थी—जिससे वह रँग गयी। यह कुंकुम क्या है? भावुक कहते हैं— श्रीवृषभानुनन्दिनीके हृदयमें निवास करनेवाला श्रीकृष्णविषयक जो महाभावरूप अनुराग है, वही उनके कनककली-सदृश मनोहर स्तनमण्डलमें भी है अर्थात् कुंकुम-अनुराग स्थानीय है। यहाँ बिना समझे लोग सूखा कुतर्क करते हैं। वस्तुतः श्रीकृष्णमें— कृषिर्भूवाचकः शब्दः णश्च निर्वृत्तिवाचकः। तयोरेक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते॥