भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरामपञ्चाध्यायी ४२३ भाव यह कि ब्रह्माने इन्द्रियोंको बहिर्मुख बनाकर मारे जायें, वह काष्ठखण्ड अथवा पशु जिससे मारे उनको मार डाला। वे बिलबिलाती हैं, दुःखी हैं। जायें वह दण्ड ('पशवो हन्यते यत्र यद्वा अनेनेति 'पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं।' (रा०च०मा० पशुघ्नः शुष्ककाष्ठम्') है अर्थात् श्रीहरिकथासे २।६४।७) मरण तो अच्छा, वियोगी तो इसे शौकसे कदाचित् जड काष्ठको ही विराग हो तो हो, पर चाहते हैं। ब्रह्माने इन्द्रियोंको शब्दादिकी ओर प्रवृत्त इन्द्रियवान् ऐसा कोई नहीं हो सकता। अतएव किया, यह ठीक नहीं किया; क्योंकि ऐसा करनेसे वे गोस्वामीजीने कहा है- 'श्रवनवंत अस को जग तत्त्वमात्रके सर्वाधिक अनुभवसे वंचित रह गयीं। इन्हें माहीं।' (रा०च०मा० ७।५३।५) 'यदि कोई है परमप्रज्ञासे जो आन्तर दर्शन करती हैं, ईर्ष्या है। तो वह दुःसंस्कारवश ही। बाकी सभी श्रीकृष्ण परतत्त्वका महत्त्व समझनेपर ये रोती हैं कि हाय, हमें परमात्माको चाहते हैं। इन्द्रियाँ रोती हैं, कोसती हैं- प्रपंचमें लगाया गया। ये इन सबको नहीं चाहतीं, ये 'पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूः' वे 'पिय तो पूर्णतम पुरुषोत्तम परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णचन्द्र बियोग सम दुखु जग नाहीं' समझती हैं। आनन्दकन्दका परिरम्भण ही चाहती हैं। इस प्रकार यह जो प्रकृतिके पदार्थमात्रमें हलचल दिखायी चक्षु, श्रोत्र, घ्राणादि वास्तवमें उस सर्वान्तर्यामी सगुण पड़ रही है, वह और कुछ नहीं, केवल श्यामसुन्दरके स्वरूपके ही दिव्य रूप, दिव्य शब्द आदिको चाहते मिलनकी उतावली है। सूर्य, चन्द्र, नक्षत्रमण्डल, हैं, दुस्संस्कारवशात् शूकरकी विष्ठा प्रवृत्तिकी तरह अणु-अणु जो अविश्रान्त गतिसे दौड़ रहे हैं, इनका उन्हें प्राकृत शब्दादिमें स्वाद मिलता है। वही एकमात्र उद्देश्य है। प्रकृतिका प्रत्येक परमाणु अतएव कहा गया है- इसके लिये लालायित है। इसके प्राप्त होनेपर तो निवृत्ततर्षैरुपगीयमानाद्- सबकी चंचलता विलीन हो जाती है। इसका एक भवौषधाच्छ्रोत्रमनोऽभिरामात्। उदाहरण लक्ष्मी है- 'चलापि यच्छ्रीर्न जहाति क उत्तमश्लोकगुणानुवादात् कर्हिचित्॥' (श्रीमद्भा० १।११।३३) उस समय पुमान् विरज्येत विना पशुघ्नात् ॥ आनन्दमग्न सब कूटस्थकी तरह होंगे। जिस समय (श्रीमद्भा० १०।१।४) मधुप मकरन्दपानमें मग्न होता है, उस समय उसका सचमुच श्रीकृष्ण परमात्माके चरितसे कौन गुंजारव समाप्त हो जाता है। अलिकुलमालासंकुल विमुख होगा? वह तत्त्व महामुनि, भक्त, मुमुक्षु, वनमालाधारी मुरलीमनोहरके दिव्य दर्शन होते ही सब यहाँतक कि विषयीका भी सेव्य है। 'सुनहिं बिमुक्त आनन्दविभोर, शान्त हो जाते हैं। ये सब दुःख उसके बिरत अरु बिषई।' (रा०च०मा० ७।१५।५) बिना हैं। हम 'रस' को सावरण रखते हैं। 'बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा। श्रवन सुखद श्रीमद्वल्लभाचार्यने 'बर्हापीडम्' (श्रीमद्भा० अरु मन अभिरामा ॥' (रा०च०मा० ७।५३।४) १०।२१।५) (वेणुगीत) पद्यकी व्याख्यामें वह गुणानुवाद अच्छा नहीं लगता केवल पशुघ्नको, श्रीभगवान्को उद्बुद्ध उभयविधशृंगार बतलाया है कसाईको, महापापीको। परंतु सदन कसाईको तो बड़ा और 'कनककपिशम्' (श्रीमद्भा० १०।२१।५) अच्छा लगता था। अतः 'पशुघ्न' का अर्थ दूसरा से पीतवस्त्रको उस (रस)-का आवरण। अंगको है- 'अपगता शुक् यस्मात् सः, शोकमोह- उससे समाच्छन्न रखा है। यह इसलिये कि भावुक शून्यस्तत्त्वज्ञानी, तं हन्तीति अपशुघ्नः' अर्थात् जैसा देखेंगे, वैसा ही वर्णन करेंगे, उफान उसीका महाब्रह्मनिष्ठवधजन्य पातकवालेको ही श्रीहरिगुणानुवाद आयेगा। झरनोंके सम्पर्कमें जलकी तरह भावोंमें रस अच्छा नहीं लगता। परंतु कितने ही ऐसे पापी भी बढ़ता है और फिर वह प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, श्रीहरिगुण-श्रवणमहिमासे मुग्ध और मुक्त हुए सुने आनन्दमयादि कोशोंमें परिपूर्ण होकर रोम-रोममें गये हैं, अतः 'पशुघ्न' का अर्थ पशु जिसपर रखकर भरपूर होता है। जैसा अनुभव होगा, वैसा ही उद्गार