भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 430

४२० भक्तिसुधा अपारसागर उन प्रभुके पादारविन्दको छोड़ती ही नहीं, क्योंकि क्षण-क्षणके बाद उसमें सुन्दरता आ रही है, लक्ष्मी विचारती ही रह जाती हैं कि 'अब अगले क्षण आनेवाली सुन्दरताका और आस्वाद ले लूँ, तब चलूँ।' आजतक अगली सुन्दरताके लिये उनका लोभ न कभी पूरा ही हुआ और न वे गयीं हीं। 'यद्यप्यसौ पार्श्वगतो रहोगतस्तथापि तस्याङ्घ्रियुगं नवं नवम्।' (श्रीमद्भा० १।११।३३) एक-एक रोममें अनन्त नेत्र, नासिका आदिके होनेपर भी उस आनन्दकी समस्तताका अनुभव असम्भव ही है, वह बढ़ता ही जायगा। इस समयकी, इसके पहलेकी, इससे अगली और उससे भी अगले क्षणकी आनन्दानुभूति किंरूप है, इसका विवेक सर्वदा दुर्घट ही रहेगा। जिसका नाम ही चंचला (बिजली) है, वह भी यहाँ अचंचला (स्थिर) हो जाती है। यह है उस प्रभुके स्वरूपकी महिमा। इसके एक लेशका भी अनुभव होनेपर, 'भजन करनेमें मन नहीं लगता' की शिकायत कैसे रह जायगी? हाँ, तब उलटी शिकायत हो सकती है—'घरके काम-काजमें मन नहीं लगता।' परंतु यह शिकायत तो केवल गोपांगनाओंने ही की— चित्तं सुखेन भवतापहृतं गृहेषु यन्निर्विवेशत्युत करावपि गृह्यकृत्ये। पादौ पदं न चलतस्तव पादमूलाद् यामः कथं व्रजमथो करवाम किं वा॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।३४) उन्हें यह चिन्ता अवश्य हुई कि इस मनोमृगको मोहनके मधुर मोहपाशसे कैसे मुक्त करें? जबतक यह स्थिति न आये, तबतक उन पूर्णतम पुरुषोत्तम परब्रह्म श्रीकृष्णचन्द्रकी मोहन मधुर मूर्तिको हर तरह नवीन बनाये रखनेका प्रयत्न करते रहो। प्रभुकी सेवामें नया वेष, नये भूषण, नवीन भोज, झूलोंके अवसरपर सावन-भादोंकी नवीन-नवीन मनोहर घटाओंका चमत्कार आदि यथावसर होता रहे, जिससे नवीनता आती रहे, उत्सुकता बनी रहे, बढ़ती रहे। पहले बनावटी चमत्कारकी पूर्णता हो ले तो फिर तुरंत स्वाभाविक चमत्कार नयनोंको लुभा लेगा। इसलिये पहले प्रभुके नये-नये शृंगार, भोग, राग आदिसे चित्तकी तत्प्रवणता सम्पादित होती रहे। उसकी सिद्धिके लिये तनुजा, वित्तजा सेवा होती रहे— 'तत्सिद्धयै तनुवित्तजा।' कई सम्प्रदायोंमें विप्रयोग शृंगार भावना चलती है। असमयमें भी वे उसमें मग्न होते हैं। श्रीश्यामसुन्दरके मथुरागमन और गोपियोंकी व्रजमें विरहदशाके पदोंसे उसमें तल्लीन हो जाते हैं। तभी यह भाव पुष्ट होता है। यद्यपि वास्तवमें 'वृन्दावनं परित्यज्य पादमेकं न गच्छति' का सिद्धान्त है तथापि विप्रयोगोत्पादनार्थ यह उचित है। इसीलिये सभी भावुक आचार्यों, श्रीजीवगोस्वामी, श्रीवल्लभाचार्य आदिने उन अंशोंपर व्याख्या लिखी है। जिस समय भगवान्‌का मन्दिर खुले, दर्शन हों, उस समय भगवत्सम्प्रयोगकी और मन्दिर बन्द होनेपर भगवद्विप्रयोगकी भावना प्रभुके स्मरण बनाये रखनेमें साधन है। मन्दिर बन्द होनेपर अपनेमें गोकुलस्थ गोपी और भगवान्‌में मथुरास्थ कृष्णकी भावना करनी चाहिये, समझना चाहिये कि श्रीश्यामसुन्दर मथुरा गये हैं, अभी दो-तीन क्षणमें ही पधारनेवाले हैं। उस भावकी भावना करके देखना चाहिये। कैसी स्थिति प्रकट होती है। इस प्रकार मन्दिरादिमें दर्शनके समय संयोग और पटमंगलके समय वियोगकी भावना आदिसे नवीन-नवीन भावोंकी उत्कण्ठा, प्रतीक्षा आदिका उदय होनेके भाव चित्तमें आने चाहिये। लोकमें नायकको नवीन-नवीन शृंगारवती नायिकाएँ ही वशमें कर सकती हैं, यही स्थिति नायककी है। परंतु यह भगवद्विषयक स्थिति बहुत ऊँची है। इस तरह हरिणी अपने नेत्रोंको सफल समझती हैं। पर सफलता तब, जब उनके नेत्र भी इन्हें देखें। ये हरिणीके भाव हैं। ये गोपांगनाएँ किसी साधारण हरिणीको अपनी सखी नहीं बना रहीं, अपितु वे श्रीमोहनमनोहारिणी, गोपीदुःखहारिणी हरिणी हैं। जैसे हरिणी श्यामसुन्दरको रागसे देखती हैं, वैसे ही वे भी देखते हैं, उनका मन, हृदय-रागका बड़ा ही लोभी है। श्रीश्यामसुन्दरके हरिणी-दर्शनमें दो भाव हैं, एक तो यह कि इसके नेत्र श्रीवृषभानुनन्दिनीके जैसे हैं। दूसरा यह कि यह सुरंगी है, अन्तरंगा है, अतः इसे वृषभानुनन्दिनीके जैसे रागसे देखते हैं। इस