भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२४ भक्तिसुधा होगा, उसीमें 'रसाभास' भी होगा। भगवान्का पीताम्बर माया है, दिव्य माया है, उनके सत्त्वादि विभिन्न रूप जैसे ब्रह्मदर्शन (ज्ञान)-में माया प्रतिबन्ध है, वैसे ही यह 'कनककपिश' वस्त्र है। मायाकी चकाचौंधमें ही जैसे दृष्टि रुक जाती है, वैसे ही भगवान्के देदीप्यमान पीतवस्त्रमें ही दृष्टि रह जाती है। इस प्रकार प्रभुविग्रहका साधारण वर्णन किया गया है। प्रकृतमें जिसकी प्रेप्साके लिये तत्त्वमात्र उतावले हो रहे हैं, उसके लिये यदि गोपांगनाएँ सर्वस्व त्याग करके उतावली हो रही हैं, उस रसास्वादके लिये व्यग्र हैं तो इसमें उनका क्या दोष है ? उनका कहना है कि जब ये हीरा, मोती (कंकड़-पत्थर), जड़ भी श्रीहरिके उरःस्थलको छोड़ना नहीं चाहते, तब 'का वा स्मरवशाः स्त्रियः?' कामकिंकरी, अज्ञानमूर्ति हम स्त्रियाँ कैसे उन्हें भुला सकती हैं? हमारे मन, बुद्धि, अन्तःकरण, रोम-रोममें वे बसे हुए हैं, हम उन्हें कैसे छोड़ें? श्रीमद्वल्लभाचार्यका कहना है कि सारे विधि- निषेध साधनमें होते हैं, फलमें नहीं, रसपानमें भेद नहीं। रसिकोंने समझा कि जो तत्त्व इन्द्रियादिसे अग्राह्य था, जो 'स्वयं तदन्तःकरणेन गृह्यते' से व्यपदिष्ट हुआ, इन्द्रियोंकी विकलता दूर करनेके लिये, उनकी वांछाकी पूर्तिके लिये उन्हीं वांछाकल्पद्रुम प्रभुने अपना दिव्य रूप प्रकट किया और मानो कहा—'बाहुओ! मिल लो, आँखो! देख लो।' जो प्रभुकी इस कृपाका लाभ नहीं उठाते, वे वस्तुतः इन इन्द्रियोंसे कोसे जाते हैं। इस प्रसंगमें महर्षि वाल्मीकिके ये शब्द विशेष अर्थवान् हैं— यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति। निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते ॥ (वा० रा० २।१७।१४) अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः सख्यः पशूननु विवेशयतोर्र्वयस्यैः। वक्त्रं व्रजेशसुतयोरनुवेणु जुष्टं यैर्वा निपीतमनुरक्तकटाक्षमोक्षम् ॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।७) गोपियाँ कहती हैं—'सखियो! अपने सखाओंके साथ गायोंको खिरकमें भेजते हुए नन्दनन्दनके वेणुशोभित मुखका जिन्होंने सानुराग दर्शन किया है, उन्हीं नेत्रवानोंके नेत्र सफल हैं। इससे बढ़कर उनकी सफलता हम तो नहीं समझतीं।' हाँ तो वे श्रुतिरूपा गोपांगनाएँ 'अक्षण्वतां फलमिदम्' के 'इदम्' को खूब जानती हैं। इसके अतिरिक्त नेत्रवालोंके लिये उनकी दृष्टिमें और कोई फल ही नहीं—'न परं विदामः ।' जो वेदसम्मत नहीं, वह तो अवैदिक ही है। यहाँ गोपीरूपधरा श्रुतियाँ ही यह कह रही हैं—'अनुरक्तकटाक्षमोक्षपूर्वक जिन्होंने व्रजेशसुत श्रीबलराम तथा श्रीकृष्णके मुखका सातिशय दर्शन किया है, उन्हें ही नेत्रवत्ताका फल मिला है, क्योंकि नेत्रोंकी फलवत्ता इसीमें है।' इस प्रसंगमें व्रजांगनाएँ बड़ी चतुराईसे बात कर रही हैं। वे 'व्रजेशसुतयोः' में द्विवचन भावगुप्तिके लिये देती हैं, जिससे बलराम और कृष्ण दोनोंका ग्रहण हो। परंतु सहसा 'वक्त्रम्' एकवचन ही निकल जाता है; क्योंकि उनका तो अनुराग श्रीश्यामसुन्दरमें ही है। पर कहीं उनकी देवरानी, जेठानीके कानमें यह शब्द न पड़ जायें, इसलिये द्विवचनसे छिपाती हैं। वे व्रजकी नारियोंकी प्रकृतिसे परिचित हैं, वे खूब जानती हैं कि 'बलिहारि करो व्रजको बसिबो जहाँ पानीमें आग लगावें लुगाई।' श्रीश्यामसुन्दरके प्रेमको वे छिपाती हैं। कोई पूछे तो वे चट उत्तर दे दें कि 'हम तो व्रजपालके प्रति राजभक्ति प्रदर्शन कर रही हैं।' इन सब भावोंसे 'सुतयोः' द्विवचन बोलती हैं। परंतु जबतक श्रीश्यामसुन्दरका मुखचन्द्र सामने नहीं; तभीतक यह बनावट छिपी है और भावमहासागर शान्त है। पूर्णचन्द्रके दर्शन होते ही सागरकी मर्यादा भंग हो जाती है। यह प्राकृत पूर्णचन्द्र जलसमुद्रके हृदयसे उदित हुआ है और वह अप्राकृत श्रीकृष्णचन्द्र इसी व्रजांगनाओं या श्रीवृषभानुनन्दिनीके हृदयमहाभावसमुद्रसे आविर्भूत होता है। महाभावसमुद्र जबतक शान्त रहा, तबतक सर्वविधगोपन, सर्वविधविवेचन, पर ज्यों ही श्रीश्याममुखचन्द्रका ध्यान आया कि बस भावसमुद्र उमड़ पड़ा—छिपानेकी सब चालें भूल गयीं, 'वक्त्रम्'