भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 431, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 431

Here is the line-by-line transcription of the text from the provided image into pure Markdown format in Unicode Devanagari:

श्रीरामपञ्चाध्यायी ४२१ तरह हरिणीके सामने व्रजदेवियोंका प्रणय-पाथोधि वे माधुर्यरसके व्यंजक होते हैं। प्रस्तुत पद्यमें 'तन्वन् नाना भावोंमें उद्वेलित हो पड़ा और न जाने अभी दृशां निर्वृतिम्' (श्रीमद्भा० १०।३०।११) से ही कितना हो। आनन्द अर्थ स्फुट था, पर उसके साथ 'सु' भी '.....तन्वन् दृशां सखि सुनिर्वृतिमच्युतो वः।' लगाया गया। यह विशेष तात्पर्यावद्योतक है। (श्रीमद्भा० १०।३०।११) व्रजांगनाओंका कहना है कि 'श्रीश्यामसुन्दर इधर इसपर बहुतसे भाव पीछे कहे गये। इसमें एक आये होंगे, पर यह माधुर्य तो जो तुम्हारे नेत्रोंमें है, भाव यह भी अन्तर्हित है कि हरिणीको श्रीकृष्णका श्रीप्रियाजीके संयोगका सूचक है। उनके श्रीअंगसे सन्दर्शन अवश्य हुआ है, वह इसका निषेध कर नहीं परिवेष्टित श्यामसुन्दरका स्वरूप सखि हरिणांगने! सकती। अवश्य ही भगवान् कृष्ण इस मार्गसे पधारे तुम्हारे नेत्रोंमें बसा है।' यही 'निर्वृति' के साथ 'सु' हैं और हरिणीको उन्होंने दर्शन दिया है; क्योंकि का वैशिष्ट्य है। यही बात 'गात्रैस्तन्वन् दृशां सखि वस्तुतः कृष्णसारसतीके नेत्रोंमें व्रजांगनाओंको मनोहरता, सुनिर्वृतिमच्युतो वः।' (श्रीमद्भा० १०।३०।११)- अद्भुतता, मुग्धता, सुभगता, चपलता, तीक्ष्णता, श्यामता से भी ध्वनित हुई है। व्रजांगनाजनके विचारसे केवल आदिका अनुभव हुआ है। ये सब गुण रसिकशेखर श्रीश्यामसुन्दरके गात्रमात्रसे हरिणांगनाके नेत्रोंकी सुनिर्वृति श्रीश्यामसुन्दरमें विराजते हैं। व्रजांगनाएँ यह कल्पना नहीं हुई, अपितु श्रीराधासंयुक्त मोहनके दर्शनसे ही करती हैं कि प्राणप्यारे मोहनका दर्शन करते-करते वह सम्भव हुई। फिर उस लोकोत्तर निर्वृतिमें गात्रमात्र हरिणीके इन नेत्रोंमें वे बस गये, उन्हींकी वह ही सहायक नहीं, अपितु स्वेद, रोमांच, कम्प, परस्पर मादकता, मोहकता इनमें छायी हुई है। यद्यपि अनुरागोद्रेक आदिका उद्भव भी मुख्य है। मिलित श्रीश्यामसुन्दरके नेत्रोंमें तीक्ष्णता नहीं है, परंतु विप्रयोगवश युगलमूर्तिके दर्शनसे हरिणांगनाके भी गात्रोंमें स्वेद, गोपांगनाओंको उसकी प्रतीति हो रही है। इस प्रकार कम्प, रोमांच, अनुरागोद्रेक आदि हुआ। अनुरागोद्रेक श्रीकृष्णपरमात्मक सभी भाव हरिणीके नेत्रोंमें और वैसे ही तत्तदनुभावोंसे युक्त सरसता, सुनिर्वृति व्रजांगनाओंको स्पष्ट प्रतिफलित दीख पड़ रहे हैं, उसके नेत्रोंमें व्यक्त हुई। इस तरह हरिणांगनाके अतएव वे कहती हैं—'सखि हरिणी, तुम छिपानेकी नेत्रोंके लिये सुनिर्वृतिका विस्तार अथवा प्रदान करते चेष्टा न करो, अवश्य ही वे हमारे प्राणधन, परमानन्दमूर्ति हुए श्रीश्यामसुन्दर इधरसे होते हुए गये हैं। तात्पर्य श्रीश्यामसुन्दर तुम्हारे नेत्रोंमें आनन्द उड़ेलते हुए यह कि प्रथम तो रसका दर्शन, वह भी अनुपानसहित, अवश्य इधरसे ही गये हैं; क्योंकि उनके दर्शनके बिना रसाक्रान्त तथा रसानुभवसहित हुआ। रसोद्रेकसे रोमांच तुम्हारे इन नेत्रोंमें यह विशेषता आ नहीं सकती।' होता है, पर यहाँ मूर्तिमान् रसमें ही रोमांच, स्वेद, इसके अतिरिक्त एक बात यह भी है कि श्रीकृष्ण कम्प आदि हैं। ये सब गात्रगत बहुवचन और 'रस' हैं, 'रसो वै सः' (तैत्तिरीय० २।७) यह श्रुति सुनिर्वृति आदि पदद्योत्य विशेषताएँ हैं। ही इसमें प्रमाण है। इस प्रकार रसस्वरूप श्रीकृष्ण

श्यामसुन्दरके दर्शनमें ही नेत्रोंके

स्वरूपसे ही मधुर हैं। फिर अनुपानकी विशेषतासे

होनेका साफल्य

उनकी रसात्मकता और भी चमत्कृत हो जाती है। हरिणांगनाके नेत्र और श्रीश्यामसुन्दरका रूप, लोकमें एक रस अनुपानभेदसे सेवनकर्ताको अनेक इन दोनोंसे व्रजांगनाएँ खूब परिचित हैं। जितना वे प्रकारसे लाभ पहुँचाता है, विभिन्न रोगोंकी निवृत्ति जानती हैं, उतना कोई कह ही नहीं सकता। करता है। वैसे ही ये निखिलरसामृतमूर्ति, अनन्तकोटि- उन्हींकी कृपासे कुछ कणका पता लगता है। फिर कन्दर्पदर्पदलनपटीयान् श्रीकृष्ण परमात्मा हैं। इनमें विरहावस्था-प्रयुक्त वाक्योंका अर्थ तो वे ही जानती अनुपानभेदसे रसभेद है। माधुर्यरसकी अभिस्रुति जब हैं। पहले इस व्याख्या-प्रसंगमें कहा गया है— वे कान्तासंयुक्त होते हैं, तब होती है। श्रीराधासंयोगसे 'अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः' (श्रीमद्भा०

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ) · पृष्ठ 431, कुल 778 में से · BharatKosha