भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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४२२ भक्तिसुधा १०।२१।७)। इसे श्रीमद्वल्लभाचार्यने फलाध्याय ही माना है। व्रजदेवियोंकी दृष्टिमें श्रीमदनमोहन मुरलीधरका दर्शन ही नेत्रवानोंके नेत्रवान् होनेका फल है। कोई भले ही स्वर्ग, अपवर्ग, कल्पवृक्ष आदिके दर्शन या प्राप्तिको नेत्रवत्ता या जप, तपका फल माने। परंतु व्रजसुन्दरियाँ तो कहती हैं— 'आँखवालोंका तो फल यही है। यदि इसके अतिरिक्त और कोई फल हो सकता है तो वह अन्धोंका ही होगा।' 'अक्षण्वतां फलमिदम्' में 'इदम्' कहा गया है, जिसका अर्थ 'सामने वर्तमान' है, पर श्रीश्याम वृन्दावनमें हैं और गोपांगना अपने भवनोंमें यह भावना कर रही हैं, तब श्रीकृष्ण उनके 'इदम्' के विषय कैसे हुए? परंतु इसका पर्यवसान इसीमें है कि व्रजांगनाओंके तीव्र संवेग-संचालित भावना- परिपाकका यह फल है कि वह यशोदोत्संगलालित पूर्णतम पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण उनके समक्ष वहीं हैं, अतः 'इदम्' कहा। 'अक्षण्वताम्' यह पद देहधारियोंका उपलक्षण है, अतः व्रजांगनाओंके विचारसे प्राणिमात्रके नेत्रोंके लिये यदि कोई फल हो सकता है तो यही कि उन्हें श्रीश्यामसुन्दरके मुखारविन्दका दर्शन प्राप्त हो, अन्यथा नेत्र व्यर्थ हैं। श्रवण भी व्यर्थ हैं, यदि उन्हें उन श्रीभगवान्के वचनामृत और वेणुरवका पान करनेको न मिले। क्या यह घ्राण भी सार्थक कहा जा सकता है, जिसने एक बार भी भगवान्के चरणामृत-सौगन्ध्यका आस्वाद नहीं पाया ? भगवत्-सेवा-विमुख बाहुओंको कौन बाहु कहेगा? वे सब व्यर्थ ही हैं, जिनसे भगवत्सम्बन्धका ज्ञान नहीं होता। व्रजांगनाओंका तो स्पष्ट कहना है कि 'और कोई जाने चाहे न जाने, पर हम तो श्रीनन्दनन्दनके दर्शनको ही नेत्रोंका परम फल मानती हैं। अलौकिक साध्य-साधन श्रुतिरूप है—'धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः' वही वेदमन्त्रोंकी अधिष्ठात्री श्रुतिरूप व्रजदेवियाँ यह कह रही हैं।' यदि वह तत्त्व श्रुतिसे अविदित है तो भावुक कहता है—'श्रवणयोरलम श्रवर्णिर्मम··· तमवि- लोकयतो नयने वृथा···।' महर्षि वाल्मीकि भी कहते हैं— यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति। निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते ॥ (वा०रा० २।१७।१४) आत्मा, बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ कोसती हैं—'हाय, किस दुष्टसे सम्बन्ध हुआ। किसके पल्ले पड़ीं, जो कभी भी एक बार भी उस दर्शनीयके दर्शन न मिले।' यह ठीक है पर—'स्वयं तदन्तःकरणेन गृह्यते।' वह तो निर्वृत्तिक अन्तःकरणसे उपलब्ध होता है। वह तत्त्व तो बुद्धिसे भी परे है, इन्द्रियोंकी वहाँ पहुँच ही कहाँ— इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥ (गीता ३।४२) परंतु इन्द्रियाँ इससे सहमत नहीं, वे तो कहा करती हैं—'हाय, हमारा जन्म उस दर्शनीयके दर्शनसे सफल न हुआ, हम उससे वंचित रह गयीं, हमारा रोम-रोम उसके साक्षात्कारके लिये तड़पता है, हम व्याकुल हैं।' कोई भी ऐसा नहीं, जो उन्हें न चाहे। वनगमनके समय भगवान् रामके मार्गको साँप और बिच्छू-जैसे विषैले जन्तुओंने भी साफ कर दिया और उनके दर्शनसे अपनेको धन्य समझा। एक और भी उक्ति है—'जिन्ह कर मन इन्ह सन नहिं राता। ते जन बंचित किए बिधाता॥' (रा०च०मा० १।२०४।२) काँटे भी उनके लिये कोमल हो जाते हैं। प्रकृतिका प्रत्येक परमाणु उनसे मिलनेके लिये उतावला हो उठता है। एक श्रुतिद्वारा इसका पूर्ण समर्थन प्राप्त है। वे अज्ञ हैं, जो यह कहते हैं कि 'जो श्रुतिमें नहीं, वह हमारे यहाँ है।' वस्तुतः जो श्रुतिमें नहीं, वह कहीं भी नहीं। महापुरुषों एवं महाभक्तोंने वेदप्रतिपाद्य वेदसारको ही अपनी 'वाणी' में कहा है—'पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयंभूः ·····आवृत्तचक्षुः···· (कठ० २।१।१) ब्रह्माने इन्द्रियोंकी बाह्य वृत्ति बना दी, अतः वे बाहर ही देखती हैं, भीतर नहीं। यहाँ 'व्यतृणत्' कहा, 'व्यरचयत्' ही कह देते। ऐसा कहनेमें कुछ तात्पर्य है। 'व्यतृणत्' हिंसार्थक 'तृंह्' धातुका रूप है, जिसका अर्थ हुआ 'हिंसितवान्।'