भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 435

श्रीरामपंचाध्यायी ४२५ एकवचन मुखसे निकल पड़ा। जबतक भावसमुद्रमें किस ओर गये हैं?' ज्वार-भाटा नहीं आया, तबतक लोक-वेद सबकी इस प्रकार श्रीव्रजेन्द्रनन्दनको ढूँढ़ती हुई गोपांगनाएँ मर्यादा सुरक्षित रही, फिर नहीं। ('व्रजेशसुतयोर्वक्त्रं लताओंसे, वृक्षोंसे, भूमिसे पूछती फिरती हैं। हरिणांगनाको यैर्निपीतम्', 'अक्षण्वतां फलमिदमेव') वे 'दर्शन' देखकर तो उनकी प्रश्नपरम्परा, उनकी जिज्ञासा, नहीं कहतीं, क्योंकि यह मोटी बात है, स्थूलदर्शिता उनकी श्रीकृष्णविषयिणी स्मृति उद्वेल महानदीका है। यहाँ तो कहा 'निपीतम्' जिसका सुधासमुद्रका अनुकरण करने लगी है। वे उसे सकलदुःखहारिणी भी समवगाहन करना है। इतने कुशल, सजीव हरिणी मान रही हैं। उन्हें विश्वास हो गया है कि नेत्रपुटोंके सामने सुवर्ण, हीरक आदिके पात्र तुच्छ हैं। इस हरिणीने हमारे प्राणधनको अवश्य देखा है। तभी ये इसी पूर्वानुभवसे हरिणीके प्रति 'तन्वन् दृशां सखि तो इसके नेत्रोंमें यह श्याम छवि, यह श्यामलता, सुनिर्वृतिमच्युतो वः' (श्रीमद्भा० १०।३०।११) चंचलता आदि उपलब्ध हो रही हैं। गोपांगना- कर रही हैं। 'अनुरक्तकटाक्षमोक्षम्' में दो भाव हैं- समूहमें मानिनी गोपियाँ परस्पर कहती हैं- 'वे यह मुखचन्द्र अनुरागियोंके कटाक्षमोक्षका स्थान है यशोदानन्दन सदा तो हमारा मान मनाते रहे, पर अब अथवा अनुरक्तोंकी ओर सानुराग कटाक्षमोक्षका स्थान क्या हो गया जो हम सब पूछती फिरती हैं, आकुला है अथवा अनुरक्तोंकी ओर सानुराग कटाक्षमोक्षणकी हैं और वे मिलतेतक नहीं। पहले वे हमें ढूँढ़ा करते क्रिया जिसमें हो रही है, वह है अथवा उस अवसरपर थे, हमारा मान मनाते थे, पर आज हमारी सुधितक गोपांगनाएँ कहती हैं- 'सखि! दर्शन करने कैसे जायँ, नहीं लेते- हम कितनी बेहाल हैं। इसपर कोई कहती कुललज्जा मुखचन्द्रका दर्शन नहीं करने देती।' दूसरी है- 'कयाचिद् धूर्तया नीतः' अर्थात् 'कोई धूर्त कहती है- 'चलो, किसी निकुंजमें छिपकर दर्शन सखी उन्हें बहकाकर ले गयी, अन्यथा वे ऐसे नहीं करेंगी।' इसपर भी एक तीसरीका तर्क उठता है- हैं।' इस समय उनकी घ्राणने कुन्दमालाके, जो 'क्या वे मोहन अपने भृकुटिकोदण्ड तानकर तुम्हारी कान्तांगसंगकुचकुंकुमरंजिता थी, सौगन्ध्यका अनुभव लज्जाको कहीं फेंक न देंगे?' यह तो एक मुखचन्द्रके किया। वे कहने लगीं- अब तो वह बात स्पष्ट हो दर्शनकी भावकल्पना हुई। यहाँ तो प्रिया-प्रियतम दोनों गयी, देखो, यह कुन्दमालाकी सुगन्ध आ रही है, यह विराजमान हैं। इन्हें भी अकेले मुख-चन्द्रदर्शनमें बाधा केवल मालाकी ही सुगन्ध नहीं। किंतु उस धूर्ताके है, अतः सम्मिलित दर्शन चाहती हैं। वहाँ भी अंगमें लगे कुंकुमका भी इसमें समावेश है। 'सखियो! 'व्रजेशसुतयोः' कहा गया है। 'सुतयोः' में सुता वे तो स्वयं हमें छोड़कर कहीं जानेवाले नहीं थे, और सुत दो हैं, व्रजेश वृषभानु बाबा और व्रजेश अवश्य किसी धूर्ताने ही उन्हें फँसाया है।' दूसरी नन्दबाबा, दोनोंके पुत्री और पुत्र श्रीराधा-कृष्णका कहती है- 'सखि! देखो, वे श्यामसुन्दर बड़े छलिया दर्शन अभिप्रेत है। मुखत्वसे मुखमें एकवचन कहा हैं, वास्तवमें वे किसीके नहीं। अपने सुन्दर शरीरको गया है। व्रजांगनाओंके भावमहावायुने गौर-श्याम दिखाकर उन्होंने केवल तुम्हारे नेत्रोंकी सुनिर्वृति, समुद्रको एक कर दिया और सम्मिलित दर्शन करके सानन्दता सम्पादित की है। इससे वे तुम्हें आकांक्षा कृतार्थ हो गयीं। भाव यह कि जिन्होंने सम्मिलित दर्शन या मोहमें डाल गये। उनके त्रिलोकमनोहर दर्शनसे किया, वे ही कृतार्थ हुए, शेष तो मोरपंखकी तरह तुम्हारे नेत्र अवश्य सफल हुए, उनमें उनकी वह व्यर्थ ही रहे। व्रजांगना कहती हैं- 'अतः हे एणपलि! त्रिभंग-ललित छवि अवश्य बस गयी, पर मन नहीं तुम्हारे नेत्रोंसे, तुम्हारे नेत्रोंमें छलक रही इस सुनिर्वृतिसे भरा, हृदय तरसता रह गया। सुन्दर वस्तुके दर्शनमात्रसे यह निश्चित है कि तुम्हें युगलसरकारका अवश्य दर्शन तृप्ति नहीं होती। दर्शनाभावमें उसके लिये उत्कट हुआ है, हम इस वस्तुको खूब समझती हैं, तुम हमसे उत्कण्ठा बनी रहती है। एक उग्र रुचि जागरित हो छिपा नहीं सकती। शीघ्र बताओ, वे श्रीश्यामाश्याम जाती है। कथंचित् दर्शनकी अभिलाषा पूरी होनेपर